सनातनी हिंदूओं को जागरूक करने के लिए संदेश

 

सनातनी हिंदूओं को जागरूक करने के लिए संदेश

सनातनी हिंदूओं को जागरूक करने के लिए संदेश

प्रिय सनातनी भाई और बहनों,

हम सब सनातन धर्म के अनुयायी हैं, जो केवल एक धर्म बल्कि जीवन जीने का तरीका है। हमारी संस्कृति, परंपराएँ, और जीवनशैली हमें सिखाती हैं कि हम केवल खुद को बल्कि समाज को भी सत्य, अहिंसा, प्रेम और ज्ञान से अभिभूत करें। आज जब समाज में विकृतियाँ और भ्रम फैलाए जा रहे हैं, हमें अपने धर्म की मूल बातें समझने और उसे अपनाने की आवश्यकता है। यही समय है जब हमें अपने समाज को एकजुट करने के लिए कदम उठाने होंगे, ताकि हम अपने राष्ट्र को सुरक्षित, समृद्ध और प्रगतिशील बना सकें।

1. जाति-पाती मुक्त समाज का महत्व

सनातन धर्म का मूल तत्व है "एकता में शक्ति" और यह संदेश हमें जाति, पाती, रंग या रूप के भेदभाव से ऊपर उठकर एकजुट होने की प्रेरणा देता है। हमारे समाज में जातिवाद की नींव बहुत पुरानी है, लेकिन हमें यह समझना होगा कि जातिवाद सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। जाति-पाती के भेदों ने समाज को कई हिस्सों में बाँट दिया है और यही कारण है कि हम अपने समाज में एकता और अखंडता नहीं देख पा रहे हैं।

यदि हम अपने समाज को वाकई में एकजुट और मजबूत बनाना चाहते हैं, तो हमें जातिवाद, संप्रदायवाद और भेदभाव को समाप्त करना होगा। हमें यह मानना होगा कि हम सभी भारतीय हैं, चाहे हमारी जाति कुछ भी हो, हमारा धर्म एक ही है, और हम सभी एक ईश्वर के भक्त हैं। एक जाति-पाती मुक्त समाज में ही सनातन हिंदू एकता का सपना पूरा हो सकता है। जब हम सब मिलकर एक लक्ष्य के लिए काम करेंगे, तभी हम अपने राष्ट्र को मजबूत बना सकेंगे।

2. धर्म और समाज का समन्वय

सनातन धर्म केवल व्यक्तिगत भक्ति और पूजा तक सीमित नहीं है, यह समाज के हर पहलू को प्रभावित करता है। हमें अपने धर्म को केवल मंदिरों और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि हमें इसे अपने समाज के हर पहलू में लागू करना होगा। हम तब ही सफल होंगे, जब हम समाज में जाति-पाती के भेदभाव को समाप्त करेंगे और एक दूसरे के प्रति समान सम्मान और प्रेम दिखाएंगे। जब समाज में जातिवाद, असहमति और भेदभाव का कोई स्थान नहीं होगा, तभी हम अपने सामाजिक और धार्मिक एकता की असली ताकत को महसूस कर सकेंगे।

3. हमारी शक्ति एकजुटता में है

अगर हम सनातनी हिंदूओं को एकजुट कर लेते हैं तो केवल हमारी धार्मिकता मजबूत होगी, बल्कि हम समाज में भी सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। यह सच है कि अगर हम सभी एकजुट हो जाते हैं तो हमारी शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। सनातन धर्म में कर्म, धर्म और भक्ति की जो शिक्षा दी गई है, यदि हम उसे अपनी जिंदगी में लागू करें, तो केवल हमारा व्यक्तिगत जीवन सफल होगा, बल्कि समाज भी सशक्त बनेगा। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि हम सभी का उद्देश्य एक ही हैपरमात्मा के प्रति श्रद्धा और समाज की सेवा।

4. आध्यात्मिक और सामाजिक उन्नति की दिशा

हमारे समाज में आज भी बहुत से लोग गरीब हैं, अशिक्षित हैं और समाज के मुख्यधारा से बाहर हैं। हमें यह समझना होगा कि किसी की जाति, पाती, धर्म या आर्थिक स्थिति को देखकर किसी को भी नीचा नहीं समझना चाहिए। हमारा धर्म हमें सर्वजन सुखाय, सर्वजन हिताय का संदेश देता है। हमें अपनी शक्ति का उपयोग समाज के कमजोर वर्गों की मदद करने के लिए करना चाहिए, ताकि हम एक सशक्त और समान समाज का निर्माण कर सकें।

धर्म का पालन करते हुए हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम सभी अपने परिवारों और समुदायों में समानता और भ्रातृत्व की भावना का प्रचार करें। जातिवाद को समाप्त करने के लिए हम अपने बच्चों को बचपन से यह सिखाएं कि सभी इंसान समान हैं और किसी भी प्रकार का भेदभाव हमारी संस्कृति के खिलाफ है। जब हम जातिवाद को समाप्त करेंगे, तब ही हमारी धार्मिक और सामाजिक एकता का सही अर्थ समझ में आएगा।

5. देश की सुरक्षा और समृद्धि के लिए एकता आवश्यक है

सनातन धर्म का पालन करना और जातिवाद से मुक्त समाज की स्थापना करना केवल हमारे व्यक्तिगत विकास के लिए नहीं है, बल्कि इससे देश की सुरक्षा और समृद्धि भी सुनिश्चित होगी। जब हम एकजुट होंगे और किसी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करेंगे, तो हमारी एकता हमें हर संकट का सामना करने के लिए मजबूती देगी। एकता में ही राष्ट्र की शक्ति निहित है। अगर हम सभी सनातनी भाई-बहन एकजुट होकर अपने धर्म, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे, तो हम केवल अपने व्यक्तिगत जीवन में बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा में भी योगदान दे सकेंगे।

6. क्या हमें तैयार रहना चाहिए?

आज के समय में समाज में बढ़ते असहमति और भेदभाव को समाप्त करने के लिए हमें अपने आप को तैयार करना होगा। हमें समझना होगा कि अगर हम एक जाति-पाती मुक्त समाज का निर्माण करते हैं तो यह हमारे देश के लिए भी बेहतर होगा। हमें अपने धर्म, अपने समाज और अपने राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी निभानी होगी। हम हर कदम पर एकता का संदेश फैलाने के लिए काम कर सकते हैं, चाहे वह हमारे परिवार में हो या समाज में।

निष्कर्ष

प्रिय सनातनी भाई-बहनों, यह समय है जब हमें जातिवाद और भेदभाव को समाप्त करके एकजुट होने का संकल्प लेना होगा। केवल तब ही हम सनातन हिंदू एकता को मजबूत कर सकते हैं और अपने समाज तथा राष्ट्र को एक नई दिशा दे सकते हैं। जब हम एकजुट होंगे, तब हम सभी के साथ मिलकर अपने देश को एक शक्तिशाली और सुरक्षित स्थान बना सकते हैं। हमारे लिए यह समय जागरूक होने का है और अपने धर्म की सच्चाई को केवल अपने जीवन में अपनाने का, बल्कि समाज में फैलाने का भी है।

जय श्रीराम! जय हिंद!

 

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रिश्तों और जिम्मेदारियों का सम्मान करना चाहिए

 पत्नी को अगर उसकी जरूरत जितना सम्भोग का सुख ना मिले तो रिश्ते में दरार आने में देर नहीं लगती 


रिश्तों और जिम्मेदारियों का सम्मान करना चाहिए


नंदिनी, जो पहले से शादीशुदा थी, अक्सर अमन के पास अपनी बातों को साझा करने आती थी। शुरुआत में उनकी बातचीत सामान्य थी, लेकिन धीरे-धीरे नंदिनी के व्यवहार में बदलाव आने लगा। उसने अमन से अपनी निजी जिंदगी के बारे में बातें करना शुरू कर दिया।

एक दिन, नंदिनी ने अमन से कहा, "मुझे ऐसा लगता है कि मेरी शादीशुदा जिंदगी अब पहले जैसी नहीं रही। मैं अपने पति के साथ वह जुड़ाव महसूस नहीं करती जो पहले करती थी।"

अमन को नंदिनी की बातों से थोड़ी चिंता हुई, लेकिन उसने इसे दोस्ती के नाते समझा और उसकी भावनाओं का सम्मान किया। नंदिनी अक्सर अमन के पास बैठकर अपनी परेशानियों को साझा करती, और अमन एक अच्छे दोस्त की तरह उसे सुनता। लेकिन कुछ समय बाद, नंदिनी के इशारे बदलने लगे।

अब, नंदिनी ने अमन की ओर एक अलग नजरिए से देखना शुरू किया। उसकी नजरों में एक अनकहा आकर्षण झलकने लगा था। वह अमन के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताने की कोशिश करने लगी। अमन इस बदलाव को महसूस कर रहा था, लेकिन वह इसे अनदेखा करने की कोशिश कर रहा था।

एक दिन, जब दोनों काम के बाद अकेले में थे, नंदिनी ने अमन से कहा, "तुम्हारे साथ वक्त बिताकर मुझे बहुत सुकून मिलता है। मैं अपने पति के साथ अब वह जुड़ाव महसूस नहीं करती।"

उसकी आँखों में एक अनकही चाहत थी, और अमन को समझते देर नहीं लगी कि नंदिनी उससे क्या चाह रही थी।

अमन के दिल और दिमाग में एक संघर्ष शुरू हो गया। नंदिनी की भावनाओं को देखकर वह असहज हो गया। उसने खुद से सवाल किया, "क्या मैं इस स्थिति में सही हूँ? नंदिनी तो शादीशुदा है, और मैं उसके रिश्ते में दखल क्यों दूँ?"

अमन ने नंदिनी से सीधे बात की। उसने कहा, "नंदिनी, मैं तुम्हारी भावनाओं की कद्र करता हूँ, लेकिन हमें अपने रिश्ते की सीमाओं को समझना होगा। तुम्हारा पति और तुम्हारी शादीशुदा जिंदगी का सम्मान करना बहुत जरूरी है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे किसी भी गलत कदम से तुम्हारे परिवार पर गहरा असर पड़ सकता है।"

नंदिनी ने अमन की बात ध्यान से सुनी। उसकी आँखों में निराशा थी, लेकिन उसने महसूस किया कि अमन सही कह रहा था। वह जानती थी कि इस रास्ते पर चलने से न केवल उसके परिवार को चोट पहुँच सकती है, बल्कि अमन के साथ उसकी दोस्ती भी बर्बाद हो सकती है।

उस दिन के बाद, नंदिनी ने अमन से दूरियां बनाना शुरू कर दीं। दोनों ने यह समझ लिया कि उनके बीच जो कुछ भी था, वह केवल एक अनकहा आकर्षण था। लेकिन उस आकर्षण को सही दिशा में ले जाना जरूरी था।

इस अनुभव ने अमन को सिखाया कि भावनाओं पर काबू पाना कितना जरूरी है। चाहे दिल की चाहत कितनी भी गहरी क्यों न हो, सही और गलत का फर्क समझना अनिवार्य है।

यह कहानी हमें यह सिखाती है कि हमें दूसरों के रिश्तों और जिम्मेदारियों का सम्मान करना चाहिए। हमारे किसी भी गलत कदम से किसी की शादीशुदा जिंदगी या परिवार पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। सही फैसले और नैतिकता को प्राथमिकता देना ही सच्ची समझदारी है। 🌹

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कैंसर कोई खतरनाक बीमारी नहीं है! Cancer is not a dangerous disease!

 कैंसर कोई खतरनाक बीमारी नहीं है!  डॉ. गुप्ता कहते हैं, लापरवाही के अलावा कैंसर से किसी की मौत नहीं होनी चाहिए। (1). पहला कदम चीनी का सेवन बंद करना है। आपके शरीर में चीनी के बिना, कैंसर कोशिकाएं स्वाभाविक रूप से मर जाती हैं।  (2). दूसरा कदम यह है कि एक कप गर्म पानी में नींबू का रस मिलाएं और इसे सुबह भोजन से पहले 1-3 महीने तक पिएं और कैंसर खत्म हो जाएगा। मैरीलैंड मेडिकल रिसर्च के अनुसार, गर्म नींबू पानी कीमोथेरेपी से 1000 गुना बेहतर, मजबूत और सुरक्षित है। (3). तीसरा कदम है सुबह और रात को 3 बड़े चम्मच ऑर्गेनिक नारियल तेल पिएं, कैंसर गायब हो जाएगा, आप चीनी से परहेज सहित अन्य दो उपचारों में से कोई भी चुन सकते हैं। अज्ञानता एक बहाना नहीं है। अपने आस-पास के सभी लोगों को बताएं, कैंसर से मरना किसी के लिए भी अपमान है; जीवन बचाने के लिए व्यापक रूप से साझा करें।

Cancer is not a dangerous disease!


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कंजूसी और बचत को आप किस तरह देखते हैं

 चाची बहुत समझदार महिला थी। पूरे घर का संचालन चाची ही करती थी। घर खर्च का पूरा हिसाब चाची ही रखती थी।

लेकिन चाची को सब कंजूस चाची कहा करते। पैसे खर्च करने में बहुत कंजूसाई करती। चप्पल टूट गई तो कील ठोक कर चलाती रहती। घर खर्च में भी हमेशा ख्याल रखती कि पैसे कहाँ और कैसे बचें।

एकदिन भतीजे अनुज ने पूछ ही लिया-" चाची! सब आपको कंजूस कहते हैं आपको बुरा नहीं लगता?"

चाची बोली-" नहीं बुरा क्यों लगेगा? मैं हूँ ही कंजूस। लेकिन क्यों हूँ यह कभी समय आया तो मालूम होगा।"

एकदिन सास की तबीयत अचानक बिगड़ गई। उन्हें अस्पताल ले गए। डाक्टर ने कहा-" हृदय रोग है। ओपरेशन करना होगा। हम टेस्ट और ओपरेशन की तैयारी करते हैं, आपलोग काउंटर पर पैसे जमा करवा दीजिए।"

सब आपस में चर्चा करने लगे की पैसे की व्यवस्था कैसे होगी? कहां से होगी? कौन करेगा ?

काउंटर से बार बार आवाज लगाई जा रही थी जल्दी पैसे जमा कराए ताकि ऑपरेशन जल्दी शुरू किया जा सके।

सब घबराए हुए थे किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। बात हो ही रही थी कि चाची का फोन अनुज के पास आया और चाची ने पूछा-" डाक्टर ने क्या कहा?"

अनुज ने कहा-" ओपरेशन करना होगा। अभी तत्काल पैसे जमा करवाने होंगे। पापा पैसों के इन्तजाम के लिए निकल रहे हैं।"

चाची ने कहा-" उन्हें वहीं रोको, मैं आ रही हूँ।"

कुछ ही देर में चाची वहाँ अस्पताल पहुँच गई और अपने पर्स से नोटों का बँडल निकालकर पूछा-" बतलाओ कितने पैसे भरने हैं?" इतने पैसे देखकर सब आश्चर्यचकित हो गए।

चाची ने अनुज को बुलाकर कहा-" बेटा! इन्हीं दिनों के लिए मैं कंजूसाई करती थी। जीवन है, न जाने कब जरुरत पड़ जाए। तुम जिसे कंजूसाई कहते हो मैं उसे बचत कहती हूँ।"

चाची ने पुनः कहा-" बेटा! जिसने बचत करना सीख लिया उसे मुसीबत में हाथ नहीं फैलाने पड़ते।"

कंजूसी और बचत को आप किस तरह देखते हैं कॉमेंट में अपने विचार शेयर करें।

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पारिवारिक जीवन में असरकारक भूमिका - Important Role in Family Life

 "बेटा! थोड़ा खाना खाकर जा ..!! दो दिन से तुने कुछ खाया नहीं है।" लाचार माता के शब्द है अपने बेटे को समझाने के लिये।

"देख मम्मी! मैंने मेरी बारहवीं बोर्ड की परीक्षा के बाद वेकेशन में सेकेंड हैंड बाइक मांगी थी, और पापा ने प्रोमिस किया था। आज मेरे आखरी पेपर के बाद दीदी को कह देना कि जैसे ही मैं परीक्षा खंड से बाहर आऊंगा तब पैसा लेकर बाहर खडी रहे। मेरे दोस्त की पुरानी बाइक आज ही मुझे लेनी है। और हाँ, यदि दीदी वहाँ पैसे लेकर नहीं आयी तो मैं घर वापस नहीं आऊंगा।"

एक गरीब घर में बेटे मोहन की जिद्द और माता की लाचारी आमने सामने टकरा रही थी।

"बेटा! तेरे पापा तुझे बाइक लेकर देने ही वाले थे, लेकिन पिछले महीने हुए एक्सिडेंट ..

मम्मी कुछ बोले उसके पहले मोहन बोला "मैं कुछ नहीं जानता .. मुझे तो बाइक चाहिये ही चाहिये ..!!"

ऐसा बोलकर मोहन अपनी मम्मी को गरीबी एवं लाचारी की मझधार में छोड़ कर घर से बाहर निकल गया।

12वीं बोर्ड की परीक्षा के बाद भागवत 'सर' एक अनोखी परीक्षा का आयोजन करते थे।

हालांकि भागवत सर का विषय गणित था, किन्तु विद्यार्थियों को जीवन का भी गणित भी समझाते थे और उनके सभी विद्यार्थी विविधता से भरे ये परीक्षा अवश्य देने जाते थे। 

इस साल परीक्षा का विषय था *मेरी पारिवारिक भूमिका*

मोहन परीक्षा खंड में आकर बैठ गया।

उसने मन में गांठ बांध ली थी कि यदि मुझे बाइक लेकर नहीं देंगे तो मैं घर नहीं जाऊंगा।

भागवत सर के क्लास में सभी को पेपर वितरित हो गया। पेपर में 10 प्रश्न थे। उत्तर देने के लिये एक घंटे का समय दिया गया था।

मोहन ने पहला प्रश्न पढा और जवाब लिखने की शुरुआत की।

*प्रश्न नंबर १ :-  आपके घर में आपके पिताजी, माताजी, बहन, भाई और आप कितने घंटे काम करते हो? सविस्तर बताइये?*

मोहन ने जल्द से जवाब लिखना शुरू कर दिया।

जवाबः

पापा सुबह छह बजे टिफिन के साथ अपनी ओटोरिक्शा लेकर निकल जाते हैं। और रात को नौ बजे वापस आते हैं। कभी कभार वर्दी में जाना पड़ता है। ऐसे में लगभग पंद्रह घंटे।

मम्मी सुबह चार बजे उठकर पापा का टिफिन तैयार कर, बाद में घर का सारा काम करती हैं। दोपहर को सिलाई का काम करती है। और सभी लोगों के सो 

जाने के बाद वह सोती हैं। लगभग रोज के सोलह घंटे।

दीदी सुबह कालेज जाती हैं, शाम को 4 से 8 पार्ट टाइम जोब करती हैं। और रात्रि को मम्मी को काम में मदद करती हैं। लगभग बारह से तेरह घंटे।

मैं, सुबह छह बजे उठता हूँ, और दोपहर स्कूल से आकर खाना खाकर सो जाता हूँ। शाम को अपने दोस्तों के साथ टहलता हूँ। रात्रि को ग्यारह बजे तक पढता हूँ। लगभग दस घंटे।

(इससे मोहन को मन ही मन लगा, कि उनका कामकाज में औसत सबसे कम है।)

पहले सवाल के जवाब के बाद मोहन ने दूसरा प्रश्न पढा ..

*प्रश्न नंबर २ :-  आपके घर की मासिक कुल आमदनी कितनी है?*

जवाबः

पापा की आमदनी लगभग दस हजार हैं। मम्मी एवं दीदी मिलकर पांंच हजार

जोडते हैं। कुल आमदनी पंद्रह हजार।

*प्रश्न नंबर ३ :-  मोबाइल रिचार्ज प्लान, आपकी मनपसंद टीवी पर आ रही तीन सीरियल के नाम, शहर के एक सिनेमा होल का पता और अभी वहां चल रही मूवी का नाम बताइये?*

सभी प्रश्नों के जवाब आसान होने से फटाफट दो मिनट में लिख दिये ..

*प्रश्न नंबर ४ :-  एक किलो आलू और भिन्डी के अभी हाल की कीमत क्या है? एक किलो गेहूं, चावल और तेल की कीमत बताइये? और जहाँ पर घर का गेहूं पिसाने जाते हो उस आटा चक्की का पता  दीजिये।*

मोहनभाई को इस सवाल का जवाब नहीं आया। उसे समझ में आया कि हमारी दैनिक आवश्यक जरुरतों की चीजों के बारे में तो उसे लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है। मम्मी जब भी कोई काम बताती थी तो मना कर देता था। आज उसे ज्ञान हुआ कि अनावश्यक चीजें मोबाइल रिचार्ज, मुवी का ज्ञान इतना उपयोगी नहीं है। अपने घर के काम की

जवाबदेही लेने से या तो हाथ बटोर कर साथ देने से हम कतराते रहे हैं।

*प्रश्न नंबर ५ :- आप अपने घर में भोजन को लेकर कभी तकरार या गुस्सा करते हो?*

जवाबः हां, मुझे आलू के सिवा कोई भी सब्जी पसंद नहीं है। यदि मम्मी और कोई सब्जी बनायें तो, मेरे घर में झगड़ा होता है। कभी मैं बगैर खाना खायें उठ खडा हो जाता हूँ। 

(इतना लिखते ही मोहन को याद आया कि आलू की सब्जी से मम्मी को गैस की तकलीफ होती हैं। पेट में दर्द होता है, अपनी सब्जी में एक बडी चम्मच वो अजवाइन डालकर खाती हैं। एक दिन मैंने गलती से मम्मी की सब्जी खा ली, और फिर मैंने थूक दिया था। और फिर पूछा कि मम्मी तुम ऐसा क्यों खाती हो? तब दीदी ने बताया था कि हमारे घर की स्थिति ऐसी अच्छी नहीं है कि हम दो सब्जी बनाकर खायें। तुम्हारी जिद के कारण मम्मी बेचारी क्या करें?)

मोहन ने अपनी यादों से बाहर आकर

अगले प्रश्न को पढा

*प्रश्न नंबर ६ :- आपने अपने घर में की हुई आखरी जिद के बारे में लिखिये ..*

मोहन ने जवाब लिखना शुरू किया। मेरी बोर्ड की परीक्षा पूर्ण होने के बाद दूसरे ही दिन बाइक के लिये जिद्द की थी। पापा ने कोई जवाब नहीं दिया था, मम्मी ने समझाया कि घर में पैसे नहीं है। लेकिन मैं नहीं माना! मैंने दो दिन से घर में खाना खाना भी छोड़ दिया है। जबतक बाइक नहीं लेकर दोगे मैं खाना नहीं खाऊंगा। और आज तो मैं वापस घर नहीं जाऊंगा कहके निकला

हूँ।

अपनी जिद का प्रामाणिकता से मोहन ने जवाब लिखा।

*प्रश्न नंबर ७ :- आपको अपने घर से मिल रही पोकेट मनी का आप क्या करते हो? आपके भाई-बहन कैसे खर्च करते हैं?*

जवाब: हर महीने पापा मुझे सौ रुपये देते हैं। उसमें से मैं, मनपसंद पर्फ्यूम, गोगल्स लेता हूं, या अपने दोस्तों की छोटीमोटी पार्टियों में खर्च करता हूँ।

मेरी दीदी को भी पापा सौ रुपये देते हैं। वो खुद कमाती हैं और पगार के पैसे से मम्मी को आर्थिक मदद करती हैं। हां,  उसको दिये गये पोकेटमनी को वो गल्ले में डालकर बचत करती हैं। उसे कोई मौजशौख नहीं है, क्योंकि वो कंजूस भी हैं।

*प्रश्न नंबर ८ :- आप अपनी खुद की पारिवारिक भूमिका को समझते हो?*

प्रश्न अटपटा और जटिल होने के बाद भी मोहन ने जवाब लिखा।

परिवार के साथ जुड़े रहना, एकदूसरे के प्रति समझदारी से व्यवहार करना एवं मददरूप होना चाहिये और ऐसे अपनी जवाबदेही निभानी चाहिये। 

यह लिखते लिखते ही अंतरात्मासे आवाज आयी कि अरे मोहन! तुम खुद अपनी पारिवारिक भूमिका को योग्य रूप से निभा रहे हो? और अंतरात्मा से जवाब आया कि ना बिल्कुल नहीं ..!!

*प्रश्न नंबर ९ :- आपके परिणाम से आपके माता-पिता खुश हैं? क्या वह अच्छे परिणाम के लिये आपसे जिद करते हैं? आपको डांटते रहते हैं?*

(इस प्रश्न का जवाब लिखने से पहले हुए मोहन की आंखें भर आयी। अब वह परिवार के प्रति अपनी भूमिका बराबर समझ चुका था।)

लिखने की शुरुआत की ..

वैसे तो मैं कभी भी मेरे माता-पिता को आजतक संतोषजनक परिणाम नहीं दे पाया हूँ। लेकिन इसके लिये उन्होंने कभी भी जिद नहीं की है। मैंने बहुत बार अच्छे रिजल्ट के प्रोमिस तोडे हैं।

 फिर भी हल्की सी डांट के बाद वही प्रेम और वात्सल्य बना रहता था।

*प्रश्न नंबर १० :- पारिवारिक जीवन में असरकारक भूमिका निभाने के लिये इस वेकेशन में आप कैसे परिवार को मददरूप होंगें?*

जवाब में मोहन की कलम चले इससे पहले उसकी आंखों से आंसू बहने लगे, और जवाब लिखने से पहले ही कलम रुक गई .. बेंच के निचे मुंह रखकर रोने लगा। फिर से कलम उठायी तब भी वो कुछ भी न लिख पाया। अनुत्तर दसवां प्रश्न छोड़कर पेपर सबमिट कर दिया।

स्कूल के दरवाजे पर दीदी को देखकर उसकी ओर दौड़ पडा।

"भैया! ये ले आठ हजार रुपये, मम्मी ने कहा है कि बाइक लेकर ही घर आना।"

दीदी ने मोहन के सामने पैसे धर दिये।

"कहाँ से लायी ये पैसे?" मोहन ने पूछा।

दीदी ने बताया

"मैंने मेरी ओफिस से एक महीने की सेलेरी एडवांस मांग ली। मम्मी भी जहां काम करती हैं वहीं से उधार ले लिया, और मेरी पोकेटमनी की बचत से निकाल लिये। ऐसा करके तुम्हारी बाइक के पैसे की व्यवस्था हो गई हैं।

मोहन की दृष्टि पैसे पर स्थिर हो गई।

दीदी फिर बोली " भाई, तुम मम्मी को बोलकर निकले थे कि पैसे नहीं दोगी तो, मैं घर पर नहीं आऊंगा! अब तुम्हें समझना चाहिये कि तुम्हारी भी घर के प्रति जिम्मेदारी है। मुझे भी बहुत से शौक हैं, लेकिन अपने शौक से अपने परिवार को मैं सबसे ज्यादा महत्व देती हूं। तुम हमारे परिवार के सबसे लाडले हो, पापा को पैर की तकलीफ हैं फिर भी तेरी बाइक के लिये पैसे कमाने और तुम्हें दिये प्रोमिस को पूरा करने अपने फ्रेक्चर वाले पैर होने के बावजूद काम किये जा रहे हैं। तेरी बाइक के लिये। यदि तुम समझ सको तो अच्छा है, कल रात को अपने प्रोमिस को पूरा नहीं कर सकने के कारण बहुत दुःखी थे। और इसके पीछे उनकी मजबूरी है।

बाकी तुमने तो अनेकों बार अपने प्रोमिस तोडे ही है न?  

मेरे हाथ में पैसे थमाकर दीदी घर की ओर चल निकली।

उसी समय उनका दोस्त वहां अपनी बाइक लेकर आ गया, अच्छे से चमका कर ले आया था।

"ले .. मोहन आज से ये बाइक तुम्हारी, सब बारह हजार में मांग रहे हैं, मगर ये तुम्हारे लिये आठ हजार ।"

मोहन बाइक की ओर टगर टगर देख रहा था। और थोड़ी देर के बाद बोला

"दोस्त तुम अपनी बाइक उस बारह हजार वाले को ही दे देना! मेरे पास पैसे की व्यवस्था नहीं हो पायी हैं और होने की हाल संभावना भी नहीं है।"

और वो सीधा भागवत सर की केबिन में जा पहूंचा।

"अरे मोहन! कैसा लिखा है पेपर में?

भागवत सर ने मोहन की ओर देख कर पूछा।

"सर ..!!, यह कोई पेपर नहीं था, ये तो मेरे जीवन के लिये दिशानिर्देश था। मैंने एक प्रश्न का जवाब छोड़ दिया है। किन्तु ये जवाब लिखकर नहीं अपने जीवन की जवाबदेही निभाकर दूंगा और भागवत सर को चरणस्पर्श कर अपने घर की ओर निकल पडा।

घर पहुंचते ही, मम्मी पापा दीदी सब उसकी राह देखकर खडे थे।

"बेटा! बाइक कहाँ हैं?" मम्मी ने पूछा। मोहन ने दीदी के हाथों में पैसे थमा दिये और कहा कि सोरी! मुझे बाइक नहीं चाहिये। और पापा मुझे ओटो की चाभी दो, आज से मैं पूरे वेकेशन तक ओटो चलाऊंगा और आप थोड़े दिन आराम करेंगे, और मम्मी आज मैं मेरी पहली कमाई शुरू होगी। इसलिये तुम अपनी पसंद की मैथी की भाजी और बैगन ले आना, रात को हम सब साथ मिलकर के खाना खायेंगे।

मोहन के स्वभाव में आये परिवर्तन को देखकर मम्मी ने उसको गले लगा लिया और कहा कि "बेटा! सुबह जो कहकर तुम गये थे वो बात मैंने तुम्हारे पापा को बतायी थी, और इसलिये वो दुःखी हो गये, काम छोड़ कर वापस घर आ गये। भले ही मुझे पेट में दर्द होता हो लेकिन आज तो मैं तेरी पसंद की ही सब्जी बनाऊंगी।" मोहन ने कहा 

"नहीं मम्मी! अब मै समझ गया हूँ कि मेरे घरपरिवार में मेरी भूमिका क्या है? मैं रात को बैंगन मैथी की सब्जी ही खाऊंगा, परीक्षा में मैंने आखरी जवाब नहीं लिखा हैं, वह प्रेक्टिकल करके ही दिखाना है। और हाँ मम्मी हम गेहूं को पिसाने कहां जाते हैं, उस आटा चक्की का नाम और पता भी मुझे दे दो"और उसी समय भागवत सर ने घर में प्रवेश किया। और बोले "वाह! मोहन जो जवाब तुमनें लिखकर नहीं दिये वे प्रेक्टिकल जीवन जीकर कर दोगे 

"सर! आप और यहाँ?" मोहन भागवत सर को देख कर आश्चर्य चकित हो गया।

"मुझे मिलकर तुम चले गये, उसके बाद मैंने तुम्हारा पेपर पढा इसलिये तुम्हारे घर की ओर निकल पडा। मैं बहुत देर से तुम्हारे अंदर आये परिवर्तन को सुन रहा था। मेरी अनोखी परीक्षा सफल रही 

और इस परीक्षा में तुमने पहला नंबर पाया है।" 

ऐसा बोलकर भागवत सर ने मोहन के सर पर हाथ रखा।

मोहन ने तुरंत ही भागवत सर के पैर छुएँ और ऑटो रिक्शा चलाने के लिये निकल पडा....

       मेरा सभी सम्माननीय अभिभावकों से आग्रह है कि आप इस पोस्ट को आप भी जरूर पढ़िए गा और अपने बच्चों को भी पढ़ने का अवसर दें इससे अच्छी पोस्ट मैंने अपनी जिंदगी में आज तक नहीं पड़ी प्रैक्टिकल जीवन में तो मैंने अनुभव किया है अरविन्द वर्मा जी लेकिन सभी लोगों को किस प्रकार से अनुभव कराया जाए इसके लिए मेरा आपसे आग्रह है कि आप स्वयं और अपने बच्चों को इस पोस्ट को जरूर करने का अवसर प्रदान करें l


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सनातन धर्म की शक्ति उसके व्यापक दृष्टिकोण

सनातन धर्म की शक्ति उसकी सहनशीलता, विविधता और समय के साथ सामंजस्य बिठाने की क्षमता में रही है। लेकिन समय के साथ कुछ चीज़ें बदलने की आवश्यकता होती है, क्योंकि जो समाज समय के साथ नहीं बदलता, वह कमजोर हो जाता है। 

सनातन धर्म की शक्ति उसके व्यापक दृष्टिकोण

1. भेदभाव और एकता: 

   धर्म या समाज में किसी भी प्रकार का भेदभाव उसकी जड़ें कमजोर करता है। "व्यक्ति कर्म से बड़ा होता है, जन्म से नहीं" यह विचार गीता और अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी व्यक्त किया गया है। यह समझना जरूरी है कि कर्म, ज्ञान, और आचरण किसी भी व्यक्ति को श्रेष्ठ बनाते हैं, कि उसका जन्म।

2. संशोधन की आवश्यकता: 

   - धर्म और परंपराओं में समय के साथ बदलाव करना एक स्वस्थ समाज की निशानी है। 

   - जैसे हम संविधान में संशोधन चाहते हैं, वैसे ही धर्म और उसकी प्रथाओं में भी आवश्यकता पड़ने पर बदलाव किया जाना चाहिए। 

   - वक़्फ बोर्ड और अन्य व्यवस्थाओं में जो सुधार की मांग उठती है, उसी तरह हमें अपनी परंपराओं में भी सुधार पर विचार करना चाहिए। 

3. पाखंड और आचरण: 

   अगर कोई व्यक्ति धर्म के नाम पर मांस या मदिरा सेवन करता है और खुद को उच्च समझता है, तो यह उसकी गलतफहमी है। असली श्रेष्ठता हमारे आचरण और हमारे योगदान से निर्धारित होती है।

4. धर्म में सुधार का महत्व: 

   - हमारे ऋषि-मुनियों ने भी समय-समय पर समाज को सही दिशा में ले जाने के लिए बदलाव किए। 

   - वर्तमान युग में भी जरूरत है कि हम अपनी सोच में लचीलापन लाएं और समय के साथ अनुकूल बदलाव करें। 

5. समाज में एकता: 

   संकीर्ण मानसिकता और पुरानी सोच छोड़कर यदि हम धर्म को उसके मूल सिद्धांतोंसत्य, अहिंसा, करुणा, और एकताके आधार पर अपनाएं, तो समाज और धर्म दोनों मजबूत होंगे। 

निष्कर्ष: 

समय के साथ बदलाव और सुधार ही किसी संस्कृति और धर्म को जीवंत और प्रासंगिक बनाए रखते हैं। सनातन धर्म की शक्ति उसके व्यापक दृष्टिकोण और समग्रता में निहित है। इसे मजबूत बनाने के लिए जरूरी है कि हम भेदभाव को समाप्त करें और हर व्यक्ति को उसके कर्म और गुणों के आधार पर देखें।

यह विचारधारा केवल सनातन धर्म को मजबूत करेगी बल्कि एकता और सहिष्णुता का भी उदाहरण बनेगी।


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रिश्तों की अहमियत

 मैं घर की नई बहू थी और एक प्राइवेट बैंक में एक अच्छे ओहदे पर काम करती थी। मेरी सास को गुज़रे हुए एक साल हो चुका था। घर में मेरे ससुर और पति के अलावा कोई और नहीं था। पति का अपना कारोबार था, जिससे उनकी व्यस्तता भी काफी रहती थी। और कभी कभी ही हमारे बीच संबंध बनता, लेकिन जब बनाने लगे तो उसमें भी आफत क्यों की घर में एक बुजुर्ग पिता जी थे कभी भी आवाज देके बुला लेते 

हर सुबह जब मैं जल्दी-जल्दी घर का काम निपटाकर ऑफिस के लिए निकलने की तैयारी करती, ठीक उसी वक़्त मेरे ससुर मुझे आवाज़ देकर कहते, "बहू, मेरा चश्मा साफ़ कर मुझे देती जा।" यह रोज़ का सिलसिला था। ऑफिस की देरी और काम के दबाव की वजह से कभी-कभी मैं मन ही मन झल्ला जाती थी, लेकिन फिर भी अपने ससुर को कुछ कह नहीं पाती।

एक दिन, मैंने इस बारे में अपने पति से बात की। उन्हें भी यह जानकर हैरानी हुई, लेकिन उन्होंने पिता से कुछ नहीं कहा। उन्होंने मुझे सलाह दी कि सुबह उठते ही पिताजी का चश्मा साफ करके उनके कमरे में रख दिया करो ताकि ऑफिस जाते समय कोई परेशानी न हो।

अगले दिन मैंने वैसा ही किया, पर फिर भी ऑफिस के लिए निकलते समय वही बात हुई। ससुर ने मुझे फिर बुलाकर कहा कि "बहू, मेरा चश्मा साफ़ कर दे।" मुझे बहुत गुस्सा आया लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। धीरे-धीरे मैंने उनकी बातों को अनसुना करना शुरू कर दिया, और कुछ समय बाद तो मैंने बिल्कुल ध्यान देना ही बंद कर दिया।

 ससुर के कुछ बोलने पर मैं कोई प्रतिक्रिया नहीं देती औऱ बिलकुल ख़ामोशी से अपने काम में मस्त रहती ।

गुज़रते वक़्त के साथ ही एक दिन  ससुर जी भी गुज़र गए ।

समय का पहिया कहाँ रुकने वाला था,वो घूमता रहा घूमता रहा ।

छुट्टी का एक दिन था। अचानक मेरे के मन में घर की साफ़ सफाई का ख़याल आया । मैं अपने घर की सफ़ाई में जुट गई । तभी सफाई के दौरान मृत ससुर की डायरी मेरे हाथ लग गई ।

मैने ने जब अपने ससुर की डायरी को पलटना शुरू किया तो उसके एक पन्ने पर लिखा था-"दिनांक 26.10.2019....  " मेरी प्यारी बहू.....आज के इस भागदौड़ औऱ बेहद तनाव व संघर्ष भरी ज़िंदगी में घर से निकलते समय बच्चे अक़्सर बड़ों का आशीर्वाद लेना भूल जाते हैं , जबकि बुजुर्गों का यही आशीर्वाद मुश्किल समय में उनके लिए ढाल का काम करता है । बस इसीलिए जब तुम प्रतिदिन मेरा चश्मा साफ कर मुझे देने के लिए झुकती थी तो मैं मन ही मन अपना हाथ तुम्हारे सिर पर रख देता था , क्योंकि मरने से पहले तुम्हारी सास ने मुझसे कहा था कि बहू को अपनी बेटी की तरह प्यार से रखना औऱ उसे ये कभी भी मत महसूस होने देना कि वो अपने ससुराल में है औऱ हम उसके माँ बाप नहीं है ।उसकी छोटी मोटी गलतियों को उसकी नादानी समझकर माफ़ कर देना । वैसे मैं रहूं या न रहूं मेरा आशीष सदा तुम्हारे साथ है बेटा...सदा खुश रहो ।"

अपने ससुर की डायरी को पढ़कर मुझे रोना आने लगा लगा

आज मेरे ससुर को गुजरे ठीक 2 साल से ज़्यादा समय बीत चुके हैं , लेकिन फ़िर भी मैं रोज घर से बाहर निकलते समय अपने ससुर का चश्मा अच्छी तरह साफ़ कर , उनके टेबल पर रख दिया करती हूं....... उनके अनदेखे हाथ से मिले आशीष की लालसा में.....।

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अक़्सर हम जीवन में रिश्तों का महत्व महसूस नहीं कर पाते , चाहे वो किसी से भी हो, कैसा भी हो.......और जब तक महसूस करते हैं तब तक वह हमसे बहुत दूर जा चुका होता है ......!!

प्रत्येक रिश्तों की अहमियत औऱ उनका भावनात्मक कद्र बेहद जरूरी है , अन्यथा ये जीवन व्यर्थ है ।


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नारी शक्ति की सुरक्षा के लिये

 1. एक नारी को तब क्या करना चाहिये जब वह देर रात में किसी उँची इमारत की लिफ़्ट में किसी अजनबी के साथ स्वयं को अकेला पाये ? 

जब आप लिफ़्ट में प्रवेश करें और आपको 13 वीं मंज़िल पर जाना हो, तो अपनी मंज़िल तक के सभी बटनों को दबा दें ! कोई भी व्यक्ति उस परिस्थिति में हमला नहीं कर सकता जब लिफ़्ट प्रत्येक मंजिल पर रुकती हो ! 

2. जब आप घर में अकेली हों और कोई अजनबी आप पर हमला करे तो क्या करें ? तुरन्त रसोईघर की ओर दौड़ जायें 

आप स्वयं ही जानती हैं कि रसोई में पिसी मिर्च या हल्दी कहाँ पर उपलब्ध है ! और कहाँ पर चक्की व प्लेट रखे हैं !यह सभी आपकी सुरक्षा के औज़ार का कार्य कर सकते हैं ! और भी नहीं तो प्लेट व बर्तनों को ज़ोर- जोर से फैंके भले ही टूटे !और चिल्लाना शुरु कर दो !स्मरण रखें कि शोरगुल ऐसे व्यक्तियों का सबसे बड़ा दुश्मन होता है ! वह अपने आप को पकड़ा जाना कभी भी पसंद नहीं करेगा ! 

3. रात में ऑटो या टैक्सी से सफ़र करते समय ! 

ऑटो या टैक्सी में बैठते समय उसका नं० नोट करके अपने पारिवारिक सदस्यों या मित्र को मोबाईल पर उस भाषा में विवरण से तुरन्त सूचित करें जिसको कि ड्राइवर जानता हो ! मोबाइल पर यदि कोई बात नहीं हो पा रही हो या उत्तर न भी मिल रहा हो तो भी ऐसा ही प्रदर्शित करें कि आपकी बात हो रही है व गाड़ी का विवरण आपके परिवार/ मित्र को मिल चुका है ! . इससे ड्राईवर को आभास होगा कि उसकी गाड़ी का विवरण कोई व्यक्ति जानता है और यदि कोई दुस्साहस किया गया तो वह अविलम्ब पकड़ में आ जायेगा ! इस परिस्थिति में वह आपको सुरक्षित स्थिति में आपके घर पहुँचायेगा ! जिस व्यक्ति से ख़तरा होने की आशंका थी अब वह आपकी सुरक्षा का ध्यान रखेगा ! 

4. यदि ड्राईवर गाड़ी को उस गली/रास्ते पर मोड़ दे जहाँ जाना न हो और आपको महसूस हो कि आगे ख़तरा हो सकता है - तो क्या करें ? 

आप अपने पर्स के हैंडल या अपने दुपट्टा/ चुनरी का प्रयोग उसकी गर्दन पर लपेट कर अपनी तरफ़ पीछे खींचती हैं तो सैकिण्डो में वह व्यक्ति असहाय व निर्बल हो जायेगा ! यदि आपके पास पर्स या दुपट्टा न भी हो तो भी आप न घबरायें ! आप उसकी क़मीज़ के काल़र को पीछे से पकड़ कर खींचेंगी तो शर्ट का जो बटन लगाया हुआ है वह भी वही काम करेगा और आपको अपने बचाव का मौक़ा मिल जायेगा ! 

5. यदि रात में कोई आपका पीछा करता है ! 

किसी भी नज़दीकी खुली दुकान या घर में घुस कर उन्हें अपनी परेशानी बतायें ! यदि रात होने के कारण बन्द हों तो नज़दीक में एटीएम हो तो एटीएम बाक्स में घुस जायें क्योंकि वहाँ पर सीसीटीवी कैमरा लगे होते हैं ! पहचान उजागर होने के भय से किसी की भी आप पर वार करने की हिम्मत नहीं होगी ! 

आख़िरकार मानसिक रुप से जागरुक होना ही आपका आपके पास रहने वाला सबसे बड़ा हथियार सिद्ध होगा ! 

कृपया समस्त नारी शक्ति जिसका आपको ख़्याल है उन्हें न केवल बतायें बल्कि उन्हें जागरुक भी कीजिए ! अपनी नारी शक्ति की सुरक्षा के लिये ऐसा करना ! न केवल हम सभी का नैतिक उत्तरदायित्व है बल्कि कर्त्तव्य भी है ! 

प्रिय मित्रों इससे समस्त नारी शक्ति -अपनी मां, बहन, पत्नी व महिला मित्रों को अवगत करावें !

आप सभी से विनम्र निवेदन की इस संदेश को महिला शक्ति की जानकारी में अवश्य लायें यह समस्त नारी शक्ति की सुरक्षा के लिये सहायक सिद्ध होगा ! ऐसा मेरा विश्वास है !

जय हिंद

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प्रत्येक रिश्ते की अहमियत

 मैं घर की नई बहू थी और एक निजी बैंक में एक अच्छी पद पर काम करती थी। मेरी सास को गुज़रे हुए एक साल हो चुका था। घर में मेरे ससुर, श्री गुप्ता, और मेरे पति, रोहन, के अलावा कोई और नहीं था। रोहन का अपना व्यवसाय था, जिससे वे काफी व्यस्त रहते थे। हमारी निजी ज़िंदगी पर भी इसका असर था, और जब हम साथ समय बिताना चाहते, तो अक्सर घर में मौजूद बुज़ुर्ग ससुर के कारण बाधा आ जाती थी, क्योंकि वे कभी भी हमें बुला लेते थे।

हर सुबह जब मैं जल्दी-जल्दी घर का काम निपटाकर ऑफिस के लिए निकलने की तैयारी करती, तभी मेरे ससुर मुझे आवाज़ देकर कहते, "बहू, मेरा चश्मा साफ़ करके मुझे दे दो।" यह रोज़ का सिलसिला था। ऑफिस की देरी और काम के दबाव के कारण कभी-कभी मैं मन ही मन खीझ जाती थी, लेकिन फिर भी अपने ससुर से कुछ नहीं कह पाती थी।

एक दिन, मैंने इस बारे में रोहन से बात की। उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ, लेकिन उन्होंने पिताजी से कुछ नहीं कहा। उन्होंने मुझे सलाह दी, "सुबह उठते ही पिताजी का चश्मा साफ़ करके उनके कमरे में रख दिया करो, ताकि ऑफिस जाते समय कोई परेशानी न हो।"

अगले दिन मैंने वैसा ही किया, लेकिन फिर भी ऑफिस के लिए निकलते समय वही बात हुई। ससुर जी ने फिर बुलाकर कहा, "बहू, मेरा चश्मा साफ़ कर दो।" मुझे बहुत गुस्सा आया, लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। धीरे-धीरे मैंने उनकी बातों को अनसुना करना शुरू कर दिया, और कुछ समय बाद तो मैंने बिल्कुल ध्यान देना ही बंद कर दिया।

जब भी ससुर जी कुछ बोलते, मैं कोई प्रतिक्रिया नहीं देती और ख़ामोशी से अपने काम में लगी रहती।

समय के साथ, एक दिन ससुर जी का भी निधन हो गया।

वक़्त का पहिया रुकता नहीं है; वह चलता रहता है।

एक दिन छुट्टी थी। अचानक मेरे मन में घर की सफ़ाई करने का ख़याल आया। मैं अपने घर की सफ़ाई में जुट गई। सफ़ाई के दौरान मुझे दिवंगत ससुर जी की एक डायरी मिली।

मैंने जब उस डायरी को पलटना शुरू किया, तो उसके एक पन्ने पर लिखा था, "दिनांक 26.10.2019... मेरी प्यारी बहू अनिता... आज की इस भागदौड़ और तनाव भरी ज़िंदगी में बच्चे घर से निकलते समय अक्सर बड़ों का आशीर्वाद लेना भूल जाते हैं, जबकि बुज़ुर्गों का यही आशीर्वाद मुश्किल समय में उनके लिए ढाल का काम करता है। इसलिए जब तुम प्रतिदिन मेरा चश्मा साफ़ कर मुझे देने के लिए झुकती थी, तो मैं मन ही मन अपना हाथ तुम्हारे सिर पर रखकर तुम्हें आशीर्वाद देता था। तुम्हारी सास ने जाते समय मुझसे कहा था कि बहू को अपनी बेटी की तरह प्यार से रखना और उसे यह कभी महसूस न होने देना कि वह ससुराल में है और हम उसके माता-पिता नहीं हैं। उसकी छोटी-मोटी गलतियों को उसकी नादानी समझकर माफ़ कर देना। चाहे मैं रहूँ या न रहूँ, मेरा आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है, बेटी... सदा खुश रहो।"

अपने ससुर की डायरी पढ़कर मेरी आँखों में आँसू आ गए।

आज ससुर जी को गुज़रे दो साल से ज़्यादा हो चुके हैं, लेकिन फिर भी मैं रोज़ घर से बाहर निकलते समय उनका चश्मा अच्छी तरह साफ़ करके, उनकी मेज़ पर रख देती हूँ... उनके अनदेखे आशीर्वाद की आशा में।

अक्सर हम जीवन में रिश्तों का महत्व समझ नहीं पाते, चाहे वे किसी से भी हों, कैसे भी हों... और जब तक महसूस करते हैं, तब तक वे हमसे बहुत दूर जा चुके होते हैं।


प्रत्येक रिश्ते की अहमियत और उनका भावनात्मक आदर करना बेहद ज़रूरी है, अन्यथा यह जीवन अधूरा है।

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