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Wednesday, 23 January 2013

मित्रता से भक्ति और सत्संग में बाधा आती है

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दुनिया सेती दोसती, होय भजन के भंग
एका एकी राम सों, कै साधुन के संग।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दुनिया के लोगों के साथ मित्रता बढ़ाने से भगवान की भक्ति में  बाधा आती है। एकांत में बैठकर भगवान राम का स्मरण करना चाहिये या साधुओं की संगत करना चाहिए तभी भक्ति प्राप्त हो सकती है।
ऊजल पहिनै कापड़ा, पान सुपारी खाय
कबीर गुरु की भक्ति बिन, बांधा जमपुर जाय।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि लोग साफ-सुथरे कपड़े पहन कर पान और सुपारी खाते हुए जीवन व्यतीत करते हैं। गुरु की भक्ति के बिना उनका जीवन निरर्थक व्यतीत करते हुए मृत्यु को प्राप्त होते हैं
वर्तमान संदर्भ में सम्पादकीय  व्याख्या-भक्ति लोग अब जोर से शोर मचाते हुए कर रहे हैं। मंदिरों और प्रार्थना घरों में फिल्मी गानों की तर्ज पर भजन सुनकर लोग ऐसे नृत्य करते हैं मानो वह भगवान की भक्ति कर रहे हैं। समूह बनाकर दूर शहरों में मंदिरों में स्थित प्रतिमाओं के दर्शन करने जाते हैं। जबकि इससे स्वयं और दूसरों को दिखाने की भक्ति तो हो जाती है, पर मन में संतोष नहीं होता। मनुष्य भक्ति करता है ताकि उसे मन की शांति प्राप्त हो जाये पर इस तरह भीड़भाड़ में शोर मचाते हुए भगवान का स्मरण करना व्यर्थ होता है क्योंकि हमारा ध्यान एक तरफ नहीं लगा रहता। सच तो यह है कि भक्ति और साधना एकांत में होती है। जितनी ध्यान में एकाग्रता होगी उतनी ही विचारों में स्वच्छता और पवित्रता आयेगी। अगर हम यह सोचेंगे कि कोई हमारे साथ इस भक्ति में सहचर बने तो यह संभव नहीं है। अगर कोई व्यक्ति साथ होगा या हमारा ध्यान कहीं और लगेगा तो भक्ति भाव में एकाग्रता नहीं आ सकती। अगर हम चाहते हैं कि भगवान की भक्ति करते हुए मन को शांति मिले तो एकांत में साधना का प्रयास करना चाहिए।
कहने का अभिप्राय यह है कि भक्ति और सत्संग का मानसिक लाभ तभी मिल सकता है जब उसे एकांत में किया जाये। अगर शोर शराबे के साथ भीड़ में भक्ति या भजन गायेंगे तो फिर न केवल अपना ध्यान भंग होगा बल्कि दूसरे के कानों में भी अनावश्यक कटु स्वर का प्रसारण करेंगे।