विश्वास है कि भगवान शिव

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शिव के सभी अनुयायियों का विश्वास है कि भगवान शिव ईश्वर हैं... जिनकी परम सत्ता, पराशिव, दिक्काल और रुप से परे है... योगी मौन रुप से उसे "नेति नेति" कहते हैं... जी हाँ... भगवान शिव ऐसे ही अबोधगम्य भगवान हैं...

शिव के सभी अनुयायियों का विश्वाश है कि भगवान शिव ईश्वर हैं... जिनके प्रेम की सर्वव्यापी प्रकृति, पराशक्ति, आधारभूत, मूल तत्व या शुद्ध चेतना है... जो सभी स्वरुपों से ऊर्जा, अस्तित्व, ज्ञान और परमानन्द के रुप में बहती रहती है...

शिव के सभी अनुयायियों का विश्वास है कि भगवान शिव ईश्वर हैं... जिनकी सर्वव्यापी प्रकृति परम् आत्मा, सर्वोपरि महादेव, परमेश्वर, वेदों एवं आगमों की प्रणेता तथा सभी सत्ताओं की कर्ता भर्ता एवं हर्ता हैं...

शिव के सभी अनुयायी शिव-शक्ति के पुत्र महादेव भगवान गणेश में विश्वास करते हैं तथा कोई भी पूजा या कार्य प्रारंभ करने से पूर्व उनकी पूजा अवश्य करते हैं... उनका नियम सहानुभूतिशील है... उनका विधान न्यायपूर्ण है... न्याय ही उनका मन है...

शिव के सभी अनुयायी शिव - शक्ति के पुत्र महादेव कार्तिकेय में विश्वास करते हैं... जिनकी कृपा का वेल अज्ञान के बंधन को नष्ट कर देता है... योगी पद्मासन में बैठकर मुरूगन की उपासना करते हैं... इस आत्मसंयम से... उनका मन शांत हो जाता है...

शिव के सभी अनुयायियों का विश्वास है कि सभी आत्माओं की रचना भगवान शिव ने की है और वे तद्रूप (उन्ही जैसी) हैं तथा जब उनकी कृपा से अणव, कर्म और माया दूर हो जाएगी, तो सभी आत्माएं इस तद्रूपता का पूर्ण साक्षात्कार कर लेंगी...

शिव के सभी अनुयायी तीन लोकों में विश्वास करते हैं... स्थूल लोक [भूलोक] जहां सभी आत्माएं भौतिक शरीर धारण करती हैं... सूक्ष्म लोक [अंतर्लोक] जहां आत्माएं सूक्ष्म शरीर धारण करती हैं... तथा कारण लोक [शिवलोक] जहां आत्माएं अपने स्व-प्रकाशमान स्परुप में विद्यमान रहती हैं...

शिव के सभी अनुयायी कर्म के विधान में विश्वास करते हैं... कि सबको अपने सभी कर्मों का फल अवश्य मिलता है... और यह कि सभी कर्मों के नष्ट होने तक और मोक्ष या निर्वाण प्राप्त होने तक सभी आत्मा बार-बार शरीर धारण करती रहती हैं...

शिव के सभी अनुयायियों का विश्वास है कि ज्ञान या प्रज्ञा प्राप्त करने के लिए चर्या या धार्मिक जीवन, क्रिया या मंदिर में पूजा और जीवित सत्गुरू की कृपा से योगाभ्यास अत्यावश्यक है... जो पराशिव की और ले जाता है...

शिव के सभी अनुयायियों का विश्वास है अशुभ या अमंगल का कोई तात्त्विक अस्तित्व नहीं है... जब तक अशुभ के आभास का स्रोत अज्ञान स्वयं न हो, अशुभ का कोई स्रोत नहीं है... शैव हिन्दू वास्तव में दयालु होते हैं... वे जानते हैं कि अन्ततः कुछ भी शुभ या अशुभ नहीं है... सबकुछ शिव की इच्छा है...

शिव के सभी अनुयायियों का विश्वास है कि तीनों लोकों द्वारा सामंजस्यपूर्वक एक साथ कार्य करना धर्म है और यह कि यह सामंजस्य मंदिर में पूजा करके उत्पन्न किया जा सकता है... जहां पर तीनों लोकों की सत्ताएं संप्रेषण कर सकती हैं...

शिव के सभी अनुयायी पंचाक्षर मंत्र, पांच पवित्र अक्षरों से बने मंत्र "नमः शिवाय" में विश्वास करते हैं... जो शैव संप्रदाय का प्रमुख और अनिवार्य मंत्र है... "नमः शिवाय" का रहस्य इसे सही होठों से सही समय पर सुनना है...
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श्री स्वामी समर्थ आरती

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श्री स्वामी समर्थ आरती
जय जय सदगुरू स्वामी समर्था आरती करूं गुरुवर्या रे l
अगाध महिमा तव चरणांचा वर्णाया मति दे या रे ll धृ.ll
अक्कलकोटी वास करूनिया दाविली अघटित चर्चा रे l
लीलापाशे बद्ध करुनिया,तोडिले भवभया रे ll १ ll
यवने पुशिले स्वामि कहाँ है l
अक्कलकोटी पहा रे l समाधिसुख ते भोगुनि बोले, धन्य स्वामिवर्या रे ll २ ll जाणसि मनिचे सर्वसमर्था विनवु किती भवहरा रे l
इतुके देई दीनदयाळा नच तव पद अंतरा रे ll ३ ll
॥ श्री स्वामी समर्थ जय जय स्वामी समर्थ ॥
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हमारे दशनाम इस परकार है


हमारे दशनाम इस परकार है ः
(1)-वन, (2)-अरण्य, (3)-गिरि, (4)-सागर,
(5)-पर्वत, (6)-तीर्थ, (7)-आश्रम, (8)-पुरि,
(9)-भारती, (10)-सरस्वती हमारे समाज की 52 मढी है जो इस परकार
है----
गिरि,पर्वत,सागर ­ की 27 मढी है
ओर पुरियो की 16 मढी है,
ओर गुरू शंकरा चार्य सन्यासी वन की 4
मढी हैI ओर भारतीयो की 4 मढी है
ओर लामा गुरू की 1 मढी है जिनका विवरण इस परकार है:- {गिरि,पर्वत,साग ­र की 27मढी इस परकार
है -- 1-रामदत़ी, 2-ओंकार लाल नाथी, 3-
चन्दनाथी बोदला, 4-व्रहा नाथी, 5-
दुर्गा नाथी, 6-व्रहा नाथी, 7-सेज नाथी, 8-
जग जीवन नाथी, 9-पाटम्बर नाथी, 10-
ज्ञान नाथी- -11-अघोर नाथी, 12-भाव
नाथी, 13-ऋदि नाथी, 14-सागर नाथी, 15-चाँद नाथ बोदला, 16-कुसुम नाथी, 17-अपार
नाथी, 18-रत्न नाथी, 19-नागेन्द्र नाथी, 20-
रूद्र नाथी 21-महेश नाथी, 22-अजरज नाथी,
23-मेघ नाथी, 24-पर्वत नाथी, 25-मान
नाथी, 26-पारस नाथी, 27-दरिया नाथी पुरियो की 16 मढी इस परकार है:- 1-वैकुण्ठ पुरि, 2-केशव पुरि मुलतानी,3-
गंगा पुरि दरिया पुरि, 4-ञिलोक पुरि, 5-
वन मेघनाथ पुरि, 6-सेज पुरि, 7-भगवन्त
पुरि, 8-पू्रण पुरि 9-भण्डारी हनुमत पुरि,
10-जड भरत पुरि, 11-लदेर दरिया पुरि,
12-संग दरिया पुरि, 13-सोम दरिया पुरि 14-नील कण्ठ पुरि, 15-तामक
भियापुरि, 16-मुयापुरिनिरं ­जनी- गुरूशंकरा चार्य सन्यासी वन की 4 मढी इस
परकार ह:- 1-गंगासनी वन, 2-सिंहासनी वन, 3-वाल
वन कुण्डली श्री वन, 4-होड सारी वन-अत्म
वन, भारती की 4 मढी इस परकार है-
1-मन मुकुन्द भारती , 2-नृसिंह भारती, 3-
पदम नाथ भारती , 4-बाल किषन भारती , लामा गुरू की 1 मढी इस परकार है-
पाहरी की छाप लामा गुरु की मढी चीन में है॥ कृपया इस विवरण को समाज के
व्यक्तियो तक पहुचाऎ ताकि सभी हमारे
समाज के बारे में जान सके॥
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अपने पास ही छुपी हुई खूबसूरती

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हम सारी दुनिया घूमते और खूबसूरती तलाशते रहते हैं .. कभी मुड़ के भी नहीं देखते .. अपने पास ही छुपी हुई खूबसूरती की और,दुनिया की सबसे अच्छी और खूबसूरत चीजें कभी देखी या छुई नहीं गई, वे बस दिल के साथ घुल – मिल गईं|वह सुन्दरता श्रीहरी के बीना कहीं मिली नही आशु को|....

कभी भी कुछ सुंदर देखने का मौका मत छोडो, सच तो यह है कि खूबसूरती भगवान की लिखावट है .. हर चेहरे पर, धुले-धुले आसमान में, हर फूल में उसकी लिखावट नज़र आएगी .. और हे भगवान, इस सौंदर्य के लिये हम आपके आभारी हैं| ....
जो सुंदरता आंखों द्वारा देखी जाती है , वह कुछ ही पल कि होती है , यह जरूरी भी नहीं कि हमारे भीतर से भी वही खूबसूरती दिखाई दे,खूबसूरती चेहरे पर नही होती| ये तो दिल की रोशनी है, बहुत ध्यान से देखनी पड‍़ती है|...

बिना श्रृंगार के मन मोहती है,वास्तविक सोन्दर्य ह्रदय की पवित्रता में है,सुन्दर वही हो सकता है जो कल्याणकारी हो,वह सुन्दरता श्रीहरी के बीना कहीं मिली नही ...प्यारे श्रीहरी ये दिल दीवाना तेरा हैं.... .......हरी ॐ भगवान् को प्रिय है हरिनाम .... 
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दीन हुये बिना दीनदयाल

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दीन हुये बिना दीनदयाल मिले भी तो कैसे ...??जब तक संसारकी आशा नहीं छूटेगी तब तक दीनावस्था नहीं आयेगी और दीन हुये बिना दीनदयाल भी प्राप्त नहीं होंगे ! दीन परमात्माके प्रति अनन्य होता है, और अपने अनन्य भक्तोंके लिये भगवान् को भी अनन्य होना पड़ता है ! भगवान् गीतामें अपने श्रीमुखसे गीतामें कहते है ! "ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्" भगवान् कहते हैं कि जो जिस प्रकारसे मुझे भजता है मैं भी उसी प्रकारसे उसे भजता हुँ ! ...श्रीराधेश्याम...हरि हर
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छोटे छोटे निर्णय

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श्रीहरि कहते हैं कभी कभी बहुत छोटे छोटे निर्णय ही

हमारे जीवन को हमेशा के लिए बदल देते हैं,

बहुधा वातावरण में परिवर्तन से कहीं अधिक

व्यक्ति के भीतर ही बदलाव की ज़रूरत होती है |..

श्रीहरि कहते हैं दुनिया बदलने की शुरुआत हमें

उस चेहरे से करनी चाहिए,

जो हमें आईने में नजर आता है,

बदलाव से पूरी मुक्ति मतलब

गलतियों से पूरी मुक्ति है, लेकिन यह तो

अकेली सर्वज्ञता का विशेषाधिकार है।...

श्रीहरि कहते हैं विचार से कर्म की उत्पत्ति होती है,

कर्म से आदत की उत्पत्ति होती है,

आदत से चरित्र की उत्पत्ति होती है

और चरित्र से आपके

प्रारब्ध की उत्पत्ति होती है. ...

श्रीहरि कहते हैं बुद्धिमान व्यक्तियों की प्रशंसा की जाती है,

धनवान व्यक्तियों से ईर्ष्या की जाती है,

बलशाली व्यक्तियों से डरा जाता है

लेकिन विश्वास केवल चरित्रवान

व्यक्तियों पर ही किया जाता है,

तुम बर्फ के समान विशुद्ध रहो

और हिम के समान स्थिर तो भी

लोक निन्दा से नहीं बच पाओगे ....
श्रीहरि कहते हैं अच्छी आदतों से शक्ति की बचत होती है,

अवगुण से बर्बादी,

चरित्र एक वृक्ष है, मान एक छाया।

हम हमेशा छाया की सोचते हैं,

लेकिन असलियत तो वृक्ष ही है।

बुद्धि के साथ सरलता, नम्रता तथा

विनय के योग से ही सच्चा चरित्र बनता है|.....
श्रीहरि कहते हैं सुन्दर आचरण, सुन्दर देह से अच्छा है,

जैसे आचरण की तुम दूसरों से अपेक्षा रखते हो,

वैसा ही आचरण तुम दूसरों के प्रति करो |

दूसरों को क्षति पंहुचाकर अपनी

भलाई कि आशा नहीं करनी चाहिए |

चरित्रवान व्यक्ति अपने पद और

शक्ति का अनुचित लाभ नहीं उठाते |

चरित्र आत्मसम्मान की नींव है |
अपने चारित्रिक सुधार का

आर्किटेक्ट खुद को बनना होगा |....

दूसरों के गुण देखता है,

वही महान व्यक्ति बन सकता है,

चरित्र की शुद्धि ही सारे ज्ञान का

ध्येय होनी चाहिए संयम और श्रम मानव के

दो सर्वोत्तम चिकित्सक हैं |

अच्छा स्वभाव, सोंदर्य के अभाव को पूरा कर देता है | ....
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दया और साहस

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श्रीहरि कहते हैं हम सभी ईश्वर से दया की प्रार्थना करते हैं

और वही प्रार्थना हमें दया करना भी सिखाती है,

दयालु चेहरा सदैव सुंदर होता है।

जो सचमुच दयालु है,

वही सचमुच बुद्धिमान है,

और जो दूसरों से प्रेम नहीं करता

उस पर ईश्वर की कृपा नहीं होती।

दया के छोटे-छोटे से कार्य,

प्रेम के जरा-जरा से शब्द

हमारी पृथ्वी को स्वर्गोपम बना देते हैं। ...

श्रीहरि कहते हैं दया मनुष्य का स्वाभाविक गुण है,

दया दोतरफी कृपा है।

इसकी कृपा दाता पर भी होती है और पात्र पर भी।

अपने प्रयोजन में दृढ़विश्वास रखने वाला

एक कृशकाय शरीर भी

इतिहास के रुख को बदल सकता है,

निराश हुए बिना पराजय को सह लेना,

पृथ्वी पर साहस की सबसे बड़ी मिसाल है |....
श्रीहरि कहते हैं मानव के सभी गुणों में साहस पहला गुण है,

क्योंकि यह सभी गुणों की जिम्मेदारी लेता है,

प्रेरणा कि हर अभिव्यक्ति में पुरुषार्थ

और पराक्रम कि आवश्यकता है,

हर परिस्थिति में शांत रहने वाला

निश्चित ही शिखर को छुता है|..
श्रीहरि कहते हैं सच्चा साहसी वह है,

जो बड़ी से बड़ी विपत्ति को बुद्धिमत्तापूर्वक

सह सकता है,साहस का अर्थ होता है

यह पता होना कि किस बात से डरना नहीं चाहिए|

वह सच्चा साहसी है, जो कभी निराश नहीं होता |..
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मन स्वच्छ और हल्का रहेगा

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बहुत पुरानी कथा है। एक बार एक गुरु ने अपने सभी शिष्यों से अनुरोध किया कि वे कल प्रवचन में आते समय अपने साथ एक थैली में बड़े-बड़े आलू साथ लेकर आएं। उन आलुओं पर उस व्यक्ति का नाम लिखा होना चाहिए, जिससे वे नफरत करते हैं। जो शिष्य जितने व्यक्तियों से घृणा करता है, वह उतने आलू लेकर आए।
अगले दिन सभी शिष्य आलू लेकर आए। किसी के पास चार आलू थे तो किसी के पास छह। गुरु ने कहा कि अगले सात दिनों तक ये आलू वे अपने साथ रखें। जहां भी जाएं, खाते-पीते, सोते-जागते, ये आलू सदैव साथ रहने चाहिए। शिष्यों को कुछ समझ में नहीं आया, लेकिन वे क्या करते, गुरु का आदेश था। दो-चार दिनों के बाद ही शिष्य आलुओं की बदबू से परेशान हो गए।
जैसे-तैसे उन्होंने सात दिन बिताए और गुरु के पास पहुंचे। सबने बताया कि वे उन सड़े आलुओं से परेशान हो गए हैं। गुरु ने कहा- यह सब मैंने आपको शिक्षा देने के लिए किया था। जब सात दिनों में आपको ये आलू बोझ लगने लगे, तब सोचिए कि आप जिन व्यक्तियों से नफरत करते हैं, उनका कितना बोझ आपके मन पर रहता होगा। यह नफरत आपके मन पर अनावश्यक बोझ डालती है, जिसके कारण आपके मन में भी बदबू भर जाती है, ठीक इन आलुओं की तरह। इसलिए अपने मन से गलत भावनाओं को निकाल दो, यदि किसी से प्यार नहीं कर सकते तो कम से कम नफरत तो मत करो। इससे आपका मन स्वच्छ और हल्का रहेगा। सभी शिष्यों ने वैसा ही किया।
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संत नामदेव

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संत नामदेव अपने शिष्यों के साथ रोज की तरह धर्म चर्चा में लीन थे। तभी एक जिज्ञासु उनसे प्रश्न कर बैठा-गुरुदेव, कहा जाता है कि ईश्वर हर जगह मौजूद है, तो उसे अनुभव कैसे किया जा सकता है? क्या आप उसकी प्राप्ति का कोई उपाय बता सकते हैं? नामदेव यह सुनकर मुस्कराए। फिर उन्होंने उसे एक लोटा पानी और थोड़ा सा नमक लाने को कहा। वहां उपस्थित शिष्यों की उत्सुकता बढ़ गई।

वे सोचने लगे, पता नहीं उनके गुरुदेव कौन सा प्रयोग करना चाहते हैं। नमक और पानी के आ जाने पर संत ने नमक को पानी में छोड़ देने को कहा। जब नमक पानी में घुल गया तो संत ने पूछा- बताओ, क्या तुम्हें इसमें नमक दिख रहा है? जिज्ञासु बोला- नहीं गुरुदेव, नमक तो इसमें पूरी तरह घुल-मिल गया है। संत ने उसे पानी चखने को कहा।

उसने चखकर कहा- जी, इसमें नमक उपस्थित है पर वह दिखाई नहीं दे रहा। अब संत ने उसे जल उबालने को कहा। पूरा जल जब भाप बन गया तो संत ने पूछा- क्या इसमें वह दिखता है? जिज्ञासु ने गौर से लोटे को देखा और कहा-हां, अब इसमें नमक दिख रहा है। तब संत ने समझाया-जिस तरह नमक पानी में होते हुए भी दिखता नहीं, उसी तरह ईश्वर भी हर जगह अनुभव किया जा सकता है मगर वह दिखता नहीं। और जिस तरह जल को गर्म करके तुमने नमक पा लिया उसी प्रकार तुम भी उचित तप और कर्म करके ईश्वर को प्राप्त कर सकते हो। वहां मौजूद लोग इस व्याख्या को सुनकर संत नामदेव के प्रति नतमस्तक हो गए।
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कृष्ण कथा सुनने से और कृष्ण नाम के कीर्तन से

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कृष्ण कथा सुनने से और कृष्ण नाम के कीर्तन से ही

भक्ति रूपी बीज दृढ़ स्थित होता है।

मेरा कान्हा मोहब्बतों के सौदे भी अजीब करता है.....

बस मुश्कराता है और दिल खरीद लेता है........

मस्त आशु की ओर से शुभ प्रभात.... ♥♥

भक्तियोग कुछ छोड़ने की सीख हमें नहीं देता

":वह केवल कहता है ,""""परमेश्वर में आसक्त हो जाओ """

और जो परमेश्वर के प्रेम में उन्मक्त हो गया है ,

उसकी स्वभावत नीच विषयों में कोई प्रवृति नहीं रह सकती

"प्रभो ,में तुम्हारे बारे में और कुछ नहीं जानता ,

केवल ईतना जानता हु की ,

तुम मेरे हो !तुम सुन्दर हो !आहा तुम अवर्निये हो !

तुम सौन्दर्य स्वरूप हो !"""♥'जय जय श्रीहरिः
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