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Monday, 21 January 2013

अहंकारकी अग्निमें, दहत सकल संसार

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‘अहंकारकी अग्निमें, दहत सकल संसार ।’ संत गोस्वामी तुलसीदासजीकी इस उक्तिसे मनुष्यके ‘मैं’पन से हानि स्पष्ट होती है । मनुष्यके ऐहिक एवं पारमार्थिक सुखके मार्गमें अहं एक बहुत बडी बाधा है । अहंका बीज मनुष्यमें जन्मसे ही होता है । इसलिए वह छोटे-बडे, निर्धन-धनवान, सुशिक्षित-अशिक्षित इत्यादि सबमें, न्यूनाधिक मात्रामें अवश्य होता है ।
अहं जितना अधिक होगा, व्यक्ति उतना ही दुःखी होगा । मानसिक रोगियोंका अहं सामान्य व्यक्तिकी तुलनामें अधिक होता है; इसलिए वे अधिक दुःखी होते हैं । मेरी संपत्ति, मेरा शरीर; ऐसे विचार करनेवाले व्यक्तिको संपत्तिकी हानि हो अथवा कोई रोग हो, तो वह दुःखी होता है । ऐसा व्यक्ति अन्य किसीकी संपत्तिकी हानिसे, रोगसे दुःखी नहीं होता । अहंके कारण मनको होनेवाला दुःख अनेक बार शारीरिक वेदनासे कहीं अधिक कष्टप्रद होता है । इसके विपरीत, संत मानते हैं कि सबकुछ परमेश्वरका है, किसीपर भी अपना अधिकार नहीं है, इसलिए वे कभी दुःखी नहीं होते, सदैव आनंदमें रहते हैं ।
अपने अहंका नाश करने हेतु सर्वोत्तम मार्ग है साधना करना । ईश्वरसे एकरूपता पाने हेतु प्रतिदिन जो प्रयत्न किए जाते हैं, उन्हें साधना कहते हैं । संक्षेपमें, दिनभरमें जितना समय हम अधिकाधिक साधना करेंगे, उतनी शीघ्रतासे हमारा अहं अल्प होगा । अहंको घटानेके दृष्टिकोणसे साधनामें महत्त्वपूर्ण चरण हैं - सेवा, त्याग, प्रीति (निरपेक्ष प्रेम) तथा नामजप ।