विचारों के अनुरूप ही मनुष्य की स्थिति और गति होती है। श्रेष्ठ विचार सौभाग्य का द्वार हैं, जबकि निकृष्ट विचार दुर्भाग्य का,आपको इस ब्लॉग पर प्रेरक कहानी,वीडियो, गीत,संगीत,शॉर्ट्स, गाना, भजन, प्रवचन, घरेलू उपचार इत्यादि मिलेगा । The state and movement of man depends on his thoughts. Good thoughts are the door to good fortune, while bad thoughts are the door to misfortune, you will find moral story, videos, songs, music, shorts, songs, bhajans, sermons, home remedies etc. in this blog.
भाग्य बडा या कर्म ?????
भाग्य बडा या कर्म .. इस बात पर अबतक सर्वसम्मति का अभाव है। दोनो पक्ष के लोग अपनी अपनी बातों को सही साबित करने के लिए अलग अलग तर्क दिया करते हैं , अलग अलग कहानियां गढा करते हैं। कर्म को मानने वाले लोगों का मत है कि हम जैसे कर्म करते हैं , वैसा ही फल मिलता है। असफलता स्थिति में हमें अपने भीतर झांकना चाहिए कि चूक कहां हुई। लेकिन हम धागे, टोने-टोटकों , माथे या हाथों की लकीरों और जन्मकुंडलियों से भाग्य को समझने की कोशिश करते हैं, यदि कर्म अच्छे हैं तो भाग्य अपने आप अच्छा हो ही जाएगा। इस दुनिया राजा से रंक और रंक से राजा बनने के कहानियों की कोई कमी नहीं।
दूसरी ओर भाग्य को मानने वाले लोगों का कहना है कि क्यों कुछ बच्चे मजबूत शरीर और कुछ कई बीमारियों के साथ या बिना हाथ पांव के जन्म लेते हैं। क्यूं कुछ बच्चे सुख सुविधा संपन्न परिवारों में तो कुछ का जन्म दरिद्रों के घर में होता है। कुछ अच्छे आई क्यू के साथ जन्म लेते हैं , तो कुछ अविकसित मस्तिष्क के साथ ही इस दुनिया में कदम रखते हैं। कुछ का पालन पोषण माता पिता और परिवार जनों के भरपूर लाड प्यार में होता है , तो कुछ इससे वंचित रह जाते हैं। जबकि इन बच्चों ने कोई गल्ती नहीं की है। इसी प्रकार बडे होने के बाद किसी को मनोनुकूल जीवनसाथी मिलते हैं,तो विवाह के बाद किसी का जीवन नर्क हो जाता है। किसी को अनायास संतान का सुख मिलता है , तो कई जीवनभर डॉक्टरों और देवी देवताओं के चक्कर काटते हैं। सचमुच विपरीत पक्ष वालों के लिए इसका जबाब दे पाना कठिन है।
वास्तव में कार्य कारण के नियमों से पूरी प्रकृति भरी पडी है। इतनी बडी प्रकृति में हमने कोई भी काम बिना नियम के होते नहीं देखा है। सूर्य अपने पथ पर तो बाकी ग्रह उपग्रह भी अपने पथ पर चल रहे हैं। पृथ्वी पर स्थित एक एक जड चेतन अपने अपने स्वभाव के हिसाब से काम कर रहे हैं। हम जैसा कर्म करेंगे , वैसा फल मिलेगा ही । बिना संतुलन के दौडेंगे , तो गिरेंगे , गिरेंगे तो चोट लगेगी। यदि कार्य और कारण का संबंध न हो तो हम कोई नियम स्थापित नहीं कर सकते। पर बालक ने जन्म लेते साथ जो पाया , वह उसके कर्म का फल नहीं। पर यहां भी तो कोई नियम काम करना चाहिए , आज विज्ञान माने या न माने , पर यह फल बिना किसी नियम के उसे नहीं मिल सकता।
जबतक कर्म से अधिक फल की प्राप्ति होती रहती है , कोई भी भाग्य की ताकत को स्वीकार नहीं करता। उसे महसूस होता है कि उसे उसके किए का ही फल मिल रहा है। जिन्हें फल नहीं मिल रहा , वे कर्म ही सही नहीं कर रहें। पर जब कर्म की तुलना में प्रतिफल नहीं मिल पाता , लोग भाग्य की ताकत को महसूस करने लगते हैं। अपने आरंभिक जीवन में सफल रहनेवाले लोग इसे स्वीकार नहीं कर पाते , पर जैसे ही उनके जीवन में भी बिना किसी बुरे कर्म के विपत्तियां दिखाई पडती हैं , उन्हें भी भाग्य की ताकत महसूस होने लगती है। जीवन के प्रारंभिक दौर में असफलता प्राप्त करने वाले लोग तो जीवन में संतुलन बना भी लेते हैं , बाद में भाग्य के कारण असफलता प्राप्त करने वालों को अधिक कष्ट होता है।
भाग्य को जानने के लिए अक्सर लोग ज्योतिषियों से संपर्क करते हैं , पर प्रारब्ध की जानकारी ज्योतिषियों को भी नहीं होती। भिन्न भिन्न स्तर वाले परिवार में भी बच्चे का जन्म एक समय में हो सकता है यानि एक जन्म कुंडली होते हुए भी बच्चे का भाग्य अलग अलग हो सकता है। नक्षत्रों और ग्रहों पर आधारित ज्योतिष मात्र काल गणना का विज्ञान है। जिस तरह घडी के समय के आधार पर अंधरे उजाले को देखते हुए दिनभर के और कैलेण्डर के आधार पर जाडे , गर्मी , बरसात के मौसम को समझते हुए वर्षभर के कार्यक्रमों को अंजाम दिया जाता है , उसी प्रकार हम जन्म कालीन ग्रहों के आधार पर अपने जीवन के उतार चढाव को समझकर तदनुरूप कार्यक्रम बना सकते हैं। जीवन में कभी समय आपके अनुकूल होता है तो कभी प्रतिकूल , प्रतिकूल समय में आपके अनुभव बढते हैं , जबकि अनुकूल समय में आपको अच्छे परिणाम मिलते हैं। अच्छे वक्त की जानकारी से आपका उत्साह, तो बुरे वक्त की जानकारी से आपका धैर्य बढता है।
किसी खास परिवार , देश या माहौल में जन्म लेना तो मनुष्य के वश में नहीं , इसलिए जीवन में जैसी जैसी परिस्थिति मिलती जाए , उसे स्वीकार करना हमारी मजबूरी है , पर आशावादी सोंच के साथ अच्छे कर्म किए जा सकते हैं और उनके सहारे अपने भाग्य को मजबूत बनाया जा सकता है। महीने के पहली तारीख को मिले तनख्वाह को कम या अधिक करना आपके वश में नहीं , पर उससे पूरे महीने या पूरे जीवन अच्छे या बुरे तरीके से जीवन निर्वाह करना आपके वश में है। आप पहले ही दिन महीनेभर क्या भविष्य के भी कार्यक्रम बनाकर नियोजित ढंग से खर्च कर सकते हैं या बाजार में अंधाधुंध खरीदारी कर , शराब पीकर , जुआ खेलकर महीने या भविष्य के बाकी दिनों को बुरा बना सकते हैं। इसलिए किसी खास परिस्थिति में होते हुए भी कर्म के महत्व से इंकार नहीं किया जा सकता।
हां , जीवन में कभी कभी ऐसा समय भी आता है ,जब भाग्य के साथ देने से मित्रों , समाज या कानून का कुछ खास सहयोग आपको मिलने लगता है ,किसी तरह के संयोग से आपके काम बनने लगते हैं , तो कभी दुर्भाग्य से असामाजिक तत्वों को भी आपको झेलना पडता है। 100 वर्ष की लंबी आयु में कभी दस बीस वर्षों तक ग्रहों का खास अच्छा या बुरा प्रभाव हमपर पड सकता है। उस भाग्य या दुर्भाग्य से खुद को फायदा दिलाने के लिए हमें आक्रामक या सुरक्षात्मक ढंग से जीवन जीना चाहिए। जैसे जाडे की सूरज की गर्मी को सेंककर हम खुद को गर्म रखते हैं या गर्मी की दोपहर के सूरज की ताप में बचने के किसी पेड़ की छाया में या वातानुकूलित घर में शरण लेते हैं।
पर ध्यान रखें , जीवन में कभी भी हमारा मेहनत विफल नहीं होता । प्रकृति में प्रत्येक वस्तु का महत्व है , किसी में कुछ गुण हैं ,उसे विकसित करने की दिशा में कदम बढाए , आज या कल , उसकी कद्र होगी ही। कोई बीज तीन चार महीने में तो कोई दस बीस वर्ष में फल देना आरंभ करता है। हर पशु पक्षी का भी हर काम का अलग अलग समय है। देखने में एक जैसे होते हुए भी हर मनुष्य अलग अलग तरह के बीज हैं , इन्हें फलीभूत होने के लिए भी अनुकूल परिस्थितियों की आवश्यकता होती है । आसमान में गोचर के ग्रह मनुष्य के सम्मुख विभिन्न परिस्थितियों का निर्माण करते हैं , जिसके आधार पर कर्म का सुंदर फल प्राप्त होता है। लोग भले ही इसे भाग्य का नाम दें , पर वह हमारे सतत कर्म का ही फल होता है।
रहीम के दोहे Rahim's couplets
एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अगाय॥
देनहार कोउ और है, भेजत सो दिन रैन।
लोग भरम हम पै धरैं, याते नीचे नैन॥
अब रहीम मुसकिल परी, गाढ़े दोऊ काम।
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलैं न राम॥
गरज आपनी आप सों रहिमन कहीं न जाया।
जैसे कुल की कुल वधू पर घर जात लजाया॥
छमा बड़न को चाहिये, छोटन को उत्पात।
कह ‘रहीम’ हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात॥
तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥
खीरा को मुंह काटि के, मलियत लोन लगाय।
रहिमन करुए मुखन को, चहियत इहै सजाय॥
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग॥
जे गरीब सों हित करै, धनि रहीम वे लोग।
कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग॥
जो बड़ेन को लघु कहे, नहिं रहीम घटि जांहि।
गिरिधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नांहि॥
खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान।
रहिमन दाबे न दबै, जानत सकल जहान॥
टूटे सुजन मनाइए, जो टूटे सौ बार।
रहिमन फिरि फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार॥
बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन बिगरे दूध को, मथे न माखन होय॥
आब गई आदर गया, नैनन गया सनेहि।
ये तीनों तब ही गये, जबहि कहा कछु देहि॥
चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछु नहि चाहिये, वे साहन के साह॥
रहिमन देख बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तलवारि॥
माली आवत देख के, कलियन करे पुकारि।
फूले फूले चुनि लिये, कालि हमारी बारि॥
रहिमन वे नर मर गये, जे कछु माँगन जाहि।
उनते पहिले वे मुये, जिन मुख निकसत नाहि॥
रहिमन विपदा ही भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥
रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर॥
बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय॥
मन मोती अरु दूध रस, इनकी सहज सुभाय।
फट जाये तो ना मिले, कोटिन करो उपाय॥
वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाँटनवारे को लगै, ज्यौं मेंहदी को रंग॥
रहिमह ओछे नरन सो, बैर भली ना प्रीत।
काटे चाटे स्वान के, दोउ भाँति विपरीत॥
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥
रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती, मानुष, चून॥
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गुरु नानकदेव के पद
झूठी देखी प्रीत
जगत में झूठी देखी प्रीत।
अपने ही सुखसों सब लागे, क्या दारा क्या मीत॥
मेरो मेरो सभी कहत हैं, हित सों बाध्यौ चीत।
अंतकाल संगी नहिं कोऊ, यह अचरज की रीत॥
मन मूरख अजहूँ नहिं समुझत, सिख दै हारयो नीत।
नानक भव-जल-पार परै जो गावै प्रभु के गीत॥
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को काहू को भाई
हरि बिनु तेरो को न सहाई।
काकी मात-पिता सुत बनिता, को काहू को भाई॥
धनु धरनी अरु संपति सगरी जो मानिओ अपनाई।
तन छूटै कुछ संग न चालै, कहा ताहि लपटाई॥
दीन दयाल सदा दु:ख-भंजन, ता सिउ रुचि न बढाई।
नानक कहत जगत सभ मिथिआ, ज्यों सुपना रैनाई॥
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मीरा के पद
मीरा के पद
दरद न जाण्यां कोय
हेरी म्हां दरदे दिवाणी म्हारां दरद न जाण्यां कोय।
घायल री गत घाइल जाण्यां, हिवडो अगण संजोय।
जौहर की गत जौहरी जाणै, क्या जाण्यां जिण खोय।
दरद की मार्यां दर दर डोल्यां बैद मिल्या नहिं कोय।
मीरा री प्रभु पीर मिटांगां जब बैद सांवरो होय॥
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अब तो हरि नाम लौ लागी
सब जग को यह माखनचोर, नाम धर्यो बैरागी।
कहं छोडी वह मोहन मुरली, कहं छोडि सब गोपी।
मूंड मुंडाई डोरी कहं बांधी, माथे मोहन टोपी।
मातु जसुमति माखन कारन, बांध्यो जाको पांव।
स्याम किशोर भये नव गोरा, चैतन्य तांको नांव।
पीताम्बर को भाव दिखावै, कटि कोपीन कसै।
दास भक्त की दासी मीरा, रसना कृष्ण रटे॥
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राम रतन धन पायो
पायो जी म्हे तो रामरतन धन पायो।
बस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरु, किरपा को अपणायो।
जनम जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।
खरचै नहिं कोई चोर न लेवै, दिन-दिन बढत सवायो।
सत की नाव खेवहिया सतगुरु, भवसागर तर आयो।
मीरा के प्रभु गिरधरनागर, हरख-हरख जस पायो॥
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हरि बिन कछू न सुहावै
परम सनेही राम की नीति ओलूंरी आवै।
राम म्हारे हम हैं राम के, हरि बिन कछू न सुहावै।
आवण कह गए अजहुं न आये, जिवडा अति उकलावै।
तुम दरसण की आस रमैया, कब हरि दरस दिलावै।
चरण कंवल की लगनि लगी नित, बिन दरसण दुख पावै।
मीरा कूं प्रभु दरसण दीज्यौ, आंणद बरण्यूं न जावै॥
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झूठी जगमग जोति
आवो सहेल्या रली करां हे, पर घर गावण निवारि।
झूठा माणिक मोतिया री, झूठी जगमग जोति।
झूठा सब आभूषण री, सांचि पियाजी री पोति।
झूठा पाट पटंबरारे, झूठा दिखणी चीर।
सांची पियाजी री गूदडी, जामे निरमल रहे सरीर।
छप्प भोग बुहाई दे है, इन भोगिन में दाग।
लूण अलूणो ही भलो है, अपणो पियाजी को साग।
देखि बिराणै निवांण कूं हे, क्यूं उपजावै खीज।
कालर अपणो ही भलो है, जामें निपजै चीज।
छैल बिराणे लाख को हे अपणे काज न होइ।
ताके संग सीधारतां हे, भला न कहसी कोइ।
वर हीणों आपणों भलो हे, कोढी कुष्टि कोइ।
जाके संग सीधारतां है, भला कहै सब लोइ।
अबिनासी सूं बालवां हे, जिपसूं सांची प्रीत।
मीरा कूं प्रभु मिल्या हे, ऐहि भगति की रीत॥
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अब तो मेरा राम
अब तो मेरा राम नाम दूसरा न कोई॥
माता छोडी पिता छोडे छोडे सगा भाई।
साधु संग बैठ बैठ लोक लाज खोई॥
सतं देख दौड आई, जगत देख रोई।
प्रेम आंसु डार डार, अमर बेल बोई॥
मारग में तारग मिले, संत राम दोई।
संत सदा शीश राखूं, राम हृदय होई॥
अंत में से तंत काढयो, पीछे रही सोई।
राणे भेज्या विष का प्याला, पीवत मस्त होई॥
अब तो बात फैल गई, जानै सब कोई।
दास मीरा लाल गिरधर, होनी हो सो होई॥
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म्हारे तो गिरधर गोपाल
म्हारे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई॥
जाके सिर मोर मुगट मेरो पति सोई।
तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई॥
छाँडि दई कुद्दकि कानि कहा करिहै कोई॥
संतन ढिग बैठि बैठि लोकलाज खोई॥
चुनरीके किये टूक ओढ लीन्हीं लोई।
मोती मूँगे उतार बनमाला पोई॥
अंसुवन जू सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई।
अब तो बेल फैल गई आणँद फल होई॥
भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई।
दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही॥
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नीरज के गीत
अब तो मजहब कोई, ऐसा भी चलाया जाए
जिसमें इनसान को, इनसान बनाया जाए
आग बहती है यहाँ, गंगा में, झेलम में भी
कोई बतलाए, कहाँ जाकर नहाया जाए
मेरा मकसद है के महफिल रहे रोशन यूँही
खून चाहे मेरा, दीपों में जलाया जाए
मेरे दुख-दर्द का, तुझपर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी ना खाया जाए
जिस्म दो होके भी, दिल एक हो अपने ऐसे
मेरा आँसू, तेरी पलकों से उठाया जाए
गीत गुमसुम है, ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखी
ऐसे माहौल में,‘नीरज’ को बुलाया जाए
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कबीर की साखियाँ
कबीर की साखियाँ
गुरु गोविंद दोऊ खडे, काके लागूँ पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविंद दिया बताय॥
सिष को ऐसा चाहिए, गुरु को सब कुछ देय।
गुरु को ऐसा चाहिए, सिष से कुछ नहिं लेय॥
कबिरा संगत साधु की, ज्यों गंधी की बास।
जो कुछ गंधी दे नहीं, तौ भी बास सुबास॥
साधु तो ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै, थोथा देइ उडाय॥
गुरु कुम्हार सिष कुंभ है गढ-गढ काढै खोट।
अंतर हाथ सहार दै, बाहर मारै चोट॥
कबिरा प्याला प्रेम का, अंतर लिया लगाय।
रोम रोम में रमि रहा, और अमल क्या खाय॥
जल में बसै कमोदिनी, चंदा बसै अकास।
जो है जाको भावता, सो ताही के पास॥
प्रीतम को पतियाँ लिखूँ, जो कहुँ होय बिदेस।
तन में मन में नैन में, ताको कहा संदेस॥
नैनन की करि कोठरी, पुतली पलँग बिछाय।
पलकों की चिक डारिकै, पिय को लिया रिझाय॥
गगन गरजि बरसे अमी, बादल गहिर गँभीर।
चहुँ दिसि दमकै दामिनी, भीजै दास कबीर॥
जाको राखै साइयाँ, मारि न सक्कै कोय।
बाल न बाँका करि सकै, जो जग बैरी होय॥
नैनों अंतर आव तूँ, नैन झाँपि तोहिं लेवँ।
ना मैं देखौं और को, ना तोहि देखन देवँ॥
लाली मेरे लाल की, जित देखों तित लाल।
लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल॥
कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढै बन माहिं।
ऐसे घट में पीव है, दुनिया जानै नाहिं।
सिर राखे सिर जात है, सिर काटे सिर होय।
जैसे बाती दीप की, कटि उजियारा होय॥
जिन ढूँढा तिन पाइयाँ, गहिरे पानी पैठ।
जो बौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ॥
बिरहिनि ओदी लाकडी, सपचे और धुँधुआय।
छूटि पडौं या बिरह से, जो सिगरी जरि जाय॥
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहीं।
प्रेम गली अति साँकरी, ता मैं दो न समाहिं॥
लिखा-लिखी की है नहीं, देखा देखी बात।
दुलहा दुलहिनि मिलि गए, फीकी परी बरात॥
रोडा होइ रहु बाटका, तजि आपा अभिमान।
लोभ मोह तृस्ना तजै, ताहि मिलै भगवान॥
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कबीर के पद
काहे री नलिनी तू कुमिलानी।
तेरे ही नालि सरोवर पानी॥
जल में उतपति जल में बास, जल में नलिनी तोर निवास।
ना तलि तपति न ऊपरि आगि, तोर हेतु कहु कासनि लागि॥
कहे 'कबीर जे उदकि समान, ते नहिं मुए हमारे जान।
मन मस्त हुआ तब क्यों बोलै।
हीरा पायो गाँठ गँठियायो, बार-बार वाको क्यों खोलै।
हलकी थी तब चढी तराजू, पूरी भई तब क्यों तोलै।
सुरत कलाली भई मतवाली, मधवा पी गई बिन तोले।
हंसा पायो मानसरोवर, ताल तलैया क्यों डोलै।
तेरा साहब है घर माँहीं बाहर नैना क्यों खोलै।
कहै 'कबीर सुनो भई साधो, साहब मिल गए तिल ओलै॥
रहना नहिं देस बिराना है।
यह संसार कागद की पुडिया, बूँद पडे गलि जाना है।
यह संसार काँटे की बाडी, उलझ पुलझ मरि जाना है॥
यह संसार झाड और झाँखर आग लगे बरि जाना है।
कहत 'कबीर सुनो भाई साधो, सतुगरु नाम ठिकाना है॥
झीनी-झीनी बीनी चदरिया,
काहे कै ताना, काहै कै भरनी, कौन तार से बीनी चदरिया।
इंगला पिंगला ताना भरनी, सुखमन तार से बीनी चदरिया॥
आठ कँवल दल चरखा डोलै, पाँच तत्त गुन तीनी चदरिया।
साँई को सियत मास दस लागै, ठोक-ठोक कै बीनी चदरिया॥
सो चादर सुर नर मुनि ओढी, ओढि कै मैली कीनी चदरिया।
दास 'कबीर जतन से ओढी, ज्यों की त्यों धरि दीनी चदरिया॥
मन लागो मेरो यार फकीरी में।
जो सुख पावौं राम भजन में, सो सुख नाहिं अमीरी में।
भली बुरी सबकी सुनि लीजै, कर गुजरान गरीबी में॥
प्रेम नगर में रहनि हमारी, भलि-बनि आई सबूरी में।
हाथ में कूंडी बगल में सोंटा, चारों दिस जागीरी में॥
आखिर यह तन खाक मिलैगो, कहा फिरत मगरूरी में।
कहत 'कबीर सुनो भई साधो, साहिब मिलै सबूरी में॥
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कबीर की साखियाँ
कबीर की साखियाँ
कस्तुरी कुँडली बसै, मृग ढ़ुढ़े बब माहिँ.
ऎसे घटि घटि राम हैं, दुनिया देखे नाहिँ..
प्रेम ना बाड़ी उपजे, प्रेम ना हाट बिकाय.
राजा प्रजा जेहि रुचे, सीस देई लै जाय ..
माला फेरत जुग गाया, मिटा ना मन का फेर.
कर का मन का छाड़ि, के मन का मनका फेर..
माया मुई न मन मुआ, मरि मरि गया शरीर.
आशा तृष्णा ना मुई, यों कह गये कबीर ..
झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद.
खलक चबेना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद..
वृक्ष कबहुँ नहि फल भखे, नदी न संचै नीर.
परमारथ के कारण, साधु धरा शरीर..
साधु बड़े परमारथी, धन जो बरसै आय.
तपन बुझावे और की, अपनो पारस लाय..
सोना सज्जन साधु जन, टुटी जुड़ै सौ बार.
दुर्जन कुंभ कुम्हार के, एके धकै दरार..
जिहिं धरि साध न पूजिए, हरि की सेवा नाहिं.
ते घर मरघट सारखे, भूत बसै तिन माहिं..
मूरख संग ना कीजिए, लोहा जल ना तिराइ.
कदली, सीप, भुजंग-मुख, एक बूंद तिहँ भाइ..
तिनका कबहुँ ना निन्दिए, जो पायन तले होय.
कबहुँ उड़न आखन परै, पीर घनेरी होय..
बोली एक अमोल है, जो कोइ बोलै जानि.
हिये तराजू तौल के, तब मुख बाहर आनि..
ऐसी बानी बोलिए,मन का आपा खोय.
औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होय..
लघता ते प्रभुता मिले, प्रभुत ते प्रभु दूरी.
चिट्टी लै सक्कर चली, हाथी के सिर धूरी..
निन्दक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय.
बिन साबुन पानी बिना, निर्मल करे सुभाय..
मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं.
मुकताहल मुकता चुगै, अब उड़ि अनत ना जाहिं..
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कबीर की साखियाँ - 2
कबीर की साखियाँ - 2
चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह ।
जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥
माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय ॥
तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय ।
कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय ॥
गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥
सुख मे सुमिरन ना किया, दु:ख में करते याद ।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥
साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥
कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥
माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥
दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥
बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥
साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय॥
साँई इतना दीजिए जामें कुटुंब समाय ।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भुखा जाय॥
जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥
उठा बगुला प्रेम का तिनका चढ़ा अकास।
तिनका तिनके से मिला तिन का तिन के पास॥
सात समंदर की मसि करौं लेखनि सब बनराइ।
धरती सब कागद करौं हरि गुण लिखा न जाइ॥
साधू गाँठ न बाँधई उदर समाता लेय।
आगे पाछे हरी खड़े जब माँगे तब देय॥
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कबीर की कुंडलियां
माला फेरत जुग गया फिरा ना मन का फेर
कर का मनका छोड़ दे मन का मन का फेर
मन का मनका फेर ध्रुव ने फेरी माला
धरे चतुरभुज रूप मिला हरि मुरली वाला
कहते दास कबीर माला प्रलाद ने फेरी
धर नरसिंह का रूप बचाया अपना चेरो
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आया है किस काम को किया कौन सा काम
भूल गए भगवान को कमा रहे धनधाम
कमा रहे धनधाम रोज उठ करत लबारी
झूठ कपट कर जोड़ बने तुम माया धारी
कहते दास कबीर साहब की सुरत बिसारी
मालिक के दरबार मिलै तुमको दुख भारी
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चलती चाकी देखि के दिया कबीरा रोय
दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोय
साबित बचा न कोय लंका को रावण पीसो
जिसके थे दस शीश पीस डाले भुज बीसो
कहिते दास कबीर बचो न कोई तपधारी
जिन्दा बचे ना कोय पीस डाले संसारी
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कबिरा खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर
ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर
ना काहू से बैर ज्ञान की अलख जगावे
भूला भटका जो होय राह ताही बतलावे
बीच सड़क के मांहि झूठ को फोड़े भंडा
बिन पैसे बिन दाम ज्ञान का मारै डंडा
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