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Saturday, 28 January 2012

देवस्थानों के अंदर सभी श्रद्धालु जूते-चप्पल बाहर उतारकर ही प्रवेश करते हैं।

भगवान या परमात्मा एक ऐसी शक्ति हैं जिनके लिए किसी भी समस्या या इच्छा पूर्ति असंभव नहीं है। देवी-देवताओं के दर्शन मात्र से ही हमारे पापों का नाश हो जाता है और पुण्यों में बढ़ोतरी होती है। इस प्रकार पुण्य लाभ प्राप्त करने के लिए हम मंदिर या देव स्थान जाते हैं। मंदिर या देवी-देवताओं के स्थानों पर जाने के लिए कई प्रकार के नियम बनाए गए हैं। इन्हीं नियमों में से एक है कि मंदिर में नंगे पैर जाना चाहिए। मंदिर में नंगे पैर जाना चाहिए यह एक अनिवार्य परंपरा है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा जैनालयों आदि देवस्थानों के अंदर सभी श्रद्धालु जूते-चप्पल बाहर उतारकर ही प्रवेश करते हैं। मंदिरों में नंगे पैर प्रवेश करने के पीछे कई कारण हैं। जैसे- देवस्थानों का निर्माण कुछ इस प्रकार से किया जाता है कि उस स्थान पर काफी सकारात्मक ऊर्जा एकत्रित होती रहती है। नंगे पैर जाने से वह ऊर्जा पैरों के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश कर जाती है। जो कि हमारे स्वास्थ्य के लिए भी बहुत लाभदायक रहती है। नंगे पैर चलना एक्यूप्रेशर थैरेपी ही है और एक्यूप्रेशर के फायदे सभी जानते हैं। हम देवस्थानों में जाने से पूर्व कुछ देर ही सही पर जूते-चप्पल रूपी भौतिक सुविधा का त्याग करते हैं। इस त्याग को तपस्या के रूप में भी देखा जाता है। जूते-चप्पल में लगी गंदगी से मंदिर की पवित्रता भंग ना हो, इस वजह से हम उन्हें बाहर ही उतारकर देवस्थानों में नंगे पैर जाते हैं।