अपने पास ही छुपी हुई खूबसूरती

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हम सारी दुनिया घूमते और खूबसूरती तलाशते रहते हैं .. कभी मुड़ के भी नहीं देखते .. अपने पास ही छुपी हुई खूबसूरती की और,दुनिया की सबसे अच्छी और खूबसूरत चीजें कभी देखी या छुई नहीं गई, वे बस दिल के साथ घुल – मिल गईं|वह सुन्दरता श्रीहरी के बीना कहीं मिली नही आशु को|....

कभी भी कुछ सुंदर देखने का मौका मत छोडो, सच तो यह है कि खूबसूरती भगवान की लिखावट है .. हर चेहरे पर, धुले-धुले आसमान में, हर फूल में उसकी लिखावट नज़र आएगी .. और हे भगवान, इस सौंदर्य के लिये हम आपके आभारी हैं| ....
जो सुंदरता आंखों द्वारा देखी जाती है , वह कुछ ही पल कि होती है , यह जरूरी भी नहीं कि हमारे भीतर से भी वही खूबसूरती दिखाई दे,खूबसूरती चेहरे पर नही होती| ये तो दिल की रोशनी है, बहुत ध्यान से देखनी पड‍़ती है|...

बिना श्रृंगार के मन मोहती है,वास्तविक सोन्दर्य ह्रदय की पवित्रता में है,सुन्दर वही हो सकता है जो कल्याणकारी हो,वह सुन्दरता श्रीहरी के बीना कहीं मिली नही ...प्यारे श्रीहरी ये दिल दीवाना तेरा हैं.... .......हरी ॐ भगवान् को प्रिय है हरिनाम .... 
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दीन हुये बिना दीनदयाल

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दीन हुये बिना दीनदयाल मिले भी तो कैसे ...??जब तक संसारकी आशा नहीं छूटेगी तब तक दीनावस्था नहीं आयेगी और दीन हुये बिना दीनदयाल भी प्राप्त नहीं होंगे ! दीन परमात्माके प्रति अनन्य होता है, और अपने अनन्य भक्तोंके लिये भगवान् को भी अनन्य होना पड़ता है ! भगवान् गीतामें अपने श्रीमुखसे गीतामें कहते है ! "ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्" भगवान् कहते हैं कि जो जिस प्रकारसे मुझे भजता है मैं भी उसी प्रकारसे उसे भजता हुँ ! ...श्रीराधेश्याम...हरि हर
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छोटे छोटे निर्णय

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श्रीहरि कहते हैं कभी कभी बहुत छोटे छोटे निर्णय ही

हमारे जीवन को हमेशा के लिए बदल देते हैं,

बहुधा वातावरण में परिवर्तन से कहीं अधिक

व्यक्ति के भीतर ही बदलाव की ज़रूरत होती है |..

श्रीहरि कहते हैं दुनिया बदलने की शुरुआत हमें

उस चेहरे से करनी चाहिए,

जो हमें आईने में नजर आता है,

बदलाव से पूरी मुक्ति मतलब

गलतियों से पूरी मुक्ति है, लेकिन यह तो

अकेली सर्वज्ञता का विशेषाधिकार है।...

श्रीहरि कहते हैं विचार से कर्म की उत्पत्ति होती है,

कर्म से आदत की उत्पत्ति होती है,

आदत से चरित्र की उत्पत्ति होती है

और चरित्र से आपके

प्रारब्ध की उत्पत्ति होती है. ...

श्रीहरि कहते हैं बुद्धिमान व्यक्तियों की प्रशंसा की जाती है,

धनवान व्यक्तियों से ईर्ष्या की जाती है,

बलशाली व्यक्तियों से डरा जाता है

लेकिन विश्वास केवल चरित्रवान

व्यक्तियों पर ही किया जाता है,

तुम बर्फ के समान विशुद्ध रहो

और हिम के समान स्थिर तो भी

लोक निन्दा से नहीं बच पाओगे ....
श्रीहरि कहते हैं अच्छी आदतों से शक्ति की बचत होती है,

अवगुण से बर्बादी,

चरित्र एक वृक्ष है, मान एक छाया।

हम हमेशा छाया की सोचते हैं,

लेकिन असलियत तो वृक्ष ही है।

बुद्धि के साथ सरलता, नम्रता तथा

विनय के योग से ही सच्चा चरित्र बनता है|.....
श्रीहरि कहते हैं सुन्दर आचरण, सुन्दर देह से अच्छा है,

जैसे आचरण की तुम दूसरों से अपेक्षा रखते हो,

वैसा ही आचरण तुम दूसरों के प्रति करो |

दूसरों को क्षति पंहुचाकर अपनी

भलाई कि आशा नहीं करनी चाहिए |

चरित्रवान व्यक्ति अपने पद और

शक्ति का अनुचित लाभ नहीं उठाते |

चरित्र आत्मसम्मान की नींव है |
अपने चारित्रिक सुधार का

आर्किटेक्ट खुद को बनना होगा |....

दूसरों के गुण देखता है,

वही महान व्यक्ति बन सकता है,

चरित्र की शुद्धि ही सारे ज्ञान का

ध्येय होनी चाहिए संयम और श्रम मानव के

दो सर्वोत्तम चिकित्सक हैं |

अच्छा स्वभाव, सोंदर्य के अभाव को पूरा कर देता है | ....
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दया और साहस

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श्रीहरि कहते हैं हम सभी ईश्वर से दया की प्रार्थना करते हैं

और वही प्रार्थना हमें दया करना भी सिखाती है,

दयालु चेहरा सदैव सुंदर होता है।

जो सचमुच दयालु है,

वही सचमुच बुद्धिमान है,

और जो दूसरों से प्रेम नहीं करता

उस पर ईश्वर की कृपा नहीं होती।

दया के छोटे-छोटे से कार्य,

प्रेम के जरा-जरा से शब्द

हमारी पृथ्वी को स्वर्गोपम बना देते हैं। ...

श्रीहरि कहते हैं दया मनुष्य का स्वाभाविक गुण है,

दया दोतरफी कृपा है।

इसकी कृपा दाता पर भी होती है और पात्र पर भी।

अपने प्रयोजन में दृढ़विश्वास रखने वाला

एक कृशकाय शरीर भी

इतिहास के रुख को बदल सकता है,

निराश हुए बिना पराजय को सह लेना,

पृथ्वी पर साहस की सबसे बड़ी मिसाल है |....
श्रीहरि कहते हैं मानव के सभी गुणों में साहस पहला गुण है,

क्योंकि यह सभी गुणों की जिम्मेदारी लेता है,

प्रेरणा कि हर अभिव्यक्ति में पुरुषार्थ

और पराक्रम कि आवश्यकता है,

हर परिस्थिति में शांत रहने वाला

निश्चित ही शिखर को छुता है|..
श्रीहरि कहते हैं सच्चा साहसी वह है,

जो बड़ी से बड़ी विपत्ति को बुद्धिमत्तापूर्वक

सह सकता है,साहस का अर्थ होता है

यह पता होना कि किस बात से डरना नहीं चाहिए|

वह सच्चा साहसी है, जो कभी निराश नहीं होता |..
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मन स्वच्छ और हल्का रहेगा

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बहुत पुरानी कथा है। एक बार एक गुरु ने अपने सभी शिष्यों से अनुरोध किया कि वे कल प्रवचन में आते समय अपने साथ एक थैली में बड़े-बड़े आलू साथ लेकर आएं। उन आलुओं पर उस व्यक्ति का नाम लिखा होना चाहिए, जिससे वे नफरत करते हैं। जो शिष्य जितने व्यक्तियों से घृणा करता है, वह उतने आलू लेकर आए।
अगले दिन सभी शिष्य आलू लेकर आए। किसी के पास चार आलू थे तो किसी के पास छह। गुरु ने कहा कि अगले सात दिनों तक ये आलू वे अपने साथ रखें। जहां भी जाएं, खाते-पीते, सोते-जागते, ये आलू सदैव साथ रहने चाहिए। शिष्यों को कुछ समझ में नहीं आया, लेकिन वे क्या करते, गुरु का आदेश था। दो-चार दिनों के बाद ही शिष्य आलुओं की बदबू से परेशान हो गए।
जैसे-तैसे उन्होंने सात दिन बिताए और गुरु के पास पहुंचे। सबने बताया कि वे उन सड़े आलुओं से परेशान हो गए हैं। गुरु ने कहा- यह सब मैंने आपको शिक्षा देने के लिए किया था। जब सात दिनों में आपको ये आलू बोझ लगने लगे, तब सोचिए कि आप जिन व्यक्तियों से नफरत करते हैं, उनका कितना बोझ आपके मन पर रहता होगा। यह नफरत आपके मन पर अनावश्यक बोझ डालती है, जिसके कारण आपके मन में भी बदबू भर जाती है, ठीक इन आलुओं की तरह। इसलिए अपने मन से गलत भावनाओं को निकाल दो, यदि किसी से प्यार नहीं कर सकते तो कम से कम नफरत तो मत करो। इससे आपका मन स्वच्छ और हल्का रहेगा। सभी शिष्यों ने वैसा ही किया।
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संत नामदेव

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संत नामदेव अपने शिष्यों के साथ रोज की तरह धर्म चर्चा में लीन थे। तभी एक जिज्ञासु उनसे प्रश्न कर बैठा-गुरुदेव, कहा जाता है कि ईश्वर हर जगह मौजूद है, तो उसे अनुभव कैसे किया जा सकता है? क्या आप उसकी प्राप्ति का कोई उपाय बता सकते हैं? नामदेव यह सुनकर मुस्कराए। फिर उन्होंने उसे एक लोटा पानी और थोड़ा सा नमक लाने को कहा। वहां उपस्थित शिष्यों की उत्सुकता बढ़ गई।

वे सोचने लगे, पता नहीं उनके गुरुदेव कौन सा प्रयोग करना चाहते हैं। नमक और पानी के आ जाने पर संत ने नमक को पानी में छोड़ देने को कहा। जब नमक पानी में घुल गया तो संत ने पूछा- बताओ, क्या तुम्हें इसमें नमक दिख रहा है? जिज्ञासु बोला- नहीं गुरुदेव, नमक तो इसमें पूरी तरह घुल-मिल गया है। संत ने उसे पानी चखने को कहा।

उसने चखकर कहा- जी, इसमें नमक उपस्थित है पर वह दिखाई नहीं दे रहा। अब संत ने उसे जल उबालने को कहा। पूरा जल जब भाप बन गया तो संत ने पूछा- क्या इसमें वह दिखता है? जिज्ञासु ने गौर से लोटे को देखा और कहा-हां, अब इसमें नमक दिख रहा है। तब संत ने समझाया-जिस तरह नमक पानी में होते हुए भी दिखता नहीं, उसी तरह ईश्वर भी हर जगह अनुभव किया जा सकता है मगर वह दिखता नहीं। और जिस तरह जल को गर्म करके तुमने नमक पा लिया उसी प्रकार तुम भी उचित तप और कर्म करके ईश्वर को प्राप्त कर सकते हो। वहां मौजूद लोग इस व्याख्या को सुनकर संत नामदेव के प्रति नतमस्तक हो गए।
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कृष्ण कथा सुनने से और कृष्ण नाम के कीर्तन से

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कृष्ण कथा सुनने से और कृष्ण नाम के कीर्तन से ही

भक्ति रूपी बीज दृढ़ स्थित होता है।

मेरा कान्हा मोहब्बतों के सौदे भी अजीब करता है.....

बस मुश्कराता है और दिल खरीद लेता है........

मस्त आशु की ओर से शुभ प्रभात.... ♥♥

भक्तियोग कुछ छोड़ने की सीख हमें नहीं देता

":वह केवल कहता है ,""""परमेश्वर में आसक्त हो जाओ """

और जो परमेश्वर के प्रेम में उन्मक्त हो गया है ,

उसकी स्वभावत नीच विषयों में कोई प्रवृति नहीं रह सकती

"प्रभो ,में तुम्हारे बारे में और कुछ नहीं जानता ,

केवल ईतना जानता हु की ,

तुम मेरे हो !तुम सुन्दर हो !आहा तुम अवर्निये हो !

तुम सौन्दर्य स्वरूप हो !"""♥'जय जय श्रीहरिः
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आस्तिक भावना और ईश्वर में विश्वास

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श्रीहरि हज़ारों ऐब हैं मुझमें, नहीं कोई हुनर बेशक
मेरी ख़ामी को यूँ ख़ूबी में तू तब्दील कर देना
मेरी हस्ती है इक खारे समंदर-सी मेरे श्रीहरि!
तू अपनी रहमतों से इसको मीठी झील कर देना...मस्त ♥♥ आशु

एक बीज बढ़ते हुए कभी कोई आवाज नहीं करता,
मगर एक पेड़ जब गिरता है तो
जबरदस्त शोर और प्रचार के साथ,
विनाश में शोर है,
सृजन हमेशा मौन रहकर समृद्धि पाता है...मस्त ♥♥ आशु

आस्तिक भावना और ईश्वर में विश्वास
भारतीय संस्कृति का मुख्य अंग है,
हिंदू संस्कृति आध्यात्मिकता की
अमर आधारशिला पर आधारित है।
भारत की एकता का मुख्य आधार है एक संस्कृति,
जिसका उत्साह कभी नहीं टूटा।
यही इसकी विशेषता है। भारतीय संस्कृति अक्षुण्ण है,
क्योंकि भारतीय संस्कृति की धारा
निरंतर बहती रही है और बहेगी।
आधुनिकता की सबसे बड़ी समस्या यह है कि
हमारी संस्कृति विज्ञान
जितनी प्रगति नहीं कर पाई है ..
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तन्मय

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तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस और वाल्मीकि रचित रामायण में रावण को विलेन का रोल अदा करते हुए दिखाया गया है। जिसका वध रामजी ने किया। ये सब प्रतीक हैं, जिनका खुलासा करना जरूरी है। इन ग्रंथों में वर्णित रावण के दस सिर असल में दस नकारात्मक प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं। ये प्रवृत्तियां हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, घृणा, ईर्ष्या, द्वेष एवं भय। काम का अर्थ है- पुत्रैषणा अर्थात स्त्री संभोग की चाह, वित्तैषणा अर्थात धन कमाने की चाह, लोकैषणा यानी यश कमाने की चाह।

गीता में भी श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन, तू पूरी शक्ति से इस काम रूपी दुर्जय शत्रु को मार। उन्होंने बताया कि किस प्रकार काम से क्रोध तथा अन्य दुष्प्रवृत्तियों का जन्म होता है और इससे मनुष्य के भीतर मौजूद प्राण तत्व का स्तर एक आवश्यक स्तर से नीचे चला जाता है। इससे मानव शरीर में विभिन्न तरह के रोगों के पनपने की जमीन तैयार हो जाती है। इनमें आधुनिक रोग जैसे डायबिटीज, ब्लडप्रेशर, दिल का दौरा, टीबी, पक्षाघात, कैंसर और एड्स जैसी बीमारियां भी शामिल हैं।



मान लीजिए किसी गांव में तीन सौ लोग रहते हैं। वहां हैजा फैलता है तो सौ लोग बीमार होकर मर जाते हैं, दूसरे सौ लोग बीमार होते हैं, पर ठीक हो जाते हैं। परंतु सौ लोग ऐसे भी हैं जो बीमार ही नहीं होते। इसका कारण यही है कि तीनों प्रकार के लोगों में काम, क्रोध आदि रूपी रावण के कारण उनके प्राणिक स्तर अलग-अलग थे। मक्खी वहीं बैठती है, जहां गंदगी होती है। बैक्टीरिया या वायरस तभी असर करते हैं, जब रावण द्वारा उनको पनपने के लिए जमीन तैयार मिलती है अर्थात जब दस मनोभावों द्वारा मन और शरीर दूषित हो चुका होता है।

रामायण और महाभारत के लेखन का उद्देश्य वेद के गूढ़ ज्ञान को सरल करना था। भाव यह था कि आम लोगों को ये बातें कथाओं के रूप में सरल भाषा में समझाई जाएं ताकि उन्हें उनके कर्तव्यों की शिक्षा दी जा सके। इनमें वर्णित घटनाएं हर युग में घटित होती हैं, बस उनके नाम एवं रूप बदल जाते हैं। सीता हरण एवं द्रोपदी चीर हरण, असत्य, छल, कपट, घोटाले जैसी घटनाएं आज भी हो रही हैं। जब ऐसा होता है, तब समाज का विनाश होता है।
डा. फिटजोफ कापरा ने अपनी पुस्तक 'ताओ ऑफ फिजिक्स' में कहा हैै : 'भारतीय धर्म के गूढ़ ज्ञानियों, विशेषकर हिंदुओं ने ज्ञान को कहानियों, अलंकारों एवं प्रतीकों की भाषा में लिखा है। उन्होंने अपनी श्रेष्ठ कल्पना शक्ति से अनेकों देवी-देवताओं की कल्पना की, जो इन कहानियों के पात्र बने और इन्हें इन दो महाकाव्यों में संग्रह किया।'

वेद की मुख्य शिक्षा है कि इन दस नकारात्मक प्रवृत्तियों के कारण ही जीवात्मा को मृत्यु के बाद चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करते हुए अनेक प्रकार की यातनाएं झेलनी पड़ती हैं और जीवन-मृत्यु के अनंत चक्कर लगाने पड़ते हैं। इसलिए इसी मानव योनि में पूरा प्रयास करके मोक्ष पा लेना चाहिए। ऋषि जन यह समझा-समझा कर थक गए, तब उन्हें भगवान राम और भगवान विष्णु की कहानी गढ़नी पड़ी। जो बात ऋषि कह रहे थे, उसी को दोनों भगवानों के मुख से कहलवा दिया।

वेद हिंदुओं का आधारभूत ग्रंथ है। उसमें कहीं भी राम और कृष्ण का जिक्र नहीं है। इस प्रकार के लेखन का उद्देश्य था कि समाज में पापाचार कम से कम हों और जनमानस एक पीढ़ी में न सही, तो धीरे-धीरे प्रयास करते संस्कारित हो। इसलिए उन्होंने प्रतीकों का जाल तैयार किया तथा मूर्ति पूजा का विधान बनाकर सनातन धर्म की स्थापना की। पूरे समाज को आस्था एवं विश्वास के बल पर श्रीराम एवं श्रीकृष्ण की भक्ति का संदेश देकर मोक्ष के स्थान पर मुक्ति पाने का सुगम मार्ग बतलाया।
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प्रेम कैसा होता है

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आजतक जिस जिसने प्रेम के विषयमें वर्णन किया है, या अपने अनुभवको बतलाया है कि यह प्रेमका स्वरूप है अथवा यह प्रेमका स्वरूप नहीं है - जो ऐसी बातें कहते है, वे वेद-शास्त्रका अध्यन करनेपर भी प्रेमके विषयमें कुछ नहीं जानते ! तात्पर्य यह है कि प्रेमका स्वरूप अनिवर्चनीय है ! जिस समय तक हृदयमें विचार करनेकी सोच रहती है, उस समय तक प्रेमकी स्तिथि नहीं हो सकती ! अन्य विषयोंके विचारोको बतलाना तो दूर रहे,प्रीतीके स्वरूपके प्रति विचारशील व्यक्ति भी प्रीतीका अधिकारी नहीं हो सकता ! यदि एकमात्र प्रियतमकी सुख कामनाके अन्य कोई भी ज्ञान हृदयमें रहता है, तो उस हृदयमें प्रेमका अंकुर नहीं फुटता ! "क्या करनेसे प्रियतम सुखी हो सकता है " इस चिंतामें तन्मय होनेकी अवस्थाका नाम ही प्रेम है ! इस अवस्थामें विचार बोध रह ही नहीं सकता ! जीवके जो विचार कहते है, उनसे प्रेमका अनुभव प्राप्त हो ही नहीं सकता ! सही मायनेमें विचारके द्वारा सभी शास्त्रोंको तो जाना जा सकता है, परन्तु प्रेमको नहीं ! 
यदि कोई व्यक्ति प्रेमतत्व जाननेके इच्छुक किसी अन्य व्यक्तिको प्रेम समझानेकी चेष्ठा करता है, तब वह जो कुछ भी समझाता है अथवा उसका जो कुछ अनुभव होता है, वह मात्र विडम्बनामात्र है ! प्रेम एक अनिवर्चनीय श्रेष्ठ वस्तु है ! तात्पर्य यह है कि प्रेम स्वानुभव तथा निरुपम है, इसे भाषाके द्वारा बतलाया जा ही नहीं सकता !...श्रीराधेश्याम...हरि हर
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