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Sunday, 11 September 2011

गणेशजी को गुस्सा क्यों नहीं आता है?


श्री गणेशाय नम: 
ND


यूं तो छत्तीस करोड़ हिन्दू देवी देवताओं की बहुत बड़ी रेंज है हमारे पास। फिर भी हम हर तरह के काम लेकर सीधे गणेशजी के पास ही जाते हैं। शायद इसलिए कि अन्य भगवानों की तरह उनका कोई प्रोटोकॉल नहीं है। जिसे फॉलो करना पड़े। यही एकमात्र देवता हैं जिनसे हर भक्त अपनत्व महसूस करता है। ऐसा ही कुछ दोस्ताना रिश्ता मेरा भी है, गणेश जी के साथ। इसे सबके साथ साझा करना भी मेरे लिए प्रथमेश की पूजा समान है। - आइए श्रीगणेश करें। 

लगभग डेढ़-दो दशक बाद जब गजानन घर पधारे तब उन्हें इस बात से कोई नाराजी नहीं थी कि हमने उनकी स्थापना इतने लंबे अंतराल के बाद की। उनकी इस फ्लेक्सिबिलिटी की अदा ने मुझे काफी आकृष्ट किया। बचपन से सुनते आए हैं कि जब शिव-पार्वती ने अपने दोनों पुत्रों गणेश और कार्तिकेय को तीनों लोकों की परिक्रमा करने के लिए कहा तो गणेशजी ने फटाफट अपने माता-पिता के चारों ओर परिक्रमा लगा ली। और भाईसाहब तीनों लोकों का चक्कर लगाते रहे। बस तभी से उन्हें ये आशीर्वाद मिला कि हर शुभ कार्य से पहले उन्हें पूजा जाएगा और वे प्रथमेश कहलाएंगे। 

गणेशजी के व्यक्तित्व का सबसे लोकप्रिय तत्व, यही है कि वे लकीर के फकीर नहीं हैं। समय और परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेते हैं। इसीलिए वे बुद्धि के देवता हैं। लोकप्रिय होने के लिए मनुष्यों में भी सबसे आवश्यक योग्यता है सरलता और सहजता। इस पैमाने पर गणेशजी सबसे ज्यादा खरे उतरते हैं। पानी की तरह रवानीदार है उनका स्वभाव। उनकी पूजा करने के लिए पारंपरिक, धार्मिक रीति रिवाजों का बहुत ज्ञान होना भी जरूरी नहीं है। इसीलिए धार्मिक रूझान ज्यादा ना होने पर भी लंबोदर भगवान मुझे हमेशा से प्रिय हैं। 

गणपति बप्पा से मेरा प्रथम परिचय बचपन में हुआ था जब एक सार्वजनिक कार्यक्रम में सब गणेशजी की आरती के लिए इकट्ठे हुए थे। जैसे ही कानों में जयदेव-जयदेव जयमंगलमूर्ति के ओजपूर्ण स्वर सुनाई दिए मन में उत्साह का संचार होने लगा यों भी सुखकर्ता-दुखहर्ता श्री गणेश से भक्ति और पूजा के माध्यम से नहीं बल्कि संगीत के माध्यम से लगाव पैदा हुआ। वैसे इस लगाव का एक कारण मोदक भी हैं, जो गणेशजी की बदौलत ही हमें आजतक सतत मिलते आ रहे हैं। 

हमें लोकमान्य तिलक को धन्यवाद देना चाहिए जिन्होंने गणेशजी की स्थापना और पूजा को सार्वजनिक मंच प्रदान किया। संगीत के माध्यम से गणेशजी की आराधना करने के लिए लता मंगेशकर (गणपति अथर्वशीष) और अहमद हुसैन मोहम्मद हुसैन ( गाइए गणपति जगवंदन) की प्रशंसा भी हमें जरूर करना चाहिए। 

मंगलमूर्ति भगवान को कलाकारों ने भी कई रूपों में चित्रित किया और मूर्तियों में ढाला। इसकी वजह है। गणेशजी का मोहक स्वरूप और लचीला स्वभाव। इन्हें कला और विज्ञान का संरक्षक माना गया है। इसलिए कलाकरों को हर तरह के प्रयोग की छूट भी इन्होंने उदारतापूर्वक दी है। 

यदि कंप्यूटर के माउस के साथ गणेशजी हैं तो गुडहल के फूल में भी इनकी छवि देखी गई है। कुछ लोग मानते हैं कि गणेश जी ब्रम्हचारी हैं मगर प्रचलित मान्यता के अनुसार रिद्धि-सिद्धि और बुद्धि भी उनकी पत्नियां हैं। जनश्रुति है कि महर्षि वेद व्यास ने महाभारत को लिपिबद्ध करने का अनुरोध श्रेगणेश से ही किया था। खैर इतिहास में गोते लगाने के स्थान पर आज की बात करें। 

प्रबन्धन के बढ़ते महत्व के इस दौर में गणेशजी की प्रासंगिकता बढ़ गई है। इन्हें प्रबंधन का प्रतीक माना गया है। यदि इनके बड़े सिर से कुछ नया और विचारशील करने की प्रेरणा मिलती है तो छोटी आंखें एकाग्रतापूर्ण कार्य करने की प्रतीक हैं। छोटा मुंह इसलिए हैं कि कम बोलें और बड़े कान ज्यादा सुनने के लिए हैं। सबसे महत्वपूर्ण है इनका छोटा चपल वाहन यानि चूहा। जिसे पौराणिक ग्रंथों में तमो गुणों और कामनाओं का सूचक माना गया है (जिन पर श्री गणेश ने विजय पाई इसीलिए इसे उसे चरणों में बैठा बताया गया है)। 

लेकिन प्रबंधन के लिहाज से चूहे को सुनियोजित, बुद्धिमत्तापूर्ण और चपल निर्णयों के प्रतीक स्वरूप देखा जाता है। गणेश जी के छोटे कदम लक्ष्य की ओर धीमे किंतु सधे हुए कदम बढ़ाने की प्रेरणा देते हैं। इस एकदंत चारभुजाधारी देवता के बारे में विभिन्न व्याख्याएं हैं। खैर भुजाएं चार हों या सोलह ये अपने सीमित संसाधनों से भी असीमित परिणाम देने का सामर्थ्य रखते हैं। इसीलिए परीक्षा के दिनों में गणेशजी के दरबार में लंबी कतारें देखी जा सकती हैं।

इतनी सारी योग्यताओं और विशेषताओं से पूर्ण कोई देवता हों तो उनका लोकप्रिय होना लाजमी है। इन्हीं कारणों से गजानन भगवान के भक्त भारत के साथ ही दुनिया के कई हिस्सों में हैं। कंबोडिया हिन्द चीन बर्मा और थाईलैड से लेकर नेपाल, अफगानिस्तान और कई पश्चिमी देशों में भी गणेशजी की पूजा की जाती रही है।

इन्हें ज्ञान और बुद्धि का देवता माना जाता है। इसीलिए इन्हें क्रोध नहीं आता। क्रोध वहीं है जहां अज्ञान है। ऐसे हैं हमारे प्रिय गणपति बप्पा.. और एक हैं इनके पप्पा शिवजी, जिन्हें गुस्सा आ जाए तो अपने तांडव नृत्य से धरती अंबर हिला दें। गणेशजी को पानी के लोटे में डुबोए रखने पर भी वो उफ नहीं करते (मान्यता है कि ऐसा करने से संकट टल जाता है)। उनकी मूर्ति को हर साल विसर्जित कर देने पर भी वे हर बरस हंसते हुए विराजित होने आते हैं। इसी धैर्य और सहनशीलता के कारण वे विघ्नेश्वर और विघ्नहर्ता कहलाते हैं। 

हर तरह की पूजा में गणेशजी की उपस्थिति अपरिहार्य है। अपने नाम की सुपारी रख कर पूजा किए जाने पर भी वो नाराज नहीं होते, बल्कि मदद ही करते हैं। कार्य की शुरुआत गणेशजी का स्मरण एक दूसरे का पर्याय ही हैं। ऐसे हमेशा अपने से लगने वाले श्री गणेश को बारंबार नमन और अगले बरस जल्दी आने का आग्रह।