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Friday, 18 January 2013

भिक्षुकोपनिषद ज्ञान । Knowledge Of Bhikshuka Upanishad

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भिक्षुकोपनिषद संन्यासियों के महत्व एवं उनके कार्यों पर प्रकाश डालता है. उपनिषद में मोक्ष की इच्छा रखने वाले भिक्षुओं के स्वरूप का आंकलन किया गया है. यहां पर इन्हें चार श्रेणियों कुटीचक, बहूदक, हंस एवं परमहंस में बांटा गया है जिसमें से सर्वप्रथम है,

कुटीचक
कुटीचक्र भिक्षु योग द्वारा मोक्ष प्राप्ति का प्रयास करते हैं उनके लिए भोजन केवल इतना ही होता है कि जिससे वह अपने शरीर की रक्षा कर सकें अपने को कठिन साधना मार्ग द्वारा स्थिर करने का प्रयास करते हैं. गौतम, भारद्वाज, याज्ञवल्क्य एवं वसिष्ठ ऋषियों की भांति आठ ग्रास भोजन ग्रहण करते हैं तथा साधना में लीन रहते हैं.

बहूदक
बहूदक संन्यासियों का एक भेद है यह एक ऎसे संन्यासी होते हैं जो सात घरों से भिक्षा मांगकर अपना निर्वाह करते हैं, इनके लिये त्रिदंड, कमंडलु, गात्राच्छादन, कंथा, पादुका, शिक्य, कौपीन, छत्र, पवित्र, काषाय वस्त्र, रुद्राक्षमाला, बहिर्वास, एवं कृपाण को धारण करने का विधान है.

इन्हें सर्वांग में भस्म तथा मस्तक पर त्रिपुंड धारण करते हैं इन्हें शिखासूत्र नहीं त्याग करना चाहिए इन्हें योग्याभ्यास द्वारा अपने मार्ग का चयन करना आना चाहिए. भौतिक वासनाओं का त्याग लोभ से मुक्ति इनके लिए आवश्यक है भिक्षा द्वारा आठ ग्रास भोजन ग्रहण करते हैं यदि एक ही जगह से भरपेट भोजन मिले तो भी नहीं लेना चाहिए योगमार्ग साधना द्वारा मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं.

हंस
हंस वर्ग का संन्यासी बहूदक के बाद की श्रेणी का होता है हंस संन्यासी भिक्षु किसी ग्राम में एक रात्रि से अधिक नहीं रहता, किसी नगर में वह पांच रातों तक, किसी तीर्थक्षेत्र में सात रात्रि से अधिक निवास नहीं करता है. हंस भिक्षु गोमूत्र को ग्रहण करने वाला तथा नियमित रूप से चान्द्रायण व्रत का पालन करता है यह संन्यासी योग साधना के मार्ग पर चल कर मोक्ष की खोज करता है.

परमहंस
परमहंस श्रेणी का भिक्षु अपना निवास स्थान किसी वृक्ष के नीचे, किसी शून्य गृह में अथवा श्मशान में बनाते हैं. परमहंस आश्रम में प्रवेश करने पर संन्यासी समस्त बंधनों से मुक्त होइ जाता है उसे तर्पण, श्राद्ध, संध्या आदि की आवश्यकता नहीं होती देवार्चन भी उसके लिये नहीं हैं वह अध्यात्मनिष्ठ होकर निर्द्वद्वं एवं निराग्रह भाव से ब्रह्म में स्थित रहने का कार्य करता है.

परमहंस संन्यासी भिक्षु के लिए “द्वैत भाव” का कोई अभिमत नहीं होता सभी वस्तुएं समान हैं स्वर्ण हो या मिट्टी कोई भेद नहीं होता, सभी वर्णों में समान भाव से भिक्षावृत्ति करते हैं संवर्तक, आरूणि, श्वेतकेतु, जड़भरत, दत्तात्रेय, शुकदेव, वामदेव और हारीतक आदि की तरह आठ ग्रास भोजन ग्रहण करके योग साधना में प्रयत्नशील रहते हैं तथा समस्त प्राणियों में अपनी 'आत्मा' को पाते हैं, यह भिक्षुक शुद्ध मन से परमहंस वृत्ति का पालन करते हुए देह का त्याग करते हैं और मोक्ष को पाते हैं.

भिक्षुकोपनिषद महत्व
भिक्षुकोपनिषद संन्यासियों के विभिन्न भेदों का उल्लेख करता है अपने स्वरूप की भांति यह उपनिषद संन्यासी भिक्षु का भेद व्यक्त करता है. संन्यासी जो ज्ञान की परमावस्था को प्राप्त करने के लिए निम्न श्रेणीयों को पाता है तथा परमहंस होकर सच्चिदानंद ब्रह्म मैं ही हूँ' इस अर्थ को पूर्ण रूप से अनुभव करता है, कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस जो चार प्रकार के अवधूत कहे गए हैं जिन सबमें परमहंस सबसे श्रेष्ठ माना गया है. यह सभी वर्ग अपने अपने कार्यों द्वारा ब्रह्म को जानने का प्रयास करते हैं तथा मोक्ष को पाने की कामना रखते हैं.