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Thursday, 14 February 2013

नग्न साधुओं पर प्रतिक्रिया

www.goswamirishta.com

महाकुंभ विशेष : 
कुछ व्यक्तियोंने महाकुंभमें विचरते नग्न साधुओंपर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पूछा है कि जहां मां-बहनें आती हैं, वहां साधुओंका नग्न होकर घूमना कहां तक उचित है? क्या यह भारतीय संस्कृति है ? 
उत्तर : पाश्चात्य देशोंमें कई बार कुछ जन अपने विषयकी ओर ध्यान आकृष्ट करनेके लिए नग्न होकर प्रदर्शन करते हैं !! वहां नग्न होकर प्रदर्शन करनेका उद्देश्य होता है, सभीका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करना ! महाकुम्भ्में योगी और महात्मा नग्न होकर विचरते हैं, वहां वे यह सब किसीका ध्यान आकृष्ट करनेके लिए नहीं करते | ध्यान रहे, हम सबकी उत्पत्ति ईश्वरसे हुई, परंतु हमें वह बोध अखंड नहीं होता क्योंकि हमारे अंदर देह बुद्धि होती है, अर्थात “मैं ब्रह्म हूं ” के स्थान पर मैं देह हूं और मैं फलां-फलां हूं, यह विचार अधिक प्रबल होता है | जब तक मैं देह हूं, यह विचार प्रबल रहता है, ईश्वरकी प्रचीति नहीं हो सकती !
नग्न दो प्रकारके योगी रहते हैं – एक जो परमहंसके स्तरके संत होते हैं, उनसे स्वतः ही वस्त्रका त्याग हो जाता है क्योंकि उनकी देह बुद्धि समाप्त हो जाती हैं | ऐसे उच्च कोटिके योगी इस संसारमें विरले ही हैं | दूसरे प्रकारके नग्न योगी हठयोगी होते है, वे अंबरको अपना वस्त्र मानते हैं और वे अपने मनके विरुद्ध जाकर सर्व वस्त्र एवं सर्व बंधन त्याग कर साधनारत होते हैं | उनमेंसे कुछ शैव उपासक भी होते हैं तो कुछ अन्य पंथ अनुसार दिगंबर साधू होते हैं ! जो शैव साधू होते हैं, वे शिवसे एकरूप होने हेतु शिवको प्रिय हैं, वे उनका उपयोग करते हैं |
देह बुद्धि रहते हुए वस्त्रका त्याग, लोगोंका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने हेतु नहीं अपितु साधना हेतु करने वालेके प्रति हीन भावना नहीं, आदरकी भावना होनी चाहिए | कुम्भमें नग्न साधुओंकी विशाल सेना इस बातका द्योतक है कि आज जब कलियुग अपने चरम पर है, तब भी ये हठयोगी अपनी संस्कृति, साधू परंपरा और अपने योगमार्गको बनाए रखने हेतु प्रयत्नशील हैं | ऐसी श्रेष्ठ परंपराका पोषण करने वाली इस दैवी, सनातन, वैदिक परंपराके प्रति हमें गर्व होना चाहिए न कि लज्जा ! और इन हठयोगी नग्न साधू परंपराने समय-समय पर सनातन संस्कृतिका शस्त्र और शास्त्र दोनोंके माध्यमसे रक्षण किया है; अतः इन धर्मरक्षक सात्त्विक सैनिकोंके प्रति प्रत्येक हिन्दुको गर्व होना चाहिये ! 

महाकुंभ विशेष :
कुछ व्यक्तियोंने महाकुंभमें विचरते नग्न साधुओंपर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पूछा है कि जहां मां-बहनें आती हैं, वहां साधुओंका नग्न होकर घूमना कहां तक उचित है? क्या यह भारतीय संस्कृति है ?
उत्तर : पाश्चात्य देशोंमें कई बार कुछ जन अपने विषयकी ओर ध्यान आकृष्ट करनेके लिए नग्न होकर प्रदर्शन करते हैं !! वहां नग्न होकर प्रदर्शन करनेका उद्देश्य होता है, सभीका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करना ! महाकुम्भ्में योगी और महात्मा नग्न होकर विचरते हैं, वहां वे यह सब किसीका ध्यान आकृष्ट करनेके लिए नहीं करते | ध्यान रहे, हम सबकी उत्पत्ति ईश्वरसे हुई, परंतु हमें वह बोध अखंड नहीं होता क्योंकि हमारे अंदर देह बुद्धि होती है, अर्थात “मैं ब्रह्म हूं ” के स्थान पर मैं देह हूं और मैं फलां-फलां हूं, यह विचार अधिक प्रबल होता है | जब तक मैं देह हूं, यह विचार प्रबल रहता है, ईश्वरकी प्रचीति नहीं हो सकती !
नग्न दो प्रकारके योगी रहते हैं – एक जो परमहंसके स्तरके संत होते हैं, उनसे स्वतः ही वस्त्रका त्याग हो जाता है क्योंकि उनकी देह बुद्धि समाप्त हो जाती हैं | ऐसे उच्च कोटिके योगी इस संसारमें विरले ही हैं | दूसरे प्रकारके नग्न योगी हठयोगी होते है, वे अंबरको अपना वस्त्र मानते हैं और वे अपने मनके विरुद्ध जाकर सर्व वस्त्र एवं सर्व बंधन त्याग कर साधनारत होते हैं | उनमेंसे कुछ शैव उपासक भी होते हैं तो कुछ अन्य पंथ अनुसार दिगंबर साधू होते हैं ! जो शैव साधू होते हैं, वे शिवसे एकरूप होने हेतु शिवको प्रिय हैं, वे उनका उपयोग करते हैं |
देह बुद्धि रहते हुए वस्त्रका त्याग, लोगोंका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने हेतु नहीं अपितु साधना हेतु करने वालेके प्रति हीन भावना नहीं, आदरकी भावना होनी चाहिए | कुम्भमें नग्न साधुओंकी विशाल सेना इस बातका द्योतक है कि आज जब कलियुग अपने चरम पर है, तब भी ये हठयोगी अपनी संस्कृति, साधू परंपरा और अपने योगमार्गको बनाए रखने हेतु प्रयत्नशील हैं | ऐसी श्रेष्ठ परंपराका पोषण करने वाली इस दैवी, सनातन, वैदिक परंपराके प्रति हमें गर्व होना चाहिए न कि लज्जा ! और इन हठयोगी नग्न साधू परंपराने समय-समय पर सनातन संस्कृतिका शस्त्र और शास्त्र दोनोंके माध्यमसे रक्षण किया है; अतः इन धर्मरक्षक सात्त्विक सैनिकोंके प्रति प्रत्येक हिन्दुको गर्व होना चाहिये !