मैं तो ब्रह्म हूं, मैं तो शिव हूं, अनादि, अनंत शिव हूं। जय गौरी शंकर।। जय महाकाल।।

 


मैं न तो मन हूं, न बुद्धि, न अहंकार, न ही चित्त हूं, मैं न तो कान हूं, न जीभ, न नासिका, न ही नेत्र हूं, मैं न तो आकाश हूं, न धरती, न अग्नि, न ही वायु हूं, मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं। जय गौरी शंकर।। जय महाकाल।। न मैं शरीर हूं, न मैं प्राण हूं, न मैं संकल्प, न मैं शब्द हूं, न मैं रूप हूं, न मैं कोई विकार, न मैं सुख हूं, न मैं दुख हूं, न मैं मोह हूं, न मैं बंधन हूं, न मैं मुक्ति हूं, मैं तो निराकार, अनादि, अनंत शिव हूं। जय गौरी शंकर।। जय महाकाल।। न मैं स्त्री हूं, न मैं पुरुष हूं, न कोई रूप धरूं, न मैं लोभ हूं, न मैं क्रोध हूं, न अहंकार को अपनाऊं, न मैं ध्यान हूं, न मैं भक्ति हूं, न मैं पूजा हूं, न मैं कोई फल चाहता, न कोई इच्छा संजोऊं, मैं तो आत्मा हूं, परम शुद्ध ब्रह्म हूं, अनादि, अनंत शिव हूं। जय गौरी शंकर।। जय महाकाल।। न मैं जीवन हूं, न मैं मृत्यु हूं, न कोई बीच की स्थिति, न मैं भ्रम हूं, न मैं सत्य हूं, न किसी में कोई असंयम, न मैं किसी काल हूं, न मैं समय हूं, न कोई स्थान हूं, न मैं मोह-माया का जाल हूं, न ही मैं जन्म-मृत्यु का खेल हूं, मैं तो ब्रह्म हूं, मैं तो शिव हूं, अनादि, अनंत शिव हूं। जय गौरी शंकर।। जय महाकाल।।
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दवा से ज्यादा अपनेपन से भरे मीठे बोल की जरूरत होती है

 नवविवाहित जोड़ा किराए पर मकान देखने के लिए वर्मा जी के घर पहुँचा।

दोनों पति-पत्नी को देखकर वर्मा दंपत्ति खुश हो गए, सोचा—चलो, कुछ रौनक होगी, कितना सुंदर जोड़ा है, इन्हें मकान जरूर देंगे।

"आंटी, अंकल! हमें दो कमरे और एक किचन वाला मकान चाहिए, क्या हम देख सकते हैं?"

घुटनों के दर्द से जूझ रहीं सुनीता जी उठते हुए बोलीं, "हाँ बेटा, क्यों नहीं, देख लो!"

बाजू में एक छोटा पोर्शन किराए के लिए बनवाया था, जिससे आर्थिक सहायता भी हो जाएगी और सूने घर में रौनक भी आ जाएगी।

मकान सुमन और अजय को बहुत पसंद आया। "अंकल, हम कल ही शिफ्ट हो जाएंगे!"

अरुण जी मुस्कुराए, "बिल्कुल बेटा, स्वागत है!"

दूसरे दिन से घर में नई रौनक आ गई।

सारा दिन सामान जमाने के बाद जैसे ही सुमन और अजय थोड़ा आराम करने बैठे, दरवाजे की घंटी बज उठी।

दरवाजा खोला तो सामने अरुण जी खड़े थे। "बेटा, आंटी ने तुम्हें खाने के लिए बुलाया है।"

अजय झिझकते हुए बोला, "अरे, क्यों तकलीफ की आंटी ने? हम तो बाहर से ऑर्डर करने ही वाले थे!"

पोपले मुँह से हँसते हुए अरुण जी बोले, "आज तो थके हुए हो, खा लो, कल से अपने हिसाब से इंतज़ाम कर लेना!"

धीरे-धीरे सुमन और अजय का वर्मा दंपत्ति से एक अनजाना सा लगाव हो गया। जब उन्हें पता चला कि उनके दोनों बेटे विदेश में स्थायी रूप से बस चुके हैं, तो दोनों का मन भर आया।

रात में सुमन ने कहा, "अजय, सारी रात अंकल की खाँसी और कराहने की आवाज़ आ रही थी, देख आओ, कहीं तबियत ज्यादा खराब न हो!"

अजय बोला, "हाँ, मैं देखता हूँ, तुम नाश्ता बना लो, साथ ही अंकल-आंटी के साथ खा लेंगे!"

अजय ऊपर पहुँचा तो सुनीता जी बोलीं, "क्यों तकलीफ की बेटा? बुढ़ापे में तो ये सब लगा ही रहता है... कहीं हमारी वजह से तुम्हारी नींद तो नहीं खराब हुई?"

अजय मुस्कुराकर बोला, "अरे नहीं आंटी! मैं अभी अंकल को डॉक्टर के पास ले चलता हूँ, दवा से तबियत संभल जाएगी!"

सुनीता जी ने बेबसी से उसकी ओर देखा और हल्की आवाज़ में बोलीं, "बेटा, दवा से ज्यादा अपनेपन से भरे मीठे बोल की जरूरत होती है, बस यही कमी थी, जो तुम दोनों ने पूरी कर दी!"

यह कहते हुए उन्होंने अपने आँसू पोंछे, और अरुण जी की आँखें भी छलक पड़ीं...!

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