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Friday, 18 January 2013

दीन हुये बिना दीनदयाल

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दीन हुये बिना दीनदयाल मिले भी तो कैसे ...??जब तक संसारकी आशा नहीं छूटेगी तब तक दीनावस्था नहीं आयेगी और दीन हुये बिना दीनदयाल भी प्राप्त नहीं होंगे ! दीन परमात्माके प्रति अनन्य होता है, और अपने अनन्य भक्तोंके लिये भगवान् को भी अनन्य होना पड़ता है ! भगवान् गीतामें अपने श्रीमुखसे गीतामें कहते है ! "ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्" भगवान् कहते हैं कि जो जिस प्रकारसे मुझे भजता है मैं भी उसी प्रकारसे उसे भजता हुँ ! ...श्रीराधेश्याम...हरि हर