वकील की ईमानदारी

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श्रीधर एक प्रसिद्ध डॉक्टर था। अचानक उसकी मृत्यु हो गई। श्रीधर ने जीवन-बीमा करा रखा था। बीमे की राशि लगभग दस हजार रुपये डॉक्टर की पत्नी रूपाली को मिल गई। रूपाली ने वह राशि डॉक्टर के एक वकील मित्र राजगोपाल को जमा करने के लिए दे दी। राजगोपाल ने वह राशि रूपाली के नाम से पंद्रह वर्ष के लिए एक प्रतिष्ठित कंपनी में जमा करा दी।

इस बात को सात साल बीत गए। अचानक रूपाली को रुपयों की जरूरत पड़ी। उसने राजगोपाल से अपने दस हजार रुपये मांगे। वकील राजगोपाल तो उन पैसों को भूल ही चुके थे उन्होंने अपने पुराने कागजात देखे। लेकिन उन्हें कहीं भी दस हजार रुपये जमा नहीं मिले। वह काफी परेशान हो गए। अगर वह रूपाली को झूठा बताते तो लोग उन पर एक विधवा के रुपये हड़प कर लेने का इल्जाम लगा सकते थे। अतः काफी सोच-विचार के बाद उन्होंने स्वयं अपनी जेब से दस हजार रुपये रूपाली को दिए।

उधर कंपनी की पंद्रह वर्ष की मियाद पूरी हो जाने के बाद रूपाली के नाम जमा कराए दस हजार रुपये पचास हजार में तब्दील हो गए थे। कंपनी ने रूपाली को पत्र लिखकर सूचित किया। रूपाली को जब पत्र मिला तो वह बहुत हैरान हुई। वह कंपनी के अधिकारियों से जाकर मिली और उन्हें बताया कि उसने तो रुपये जमा ही नहीं कराए। तब रूपाली राजगोपाल से मिली और पूछताछ की। तब कहीं जाकर राजगोपाल को याद आया कि उसी ने वह रुपये रूपाली के नाम से उस कंपनी में जमा कराए थे।

कंपनी से रूपाली को पचास हजार रुपये मिल गए। रूपाली ने वह रुपये राजगोपाल को देने चाहे, क्योंकि वह तो अपने दस हजार रुपये ले चुकी थी। लेकिन वकील ने अपने दस हजार रुपये ही लिए।

सच में वह बल होता है कि एक दिन सामने आकर ही रहता है। रूपाली भी सच्ची थी और राजगोपाल भी। यह सच यदि छिपा रहता तो रूपाली के प्रति राजगोपाल के मन में संदेह का नाग जरूर फन उठाता। लेकिन राजगोपाल सच्चा होने के साथ ईमानदार भी था, इसीलिए उसने अपने 10 हजार रुपये ही वापस लिए।
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किस्मत का खेल

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चमनलाल सारा दिन धूप में इधर-उधर घूम-फिरकर टूटा-फूटा सामान और कबाड़ जमा करता, फिर शाम को उसे बड़े कबाड़ी की दुकान पर बेचकर पेट भरने लायक कमा लेता था। एक दिन वह एक घर से पुराना सामान खरीद रहा था। घर के मालिक ने उसे एक पुराना पानदान भी दिया, जो उसने मोल-भाव करके एक रुपये में खरीद लिया। 
कुछ आगे बढ़ने पर एक और घर ने उसे कुछ कबाड़ बेचा, लेकिन घर के मालिक को वह पानदान पसंद आ गया और उसने पांच रुपये में उसे खरीद लिया। लेकिन जब काफी कोशिश के बाद भी वह पानदान उससे नहीं खुला तो अगले दिन उसने उसे चमनलाल को वापस करके अपने पांच रुपये ले लिए।

शाम को बड़े कबाड़ी ने भी वह पानदान न खुलने के कारण उससे नहीं खरीदा। अगले दिन रविवार था। रविवार को बाजार के चौक पर चमनलाल पुराना सामान बेचता था। वहां उससे कोई ग्राहक पांच रुपये देकर वह पानदान ले गया। लेकिन अगले रविवार को वह ग्राहक वह पानदान उसे वापिस कर गया क्योंकि वह उससे भी नहीं खुला।
बार-बार पानदान उसी के पास पहुंच जाने के कारण चमनलाल को बहुत गुस्सा आया और उसने उसे जोर से जमीन पर पटककर मारा। अबकी पानदान खुल गया। पानदान के खुलते ही चमनलाल की आंखें खुली-की-खुली रह गईं। उसमें से कई छोटे-छोटे बहुमूल्य हीरे छिटककर जमीन पर बिखर गए थे।

अगले दिन प्रातः वह उसी घर में गया जहां से उसने पानदान खरीदा था। पता चला कि वे लोग मकान बेचकर किसी दूसरे शहर में चले गये हैं। चमनलाल ने उनका पता लगाने की कोशिश भी की लेकिन नाकामयाब रहा। बाद में चमनलाल उन हीरों को बेचकर संपन्न व्यापारी बन गया और सेठ चमनलाल कहलाने लगा।

समय से पहले भाग्य से ज्यादा किसी को नहीं मिलता। यही चमनलाल के साथ हुआ। वह तो किसी तरह उस पानदान से छुटकारा पाना चाह रहा था, जो बार-बार लौटकर उसी के पास आ जाता था। किस्मत बार-बार उसके दरवाजे पर दस्तक दे रही था, तभी तो वह पानदान उसे कबाड़ी से सेठ बना गया।
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सच्चा ब्राह्मण

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रामनाथ कर्मकांडी ब्राह्मण था। पूजा-पाठ और भक्ति में उसका पूर्ण विश्वास था। लेकिन वह बहुत ही गरीब था। जहां वह रहता था वह ब्राह्मणों का ही गांव था। लेकिन वे सभी ढोंग और पाखंड में विश्वास रखते थे। उनका उद्देश्य केवल पैसा कमाना था।

कई बार उन ढोंगी ब्राह्मणों ने रामनाथ को भी सलाह दी थी कि वह भी लोगों को बेवकूफ बनाकर खूब पैसा कमाए, लेकिन इस काम के लिए उसका मन नहीं मानता था। एक बार रामनाथ की पत्नी ने उससे कहा, ‘आप दरबार में जाकर राजा से मदद मांगें।’

पत्नी की सलाह पर रामनाथ अगले दिन प्रातः राजा से मिलने महल की ओर चल दिया। वहां तक पहुंचने में एक दिन का समय लगता था। वह चलता रहा, चलते-चलते जब थक गया तो कुछ देर आराम करने के लिए एक पेड़ के नीचे बैठ गया। उसे भूख भी लग रही थी। उसने रोटी की पोटली खोली तो उसमें पूजा का सामान भी था। उसे याद आया कि उसने तो आज पूजा ही नहीं की। वह पूजा करने लगा। उसके बाद उसने रोटी की पोटली खोली और जिस पेड़ के नीचे बैठा था, एक रोटी उसकी जड़ में रख कर बोला, ‘हे वृक्ष ! कृपया मेरी तरफ से यह रोटी स्वीकार करें।’
तभी वहां आवाज गूंजी, ‘हे ब्राह्मण आपने यहां पधारकर हमारा उद्धार कर दिया। हम तो वर्षों से आपकी है प्रतीक्षा कर रहे थे।’
रामनाथ हैरान रह गया। उसने देखा कि वृक्ष पर दो मैना बैठी थीं।’
मैना बोलीं, ‘जिस वृक्ष के नीचे आप बैठे हैं वह ऋषि तुंगभद्र हैं और हम दोनों स्वर्ग की अप्सराएं। कृपा करके आपके पास जो जल है, उसकी कुछ बूंदें इस वृक्ष और हम दोनों पर छिड़क दें तो हम सब अपने वास्तविक रूप में आ जाएंगे।

रामनाथ ने तुरंत उस वृक्ष पर और दोनों मैनाओं पर जल छिड़क दिया। वे सब अपने वास्तविक रूप में आ गए। ऋषि तुंगभद्र ने रामनाथ को धन्यवाद दिया और उसे दो थैली स्वर्ण-मुद्राएं दीं। इसके बाद वे तीनों वहां से अदृश्य हो गए। उनके जाते ही वहां एक सुंदर-सा मकान बन गया और फिर से एक आवाज गूंजी, ‘रामनाथ ! यह मकान तुम्हारा है।’
रामनाथ अपने गांव लौट आया। वहां उसने देखा कि गांव के सभी मकान टूटे पड़े हैं। वह अपने घर की तरफ दौड़ा। लेकिन उसका मकान सही-सलामत था। उसने अपनी पत्नी को सारी बात बताई। उसकी पत्नी बोली, ‘लगता है गांव के सभी ढोंगी पंडितों को भगवान ने श्राप दे दिया है।’
इसके बाद रामनाथ अपनी पत्नी के साथ नए मकान में आकर सुख से रहने लगा।

सच्ची श्रद्धा व भक्ति का फल एक-न-एक दिन अवश्य ही मिलता है। रामनाथ छल-कपट से धन कमाने को ठीक नहीं मानता था, उसकी ईमानदारी में शक्ति थी। इसी शक्ति ने ऋषि व अप्सराओं को मुक्ति दी और रामनाथ को भी वैभव मिल गया।

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राजा का कर्तव्य

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राजा प्रतापराय अपनी प्रजा के प्रति बहुत ही कर्तव्यनिष्ठ था। एक बार प्रजा ने अपने राजा के यश और कल्याण की वृद्धि के लिए यज्ञ करने का विचार किया। राजा ने यज्ञ की अनुमति दे दी, साथ ही इस यज्ञ के लिए हर संभव मदद की पेशकश की । किंतु प्रजा प्रतिनिधियों ने यह कह कर मानने से इनकार कर दिया कि यह यज्ञ राजा के कल्याण हेतु प्रजा की तरफ से होगा। अतः इसका सारा खर्चा भी प्रजा वहन करेगी, साथ ही प्रतिनिधियों ने राजा से यज्ञ में उपस्थित होने को कहा। राजा ने उनकी बात को स्वीकार कर लिया।

नियत समय पर यज्ञ शुरू हो गया। 21 दिन का यज्ञ था। प्रतिदिन राजा स्वयं यज्ञ में उपस्थित होता और अपने हाथों से आहुतियां देता। यज्ञ को बीस दिन हो चुके थे। प्रजा को बस इन्तजार था तो इक्कीसवें दिन का। इस दिन राजा को इक्कीस आहुतियां देनी थीं। इसके बाद राजा प्रतापराय का यश पूरी दुनिया में फैल जाना था।

इक्कीसवें दिन प्रातः यज्ञ की सारी तैयारियाँ हो गईं। राजा का इंतजार हो रहा था। जब काफी देर तक राजा वहाँ नहीं पहुँचा तो कुछ लोग महल में चले गए। वहाँ पता चला कि राजा वहाँ नहीं है, वह सुबह-सवेरे ही सैनिकों के साथ कहीं चला गया था।

प्रजा को जब यह खबर मिली तो वह उदास हो गई। यज्ञ भी पूर्ण नहीं हो पाया। चार दिन बाद जब राजा लौटा तो लोग उससे मिलने महल में गए। राजा ने उनसे कहा, ‘मुझे अफसोस है कि आप लोगों का यज्ञ पूरा नहीं हो पाया, किंतु मेरा जाना जरूरी था। पड़ोसी राज्य ने हम पर आक्रमण कर दिया था और वे लोग नगर की सीमा तक आ गए थे। हम लोगों ने दुश्मनों को मार भगाया।’
प्रजा खुश हुई और राजा को बधाई देते हुए, ‘महाराज यदि एक दिन आप और रुक जाते तो यशस्वी राजा बन जाते।’
राजा ने कहा, ‘यदि मैं एक दिन और रुक जाता तो हम लोग पड़ोसी राज्य के गुलाम हो जाते। आज भले ही मैं यशस्वी नहीं हूँ, लेकिन स्वतन्त्र तो हूँ। मैं राजा हूँ और प्रजा के प्रति मेरा यह कर्तव्य है कि मैं उन्हें स्वतंत्र वातावरण दूँ।’

राजा का सर्वप्रथम धर्म है प्रजा की रक्षा करना। इसी से उसके यश-कीर्ति का अनुमान लगता है। यज्ञ करने से राजा यशस्वी होता है या नहीं, यह तो ऊपरवाला जाने। लेकिन उस समय का यही तकाजा था कि सीमा पर पहुँचे शत्रु को मुँहतोड़ जवाब दिया जाता, जैसा उस समझदार राजा ने दिया भी।

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भगवान

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प्राचीनकाल की बात है...पृथ्वी पर भयंकर बीमारियों, भूकम्प, आंधी-तूफान तथा खूंखार जानवरों का आतंक था। 
परेशान लोगों ने ईश्वर की आराधना की। उन्होंने भगवान से दिव्य पुरुष की मांग की, जो उन्हें इन सब प्रकोपों से मुक्ति दिला सके। अन्ततः भगवान को उन पर तरस आ गया और उन्होंने एक दिव्य-पुरुष पृथ्वी पर भेज दिया।
लोगों ने उस दिव्य-पुरुष को सिर-आँखों पर बैठा लिया। सभी उस पर बड़ी-बड़ी फूलों की माला चढ़ाने लगे। वह दिव्य-पुरुष लोगों की इस हरकत से बहुत परेशान हो रहा था। वह बार-बार लोगों से कहता भी, ‘रहने दो, इन सबकी क्या जरूरत है।’ किंतु लोग नहीं माने अंततः वह दिव्य पुरुष उन फूल मालाओं के बोझ तले दबकर मर गया।
लोग फिर भगवान से प्रार्थना करने लगे। इस बार भी भगवान ने एक और दिव्य-पुरुष पृथ्वी पर भेज दिया। उसका भी यही हश्र हुआ।

इस तरह लोग बार-बार प्रार्थना करते और भगवान हर बार एक दिव्य-पुरुष भेज देते।
इस बार जब लोग भगवान से दिव्य पुरुष की मांग कर रहे थे तो भगवान ने उनके पास एक पत्थर की मूर्ति भेज दी। लोगों ने उसका भी भरपूर स्वागत किया। उस पर भी खूब फूल-मालाएं चढ़ाईं। लेकिन उसे कुछ न हुआ...वह जस-का-तस रहा।
तब भगवान ने मन-ही-मन कहा, ‘इसबार तुम लोग जितनी मर्जी फूल-मालाएं चढ़ा लो यह दिव्य-पुरुष नहीं मरेगा।’
बार-बार एक ही घटना की पुनरावृत्ति होने पर यह सोचना चाहिए कि ऐसा क्यों हो रहा है...क्या कारण है इसके पीछे। लोग ईश्वर के भेजे दिव्य-पुरुष को फूलों के बोझ तले दम तोड़ने को विवश कर देते थे, जबकि अपनी ओर से वे उसका सत्कार कर रहे थे। कुछ करने से पहले भला-बुरा सोच लेना चाहिए।
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जाको राखे साइयां

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बस अपनी मंजिल की ओर बढ़ी जा रही थी। रास्ते में कुछ देर के लिए रुकी तो ड्राइवर ने यात्रियों से कहा, ‘‘जो लोग चाय-नाश्ता करना चाहें यहीं कर सकते हैं। अगला पड़ाव दो घंटे बाद आएगा।’
कुछ यात्री उतर गये, कुछ बस में ही बैठे रहे तभी उन्होंने देखा कि एक कुत्ता खरगोश के पीछे दौड़ रहा है। खरगोश तेजी से कूदकर एक झाड़ी में छिप गया। तभी बस का चालक उठा और झाड़ियों के पास जाकर एक ही झटके में खरगोश को पकड़ लिया। वह बस में से एक बड़ा चाकू ले आया। 
‘कुत्ते से तो बच गया, मुझसे कैसे बचेगा।’ चालक बोला।
‘पर आप इसे मार क्यों रहे हैं ?’ एक यात्री बोला।
‘मैं इसे भूनकर खाऊँगा। बड़े दिनों बाद खरगोश का मांस खाने को मिलेगा।’
अभी चालक ने अपना बड़ा-सा चाकू खरगोश की गर्दन पर चलाने के लिए उठाया है था कि चाकू उसके हाथ से छूट कर उसके पैर पर गिर पड़ा। भारी चाकू के गिरते ही चालक का पैर बुरी तरह कट गया। वहाँ नजदीक कोई अस्पताल भी नहीं था। खून अधिक निकल जाने के कारण उसकी हालत बिगड़ती जा रही थी। कुछ ही देर में चालक के प्राण निकल गए।
तभी तो कहा गया है, ‘जाको राखे साइयाँ मार सके न कोय।’
जीव हत्या से बढ़कर पाप कोई दूसरा नहीं। प्राण सभी को प्यारे होते हैं, तभी वह खरगोश कुत्ते से बचने को झाड़ी में जा छिपा था, लेकिन बस का ड्राइवर उसके प्राणों का प्यासा हो गया। ईश्वर की लीला अपरंपार है, इसलिए अहित सोचने वाले का अहित पहले होता है, जैसे बस ड्राइवर का हुआ।
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सुनहरा पक्षी

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सुन्दरलाल एक धनी व्यापारी था। उसमें बस एक कमी थी—वह बहुत कामचोर और आलसी था सुबह देर तक सोना उसे बहुत पसंद था।
अपने आलसी स्वभाव के कारण धीरे-धीरे सुन्दर लाल की सेहत बिगड़ने लगी। वह पलंग पर पड़ा-पड़ा मोटा हो गया। उससे अब ज्यादा चला-फिरा नहीं जाता था। उसने अब अपने सारे काम नौकरों पर छोड़ रखे थे।

नौकर अपने मालिक के आलसी स्वभाव से परिचित थे। उन्होंने भी धीरे-धीरे बेईमानी करना शुरू कर दी और उससे सुन्दरलाल को व्यापार में नुकसान होने लगा।
एक दिन सुन्दरलाल का मित्र उससे मिलने आया। सुन्दरलाल ने अपने मित्र से अपनी बीमारी के बारे में बताया। मित्र होशियार था, वह तुरन्त समझ गया कि सुन्दरलाल का आलसीपन ही सारी बीमारी की जड़ है। उसने सुन्दरलाल से कहा—‘‘तुम्हारी बीमारी को दूर करने का उपाय में जानता हूँ, पर तुम वह कर नहीं सकते, क्योंकि इसके लिए तुम्हें जल्दी उठना पड़ेगा।’’

सुन्दरलाल ने कहा कि बीमारी ठीक होने के लिए सब कुछ करने को तैयार है।
मित्र ने कहा, ‘‘सुबह-सुबह अक्सर एक सुनहरा पक्षी आता है। तुम अगर उसे देख लो तो तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जायेंगे।’’
सुन्दरलाल अगले दिन सुबह-सुबह उठकर सुनहरे पक्षी को खोजने चल पड़ा।
रास्ते में उसने देखा कि नौकर उसी के भण्डार से अनाज चोरी कर रहे हैं। ग्वाला दूध में पानी मिला रहा है। सुन्दरलाल ने अपनी सभी नौकरों को डांटा।

अगले दिन फिर सुन्दरलाल सुनहरे पक्षी की खोज में निकला। सुनहरे पक्षी तो मिलना नहीं था, पर अपने मालिक को रोज आते देख भण्डार से चोरी होनी बन्द हो गयी। सभी नौकर अपना काम ठीक से करने लगे। चलने-फिरने से सुन्दरलाल का स्वास्थ्य भी ठीक रहने लगा।
कुछ समय बाद सुन्दरलाल का मित्र वापस सुन्दरलाल के पास आया।
सुन्दरलाल ने मित्र से कहा—‘‘मैं इतने दिनों से सुनहरे पक्षी को खोज रहा हूँ, पर वह मुझे दिखाई नहीं दिया।’’
मित्र ने कहा—‘‘तुम्हारा परिश्रम ही वह सुनहरा पक्षी है। तुमने जब से खेतों में जाना शुरू किया है, तुम्हारे यहाँ चोरी बन्द हो गयी और तुम्हारा स्वास्थ्य भी ठीक हो गया।
मित्र की बात अब सुन्दरलाल की समझ में आ गयी। उसने उसी दिन के बाद से आलस करना छोड़ दिया।

कहानी हमें बताती है कि सबको अपने काम स्वयं करने चाहिए। परिश्रम और मेहनत से ही काम सफल होते हैं।

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सातवां घड़ा

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एक गाँव में एक नाई अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहता था। नाई ईमानदार था, अपनी कमाई से संतुष्ट था। उसे किसी तरह का लालच नहीं था। नाई की पत्नी भी अपनी पति की कमाई हुई आय से बड़ी कुशलता से अपनी गृहस्थी चलाती थी। कुल मिलाकर उनकी जिंदगी बड़े आराम से हंसी-खुशी से गुजर रही थी।
नाई अपने काम में बहुत निपुण था। एक दिन वहाँ के राजा ने नाई को अपने पास बुलवाया और रोज उसे महल में आकर हजामत बनाने को कहा।
नाई ने भी बड़ी प्रसन्नता से राजा का प्रस्ताव मान लिया। नाई को रोज राजा की हजामत बनाने के लिए एक स्वर्ण मुद्रा मिलती थी।
इतना सारा पैसा पाकर नाई की पत्नी भी बड़ी खुश हुई। अब उसकी जिन्दगी बड़े आराम से कटने लगी। घर पर किसी चीज की कमी नहीं रही और हर महीने अच्छी रकम की बचत भी होने लगी। नाई, उसकी पत्नी और बच्चे सभी खुश रहने लगे।

एक दिन शाम को जब नाई अपना काम निपटा कर महल से अपने घर वापस जा रहा था, तो रास्ते में उसे एक आवाज सुनाई दी।
आवाज एक यक्ष की थी। यक्ष ने नाई से कहा, ‘‘मैंने तुम्हारी ईमानदारी के बड़े चर्चे सुने हैं, मैं तुम्हारी ईमानदारी से बहुत खुश हूँ और तुम्हें सोने की मुद्राओं से भरे सात घड़े देना चाहता हूँ। क्या तुम मेरे दिये हुए घड़े लोगे ?
नाई पहले तो थोड़ा डरा, पर दूसरे ही पल उसके मन में लालच आ गया और उसने यक्ष के दिये हुए घड़े लेने का निश्चय कर लिया।
नाई का उत्तर सुनकर उस आवाज ने फिर नाई से कहा, ‘‘ठीक है सातों घड़े तुम्हारे घर पहुँच जाएँगे।’’

नाई जब उस दिन घर पहुँचा, वाकई उसके कमरे में सात घड़े रखे हुए थे। नाई ने तुरन्त अपनी पत्नी को सारी बातें बताईं और दोनों ने घड़े खोलकर देखना शुरू किया। उसने देखा कि छः घड़े तो पूरे भरे हुए थे, पर सातवाँ घड़ा आधा खाली था।
नाई ने पत्नी से कहा—‘‘कोई बात नहीं, हर महीने जो हमारी बचत होती है, वह हम इस घड़े में डाल दिया करेंगे। जल्दी ही यह घड़ा भी भर जायेगा। और इन सातों घड़ों के सहारे हमारा बुढ़ापा आराम से कट जायेगा।
अगले ही दिन से नाई ने अपनी दिन भर की बचत को उस सातवें में डालना शुरू कर दिया। पर सातवें घड़े की भूख इतनी ज्यादा थी कि वह कभी भी भरने का नाम ही नहीं लेता था।

धीरे-धीरे नाई कंजूस होता गया और घड़े में ज्यादा पैसे डालने लगा, क्योंकि उसे जल्दी से अपना सातवाँ घड़ा भरना था।
नाई की कंजूसी के कारण अब घर में कमी आनी शुरू हो गयी, क्योंकि नाई अब पत्नी को कम पैसे देता था। पत्नी ने नाई को समझाने की कोशिश की, पर नाई को बस एक ही धुन सवार थी—सातवां घड़ा भरने की।
अब नाई के घर में पहले जैसा वातावरण नहीं था। उसकी पत्नी कंजूसी से तंग आकर बात-बात पर अपने पति से लड़ने लगी। घर के झगड़ों से नाई परेशान और चिड़चिड़ा हो गया।
एक दिन राजा ने नाई से उसकी परेशानी का कारण पूछा। नाई ने भी राजा से कह दिया अब मँहगाई के कारण उसका खर्च बढ़ गया है। नाई की बात सुनकर राजा ने उसका मेहताना बढ़ा दिया, पर राजा ने देखा कि पैसे बढ़ने से भी नाई को खुशी नहीं हुई, वह अब भी परेशान और चिड़चिड़ा ही रहता था।
एक दिन राजा ने नाई से पूछ ही लिया कि कहीं उसे यक्ष ने सात घड़े तो नहीं दे दिये हैं ? नाई ने राजा को सातवें घड़े के बारे में सच-सच बता दिया।

तब राजा ने नाई से कहा कि सातों घड़े यक्ष को वापस कर दो, क्योंकि सातवां घड़ा साक्षात लोभ है, उसकी भूख कभी नहीं मिटती।
नाई को सारी बात समझ में आ गयी। नाई ने उसी दिन घर लौटकर सातों घड़े यक्ष को वापस कर दिये।

घड़ों के वापस जाने के बाद नाई का जीवन फिर से खुशियों से भर गया था।

कहानी हमें बताती है कि हमें कभी लोभ नहीं करना चाहिए। भगवान ने हम सभी को अपने कर्मों के अनुसार चीजें दी हैं, हमारे पास जो है, हमें उसी से खुश रहना चाहिए। अगर हम लालच करे तो सातवें घड़े की तरह उसका कोई अंत नहीं होता।

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पंडित और ग्वालिन

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एक पंडित जी थे। उन्होंने एक नदी के किनारे अपना आश्रम बनाया हुआ था। पंडित जी बहुत विद्वान थे। उनके आश्रम में दूर-दूर से लोग ज्ञान प्राप्त करने आते थे।
नदी के दूसरे किनारे पर लक्ष्मी नाम की एक ग्वालिन अपने बूढ़े पिताश्री के साथ रहती थी। लक्ष्मी सारा दिन अपनी गायों को देखभाल करती थी। सुबह जल्दी उठकर अपनी गायों को नहला कर दूध दोहती, फिर अपने पिताजी के लिए खाना बनाती, तत्पश्चात् तैयार होकर दूध बेचने के लिए निकल जाया करती थी।
पंडित जी के आश्रम में भी दूध लक्ष्मी के यहाँ से ही आता था। एक बार पंडित जी को किसी काम से शहर जाना था। उन्होंने लक्ष्मी से कहा कि उन्हें शहर जाना है, इसलिए अगले दिन दूध उन्हें जल्दी चाहिए।
लक्ष्मी अगले दिन जल्दी आने का वादा करके चली गयी।

अगले दिन लक्ष्मी ने सुबह जल्दी उठकर अपना सारा काम समाप्त किया और जल्दी से दूध उठाकर आश्रम की तरफ निकल पड़ी। नदी किनारे उसने आकर देखा कि कोई मल्लाह अभी तक आया नहीं था। लक्ष्मी बगैर नाव के नदी कैसे पार करती ? फिर क्या था, लक्ष्मी को आश्रम तक पहुँचने में देर हो गयी। आश्रम में पंडित जी जाने को तैयार खड़े थे। उन्हें सिर्फ लक्ष्मी का इन्तजार था। लक्ष्मी को देखते ही उन्होंने लक्ष्मी को डाँटा और देरी से आने का कारण पूछा।

लक्ष्मी ने भी बड़ी मासूमियत से पंडित जी से कह दिया कि नदी पर कोई मल्लाह नहीं था, वह नदी कैसे पार करती ? इसलिए देर हो गयी।
पंडित जी गुस्से में तो थे ही, उन्हें लगा कि लक्ष्मी बहाने बना रही है। उन्होंने भी गुस्से में लक्ष्मी से कहा, ‘‘क्यों बहाने बनाती है। लोग तो जीवन सागर को भगवान का नाम लेकर पार कर जाते हैं, तुम एक छोटी सी नदी पार नहीं कर सकती ?’ पंडित जी की बातों का लक्ष्मी पर बहुत गहरा असर हुआ। दूसरे दिन भी जब लक्ष्मी दूध लेकर आश्रम जाने निकली तो नदी के किनारे मल्लाह नहीं था। लक्ष्मी ने मल्लाह का इंतजार नहीं किया। उसने भगवान को याद किया और पानी की सतह पर चलकर आसानी से नदी पार कर ली। इतनी जल्दी लक्ष्मी को आश्रम में देख कर पंडित जी हैरान रह गये, उन्हें पता था कि कोई मल्लाह इतनी जल्दी नहीं आता है। उन्होंने लक्ष्मी से पूछा कि तुमने आज नदी कैसे पार की ?

लक्ष्मी ने बड़ी सरलता से कहा—‘‘पंडित जी आपके बताये हुए तरीके से। मैंने भगवान् का नाम लिया और पानी पर चलकर नदी पार कर ली।’’
पंडित जी को लक्ष्मी की बातों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने लक्ष्मी से फिर पानी पर चलने के लिए कहा। लक्ष्मी नदी के किनारे गयी और उसने भगवान का नाम जपते-जपते बड़ी आसानी से नदी पार कर ली।

पंडित जी हैरान रह गये। उन्होंने भी लक्ष्मी की तरह नदी पार करनी चाही। पर नदी में उतरते वक्त उनका ध्यान अपनी धोती को गीली होने से बचाने में लगा था। वह पानी पर नहीं चल पाये और धड़ाम से पानी में गिर गये। पंडित जी को गिरते देख लक्ष्मी ने हँसते हुए कहा, ‘‘आपने तो भगवान का नाम लिया ही नहीं, आपका सारा ध्यान अपनी नयी धोती को बचाने में लगा हुआ था।’’
पंडित जी को अपनी गलती का अहसास हो गया। उन्हें अपने ज्ञान पर बड़ा अभिमान था। पर अब उन्होंने जान लिया था कि भगवान को पाने के लिए किसी भी ज्ञान की जरूरत नहीं होती। उसे तो पाने के लिए सिर्फ सच्चे मन से याद करने की जरूरत है।

कहानी में हमें यह बताया गया है कि अगर सच्चे मन से भगवान को याद किया जाये, तो भगवान तुरन्त अपने भक्तों की मदद करते है।

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स्वावलम्बन self reliance


बहुत पुरानी बात है। बंगाल के एक छोटे से स्टेशन पर एक रेलगाड़ी आकर रुकी। गाड़ी में से एक आधुनिक नौजवान लड़का उतरा। लड़के के पास एक छोटा सा संदूक था।
स्टेशन पर उतरते ही लड़के ने कुली को आवाज लगानी शुरू कर दी। वह एक छोटा स्टेशन था, जहाँ पर ज्यादा लोग नहीं उतरते थे, इसलिए वहाँ उस स्टेशन पर कुली नहीं थे। स्टेशन पर कुली न देख कर लड़का परेशान हो गया। इतने में एक अधेड़ उम्र का आदमी धोती-कुर्ता पहने हुए लड़के के पास से गुजरा। लड़के ने उसे ही कुली समझा और उसे सामान उठाने के लिए कहा। धोती-कुर्ता पहने हुए आदमी ने भी चुपचाप सन्दूक उठाया और आधुनिक नौजवान के पीछे चल पड़ा।

घर पहुँचकर नौजवान ने कुली को पैसे देने चाहे। पर कुली ने पैसे लेने से साफ इनकार कर दिया और नौजवान से कहा—‘‘धन्यवाद ! पैसों की मुझे जरूरत नहीं है, फिर भी अगर तुम देना चाहते हो, तो एक वचन दो कि आगे से तुम अपना सारा काम अपने हाथों ही करोगे। अपना काम अपने आप करने पर ही हम स्वावलम्बी बनेंगे और जिस देश का नौजवान स्वावलम्बी नहीं हो, वह देश कभी सुखी और समृद्धिशाली नहीं हो सकता।’’ धोती-कुर्ता पहने यह व्यक्ति स्वयं उस समय के महान समाज सेवक और प्रसिद्ध विद्वान ईश्वरचन्द्र विद्यासागर थे।

कहानी हमें यह शिक्षा देती है कि हमें कभी अपना काम दूसरों से नहीं कराना चाहिए।
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