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Tuesday, 19 September 2017

"दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई" आखिर क्यों बनाई भगवान् ने दुनिया?

सारि दुनिया के लोग जब कभी अकेले में अपने मन या आत्मा से बातें करते है तो उनके भीतर ये सवाल उठता होगा की जब सबको एक दिन मरना ही है, तो फिर ऊपर वाले ने दुनिया बनाई ही क्यों है? इससे अच्छा तो वो पैदा ही न हो, अगर आपके भी मन में ये सवाल पैदा हुआ है तो आज जाने उसका संभव प्रयास में जवाब.

भारतीय पौराणिक इतिहास दुनिया में सबसे पुराने समय के होने का दावा करता है जो की कमोबेश सही भी है, तो वो क्या कहता है इस सवाल के बारे में? इसके अनुसार एक समय था जब धरती पर केवल जल था और सिर्फ त्रिदेवो (ब्रह्मा विष्णु महेश) का ही अस्तित्व था जिनका न कोई आदि ही है और न ही अंत.तब एक दिन भगवान् विष्णु शेष शय्या पे सोये हुए थे तब उनकी कान की किट्टी(कचरा) से दो भयंकर असुर पैदा हुए जिनका नाम मधु और कैटभ था. अपने प्रकट होते ही भगवान की नाभि से निकले कमल में बैठे ब्रह्मा जी की और बढ़े, ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु की पलकों वक्ष और बाँहो में समाहित योगनिंद्र का पहली बात ध्यान किया.

उनके प्रकट होते ही भगवान विष्णु की निंद्रा खुल गई और उन्होंने ब्रह्मा जी को बचाने के लिए उनसे युद्ध आरम्भ कर दिया, लेकिन 5000 साल तक उनसे द्वन्द करने पर भी वो उन्हें पराजित न कर सके. लेकिन ब्रह्मा जी के कहने पर योगमाया ने उनकी बुद्धि फेरी और उन दो दानवो मधु और कैटभ ने विष्णु के युद्ध से खुश होके वरदान मांगने बोला.
उन्होंने ये शर्त रखी जन्हा धरती जल में न डूबी हो वंही हमारी मृत्यु हो इतना कहना था की भगवान विष्णु ने दोनों का सर अपनी जंघा पे रखा और सुदर्शन से काट दिए. ये दोनों दानव कुछ और नहीं बल्कि भगवान् के मन के विकार थे जिनकी शक्ति देख वो भी चिंता में आ गए.

सम्भवतः इस कारण ही उन्होंने ऐसी घटना की पुनरावृति रोकने के लिए ब्रह्मा जी को श्रिष्टि की रचना आरम्भ करने के लिए कहा था. इस हेतु भगवान् ने अपने ही असंख्यों अंश क्र लिए जिन्हे हम आत्मा कहते है, इस हिसाब से हम भगवान् का ही अंश है और भगवान् ने हमें अपने मन के विकारों को कम करने के लिए धरती पर भेज है.भगवान् अपनी तरह से हर प्रयास करते है की हम इसी की चेस्टा करें लेकिन भगवान् ने ही जब अपने शारीर के अंश किये और पहली दफा औरत और मर्द बनाए तो वो तुरंत भगवान में फिर समाहित हो गए. तब योगमाया की सहायता से उन अंशों को मोहमाया में डाला गया और दोनों के मिलन से श्रष्टि चक्र बढ़ा.

अब ये हम पे निर्भर करता है की हम इस संसार चक्र में दुःख भोगना चाहते है ये परमात्मा में विलीन होके अमर होना, क्योंकि ऐसा करने पर न हमें मृत्यु का भय ही रहेगा और न ही प्रलय में हम विचलित होंगे.

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