'क्रोध को जीतो।'

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उन दिनों पांडव, द्रोणाचार्य से शिक्षा ले रहे थे। एक दिन उनका पाठ था, 'क्रोध को जीतो।' पाठ पढ़ाने के बाद द्रोणाचार्य ने अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव और युधिष्ठिर, सभी से पूछा, 'पाठ याद हो गया?' युधिष्ठिर को छोड़ सभी ने उत्तर दिया, 'याद हो गया।' लेकिन युधिष्ठिर ने कहा, 'याद नहीं हुआ।' द्रोणाचार्य ने विस्मय के साथ पूछा, 'क्या बात है, इतना सीधा-सादा पाठ तुम्हें याद नहीं हुआ? युधिष्ठिर का उत्तर था, 'नहीं हुआ।'

द्रोण ने कहा, 'ठीक है कल याद करके आना।' अगले दिन द्रोण ने पूछा, 'याद हो गया?' युधिष्ठिर का उत्तर था, 'नहीं हुआ।' द्रोण क्रोधित होकर बोले, 'तुम्हारे दिमाग में बुद्धि है या भूसा भरा है?' युधिष्ठिर ने बिना हिचकिचाहट के कहा, 'नहीं, मुझे पाठ याद नहीं हुआ।' द्रोण ने गरजते हुए कहा, 'तुमने दो दिन बर्बाद कर दिए। यदि तुम कल पाठ याद कर के नहीं आए तो तुम्हें दंडित होना पड़ेगा।'

तीसरे दिन भी युधिष्ठिर ने 'नहीं' उत्तर दिया। तब द्रोण ने युधिष्ठिर के गाल पर एक चांटा मारा। युधिष्ठिर कुछ देर चुपचाप खड़े रहे, फिर बोले, 'पाठ याद हो गया।' द्रोण बोले, 'मुझे पता नहीं था कि चांटा खाकर तुम्हें पाठ याद होगा अन्यथा पहले ही दिन तुम्हें चांटा खिला देता।' विनम्र स्वर में युधिष्ठिर ने कहा, 'गुरुदेव, ऐसी बात नहीं थी, मुझे अपने पर भरोसा नहीं था। आपने बड़े प्रेम से पाठ पढ़ाया तो मेरे मन ने कहा कोई प्यार से बात करे तो क्रोध का सवाल ही नहीं उठता। हो सकता है, तीखी भाषा में बोले तो क्रोध आ जाए।



अगले दिन जब आपने कहा कि मेरे दिमाग में बुद्धि है या भूसा, तब भी मुझे क्रोध नहीं आया। लेकिन मेरे मन ने कहा अभी एक और परीक्षा बाकी है, कोई बल प्रयोग करे तो क्रोध आ जाए। आज आपने जब चांटा मारा फिर भी मुझे क्रोध नहीं आया। तब मैं समझा कि मुझे पाठ याद हो गया।' द्रोण ने युधिष्ठिर को गले लगा लिया।
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शांति की तलाश

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कई लोग जीवनभर खूब मेहनत करते हैं, फिर जब मन भारी होता है वे तीर्थों, पहाड़ों या हील स्टेशनों का रास्ता पकड़ते हैं। शांति की तलाश में दुनिया घूम लेते हैं लेकिन एक जगह जाना भूल जाते हैं। खुद के भीतर। जिस शांति की तलाश में दुनिया भटक रही है, वह हमारे अपने भीतर ही है। बस जरूरत है उसे पहचानने की, उसकी ओर आगे बढऩे की, खुद के भीतर झांकने की। हम अपनी सारी ऊर्जा खत्म कर देते हैं, शांति की खोज में, जबकि शांति का सबसे सीधा और आसान तरीका है भीतर की ऊर्जा का रूप बदलना। जिन्हें शान्ति की खोज करना है उन्हें अपने भीतर की ऊर्जा को जानना होगा। 

हम ज्यादातर अपनी जीवन ऊर्जा का उपयोग कर ही नहीं पाते हैं। इसका सबसे अच्छा उपयोग है इसका रूपान्तरण करना। यह ऊर्जा अधिकांशत: मूलाधार चक्र पर पड़ी रहती है। इसे कल्पना के साथ सांस का प्रयोग करते हुए नीचे से ऊपर के चक्रों पर लाकर सहस्त्रार चक्र पर छोडऩा है। बिना किसी तनाव के इसको अपनी दिनचर्या में जोड़ लें और धैर्य के साथ करें। ऊर्जा जितने ऊपर के चक्रों पर है हम उतने ही पवित्र रहेंगे और हम जितने पवित्र हैं उतने ही शान्त होंगे।

इसीलिए शान्ति की खोज बाहर न करके भीतर ही की जाए।पहले तो ऊर्जा को ऊपर उठाइए तथा दूसरा इसके अपव्यय को रोकें। ऊर्जा को बेकार के खर्च होने से रोकने के लिए अच्छा तरीका है मंत्रजप करें। व्यर्थ होती ऊर्जा सार्थक हो जाएगी। जब आप ऊर्जा के रूपान्तरण में लगेंगे तो पहली बाधा बाहर से नहीं भीतर से ही आएगी और यह कार्य करेगा हमारा मन। इसलिए अपने मन पर हमेशा संदेह रखें। हम एक भूल और कर जाते हैं इस मन को हम अपना समझ लेते हैं, जबकि इसका निर्माण हमारे लिए दूसरों ने किया है। माता-पिता, मित्र, रिश्तेदार, शिक्षक आदि ने।

जो हमारा बीता समय है, उसने हमारे मन को बनाया है। ये अतीत की स्मृतियां हमारे वर्तमान को आहत करती हैं, इसी कारण हमारा मन या तो अतीत से बंधा है या भविष्य से जुड़ा रहेगा। मन वर्तमान से सम्बन्ध बनाने में परहेज रखता है। मन जितना वर्तमान से जुड़ेगा, उतने ही हम शान्त रहेंगे। इसी को जागरण कहा गया है। तो जाग्रत रहें और ऊर्जा को ऊपर उठाएं, फिर संसार की कोई परिस्थिति आपको अशान्त नहीं कर सकती। इन दोनों काम में जिससे आपको मदद मिल सकती है।
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मेरे कान्हा

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मेरे कान्हा अगर तुम न हो,
न जादू,न खुशी ,न ख्वाब,न ज़िन्दगी,
न मोहब्बत,न कोई नज़्म.......
बस मैं हूँ और मेरे सवाल कि –
जब कुछ नहीं तो मेरा होना भी
कोई भरम तो नहीं.........मस्त आशु

मेरे कान्हा तुम से शुरू और
तुम पे ही आकर रुकी है
मेरी हर नज़्म......
तुमसे जुदा कोई बात
नज़्म सी लगती नहीं ,
क्या करूँ !!........मस्त आशु

मेरे कान्हा मैं नही कहती हु
मोहन के तुम जरूर आना
पर इतना ध्यान रखना
के हम तेरे दरस प्यासे
कबसे कर रहे तेरा इंतज़ार हैं
जन्मो जन्मो से लगी
हैं मोहन तेरे दरस की आस".
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जरा सोच कर ये सोचो कि

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ईश्वर तो अपने अन्दर भी है और बाहर भी सर्वव्यापक है ।
अरे ढ़ूढ़ा तो उसे जाता है जो खो गया हो लेकिन भगवाग कोई खोया तो है नहीँ इस भगवान को बजाय खोजने के उसका अनुभव करने का प्रयत्न करना काफी उचित है ।और ये सही भी है ।

ॐ सोहं
ॐ तत् सत्
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आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान विभूति थे Acharya Chanakya was such a great personality

आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान विभूति थे, जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री के रूप में भी विश्वविख्‍यात हुए। 



इतनी सदियां गुजरने के बाद आज भी यदि चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत ‍और नीतियां प्रासंगिक हैं, तो मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्‍ययन, चिंतन और जीवानानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान को, पूरी तरह नि:स्वार्थ होकर मानवीय कल्याण के उद्‍देश्य से अभिव्यक्त किया।



* ब्राह्मणों का बल विद्या है, राजाओं का बल उनकी सेना है, वैश्यों का बल उनका धन है और शूद्रों का बल दूसरों की सेवा करना है। ब्राह्मणों का कर्तव्य है कि वे विद्या ग्रहण करें। राजा का कर्तव्य है कि वे सैनिकों द्वारा अपने बल को बढ़ाते रहें। वैश्यों का कर्तव्य है कि वे व्यापार द्वारा धन बढ़ाएं, शूद्रों का कर्तव्य श्रेष्ठ लोगों की सेवा करना है।
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निर्मोही अखाड़े का परिचय

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वैष्णव संतों के मूलत: तीन अखाड़े है- श्री दिगम्बर आनी अखाड़ा, श्री निर्वाणी आनी अखाड़ा और श्री निर्मोही आनी अखाड़ा। यहां प्रस्तुत है निर्मोही आनी अखाड़े का संक्षिप्त परिचय।

निर्मोही अखाड़े ( nirmohi akhara) की स्थापना 1720 में रामानंदाचार्य ने की थी। यह अखाड़ा भगवान राम के प्रति समर्पित है। इसीलिए अयोध्या आंदोलन से इस अखाड़े का नाम जुड़ा रहता है। कुम्भ मेले में इसकी भागीदारी बढ़-चढ़कर कर रहती है।

इस अखाड़े ने 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मस्जिद के नजदीक मंदिर बनाने का प्रयास किया, लेकिन अदालत ने उसे रोक दिया था। हिंदुओं की तरफ से रामलला ट्रस्ट और निर्मोही अखाड़ा ही कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे हैं।

निर्मोही अखाड़ा, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद द्वारा मान्यता प्राप्त 13 अखाड़ों में से एक है। इसका संबंध वैष्णव संप्रदाय से है और महंत भास्कर दास इसके अध्यक्ष हैं। इस अखाड़े से लगभग 12,000 साधु-संत जुड़े हुए हैं।
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हिंदू संतों के अखाड़ों की सूची

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मूलत: कुम्भ या अर्धकुम्भ में साधु-संतों के कुल तेरह अखाड़ों द्वारा भाग लिया जाता है। इन अखाड़ों की प्राचीन काल से ही स्नान पर्व की परंपरा चली आ रही है। इन अखाड़ों के नाम है : -

शिव संन्यासी संप्रदाय के 7 अखाड़े :
1. श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी- दारागंज प्रयाग (उत्तर प्रदेश)।
2. श्री पंच अटल अखाड़ा- चैक हनुमान, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)।
3. श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी- दारागंज, प्रयाग (उत्तर प्रदेश)।
4. श्री तपोनिधि आनंद अखाड़ा पंचायती- त्रम्केश्वर, नासिक (महाराष्ट्र)
5. श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा- बाबा हनुमान घाट, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)।
6. श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा- दशस्मेव घाट, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)।
7. श्री पंचदशनाम पंच अग्नि अखाड़ा- गिरीनगर, भवनाथ, जूनागढ़ (गुजरात)

बैरागी वैष्णव संप्रदाय के तीन अखाड़े :
8. श्री दिगम्बर अनी अखाड़ा- शामलाजी खाकचौक मंदिर, सांभर कांथा (गुजरात)।
9. श्री निर्वानी आनी अखाड़ा- हनुमान गादी, अयोध्या (उत्तर प्रदेश)।
10. श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़ा- धीर समीर मंदिर बंसीवट, वृंदावन, मथुरा (उत्तर प्रदेश)।

उदासीन संप्रदाय के तीन अखाड़े :
11. श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा- कृष्णनगर, कीटगंज, प्रयाग (उत्तर प्रदेश)।
12. श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन- कनखल, हरिद्वार (उत्तराखंड)।
13. श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा- कनखल, हरिद्वार (उत्तराखंड)।
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नागा बाबाओं की अद्‍भुत ‍दुनिया

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कुम्भ मेले में शैवपंथी नागा साधुओं को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती है। नागा साधुओं की रहस्यमय जीवन शैली और दर्शन को जानने के लिए विदेशी श्रद्धालु ज्यादा उत्सुक रहते हैं। कुम्भ के सबसे पवित्र शाही स्नान में सबसे पहले स्नान का अधिकार इन्हें ही मिलता है।

नागा साधुओं का रूप : नागा साधु अपने पूरे शरीर पर भभूत मले, निर्वस्त्र रहते हैं। उनकी बड़ी-बड़ी जटाएं भी आकर्षण का केंद्र रहती है। हाथों में चिलम लिए और चरस का कश लगते हुए इन साधुओं को देखना अजीब लगता है।


मस्तक पर आड़ा भभूत लगा तीनधारी तिलक लगा कर धूनी रमा कर, नग्न रह कर और गुफाओं में तप करने वाले नागा साधुओं का उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में भी मिलता है। यह साधु उग्र स्वभाव के होते हैं।

कैसे बनता है व्यक्ति नागा साधु : नागा जीवन की विलक्षण परंपरा में दीक्षित होने के लिए वैराग्य भाव का होना जरूरी है। संसार की मोह-माया से मुक्त कठोर दिल वाला व्यक्ति ही नागा साधु बन सकता है।

साधु बनने से पूर्व ही ऐसे व्यक्ति को अपने हाथों से ही अपना ही श्राद्ध और पिंड दान करना होता है। अखाड़े किसी को आसानी से नागा रूप में स्वीकार नहीं करते। बाकायदा इसकी कठोर परीक्षा ली जाती है जिसमें तप, ब्रह्मचर्य, वैराग्य, ध्यान, संन्यास और धर्म का अनुशासन तथा निष्ठा आदि प्रमुखता से परखे-देखे जाते हैं।

कठोर परीक्षा से गुजरने के बाद ही व्यक्ति संन्यासी जीवन की उच्चतम तथा अत्यंत विकट परंपरा में शामिल होकर गौरव प्राप्त करता है। इसके बाद इनका जीवन अखाड़ों, संत परंपराओं और समाज के लिए समर्पित हो जाता है।

क्यों शस्त्र धारण किया : शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए संन्यासी संघों का गठन किया था। बाहरी आक्रमण से बचने के लिए कालांतर में संन्यासियों के सबसे बड़े संघ जूना आखाड़े में संन्यासियों के एक वर्ग को विशेष रूप से शस्त्र-अस्त्र में पारंगत करके संस्थागत रूप प्रदान किया।

नागा इतिहास : वनवासी समाज के लोग अपनी रक्षा करने में समर्थ थे, और शस्त्र प्रवीण भी। इन्हीं शस्त्रधारी वनवासियों की जमात नागा साधुओं के रूप में सामने आई। ये नागा जैन और बौद्ध धर्म भी सनातन हिन्दू परम्परा से ही निकले थे। वन, अरण्य, नामधारी संन्यासी उड़ीसा के जगन्नाथपुरी स्थित गोवर्धन पीठ से संयुक्त हुए।

आज संतों के तेरह-चौदह अखाड़ों में सात संन्यासी अखाड़े (शैव) अपने-अपने नागा साधु बनाते हैं :- ये हैं जूना, महानिर्वणी, निरंजनी, अटल, अग्नि, आनंद और आवाहन अखाड़ा।
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कुंभ मेले के तीर्थयात्रियों के लिए उपयोगी टिप्स

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PTI
संसार के सबसे बड़े धार्मिक उत्सव में यदि आप जा रहे हैं तो आपके लिए कुछ जरूरी टिप्स और हिदायतें जिन पर अमल करके आप सुरक्षा और सुविधा में रहेंगे और तीर्थ लाभ ले सकेंगे।

1. धार्मिक वस्त्र ही पहनें : आप किसी भी विवाद से बचना चाहते हैं तो धार्मिक वस्त्र ही पहनें। जैसे महिलाएं पीले रंग की साड़ी और पुरुष सफेद-पीले रंग के वस्त्र। लड़कियां तन को पूर्ण रूप से ढंकने वाले वस्त्र ही पहनें। कुंभ मेला प्रशासन ने इस संबंध में हिदायत दे रखी है। यह आपकी और सभी की सुविधा के लिए है।

2. जरूरी सामान साथ में रखें : आप अपने साथ सफर के जरूरी सामान रखें, जैसे कंबल, दरी, तौलिया, तकिए के अलावा पानी की बोतल, नेपकीन, एक जोड़ी स्लीपर, ठंड और धूप से बचने के लिए शॉल-मफलर और जरूरी गोली-दवाइयां। ठंड और जल के प्रभाव से बचने के लिए क्रीम भी साथ रखें। इसके अलावा शहर, तीर्थ और स्नान की जानकारी के लिए जरूरी किताब भी साथ रखें, जो आपका मार्गदर्शन करती रहेगी।

3. स्नान संबंधी जानकारी : आम जनता के लिए गंगा में स्नान का वक्त नियुक्त रहता है। इसकी सूचना लगातार मेला प्रशासन द्वारा दी जाती है। सुबह साधुओं के स्नान के बाद ही आम जनता स्नान कर सकती है।

महिलाओं को स्नान करते वक्त वस्त्र संबंधी विशेष हिदायत दी जाती है। पुरुषों के लिए जरूरी है कि वे स्नान के महत्व को समझें, क्योंकि यह मौका उनके तैरने के आनंद के लिए नहीं होता है। महिला और पुरुषों के लिए अलग-अलग घाट या स्थान का इस्तेमाल किया जाता है, इस बात का ध्यान अवश्य रखें। स्नान करते वक्त नदी में वहीं तक जाएं, जहां तक की जाने की हिदायत दी गई है।

4. साफ-सफाई का रखें ध्यान : गंगा में नहाते वक्त गंगा की साफ-सफाई का विशेष ध्‍यान रखें। साबुन का प्रयोग न करें और नदी में कपड़े न धोएं। सुरक्षा घेरे के भीतर ही स्नान करें। पूजा सामग्री, फूलमालाएं, मूर्ति आदि गंगा में प्रवाहित न करें। कचरा-कूड़ा कूड़े दान में ही डालें। मेला क्षेत्र में कहीं भी पॉलीथिन का प्रयोग न करें और न ही कहीं गंदगी फैलाएं। कुंभ मेला क्षेत्र को साफ-सुथरा रखने में सहयोग करें।

5. साधुओं का करें सम्मान : अक्सर यह देखा गया है कि नागा साधुओं के शिविर के आसपास भीड़ ज्यादा रहती है। वहां लोग नागा साधुओं और उनकी गति‍विधियों के देखने के लिए जमा हो जाते हैं, लेकिन इससे नागा साधुओं को असुविधा होती है। साधु-संतों के शिविर या शिविर के आसपास अनावश्‍यक भीड़ न बढ़ाएं। यह हो सकता है कि कोई साधु आपकी हरकतों से भड़क जाए।
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5. पवित्रता का पालन करें : आप धार्मिक उत्सव में पुण्य कमाने जा रहे हैं तो मन, वचन और कर्म से पवित्र बने रहें। कुंभ मेला आपके मनोरंजन, हंसी-मजाक, पिकनिक पार्टी या घूमने-फिरने के लिए नहीं है। कृपया इसका विशेष ध्यान रखते हुए कुंभ की गंभीरता और गरिमा को समझें। कहीं भी अपशब्दों का इस्तेमाल न करें।

6. खान-पान संबंधी सलाह : अक्सर यह देखा गया है कि लोग, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, सड़क किनारे आदि जगहों पर अपने साथ लाया भोजन करने लग जाते हैं। इससे सभी को असुविधा तो होती ही है साथ ही गंदगी भी फैलती है। इसके लिए प्रशासन ने पांडाल बना रखे हैं। आप चाहे तो किसी होटल या रेस्टोरेंट में जाकर भी अपने साथ लाया भोजन कर सकते हैं।

बाजार, ठेले की खाद्य सामग्री से परहेज करें, क्योंकि वह दूषित हो सकता है। स्वच्छ पानी हमेशा साथ रखें या फिर किसी स्वच्छ स्थान से ही पानी पीएं। इससे आप प्रदूषित जल से होने वाली बीमारी से बच जाएंगे।

7. सुरक्षा हिदायत : लावारिस वस्तुओं के मिलने पर मेला प्रशासन अथवा पुलिस विभाग को सूचित करना आपका कर्तव्य है। किसी भी तरह की संदिग्ध गतिविधि को नजरअंदाज न करें। नाव में बैठते या नहाते वक्त सुरक्षा का ध्यान रखें। रात्रि को समयपूर्व ही अपने गंतव्य स्थान पहुंच जाएं। बिना वजह मेले में घूमते न रहें।

8. यातायात नियमों का पालन करें : यातायात नियमों का पालन करते हुए निर्धारित पार्किंग स्थलों पर ही अपने वाहनों को खड़ा करें। हर कहीं वाहन खड़ें करने से सभी को असुविधा होगी और इस तरह व्यवस्था भी बिगड़ेगी।

9. सभ्य नागरिक बनकर रहें : हर तरह के बड़े धार्मिक आयोजन में भगदड़ की आशंका, असामाजिक तत्वों की सक्रियता और गैर-धार्मिक लोगों की अनावश्यक गतिविधियों से तनाव की स्थिति उत्पन्न होती है।

एक सभ्य नागरिक की जिम्मेदारी रहती है कि वह नियमों का पालन करके उत्सव को शांतिपूर्ण बनाए और लोगों को भी इसके लिए हिदायत दें। जरूरत पड़ने पर लोगों की मदद करने से चूके नहीं। भूले-भटकों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने के लिए जरूरी हिदायत दें या मदद करें।
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10. दान करें सोच-समझकर : अक्सर ढोंगी किस्म के साधुओं के चक्कर में फंसकर व्यक्ति अपनी जेब ढीली कर देता है। किसी भी तरह के प्रलोभन से मुसीबत में फंसने से बचने के लिए इस तरह के पंडितों, साधुओं से दूर रहें। दूसरी ओर भिखारियों को बढ़ावा न दें।

11. बुरे कर्म से दूर रहें : मान्यता है कि यदि कुंभ तीर्थ करने वाला बैल, भैंसे पर आरूढ़ होकर गमन करता है तो वह नरकवासी बनता है। यदि कोई व्यक्ति किसी साधु-संत का अपमान करता है, उनकी खिल्ली उड़ाता है तो वह निम्नतर योनियों में जन्म लेता है।

किसी भी तरह से मांस, मदिरा आदि तामसिक भोजन का सेवन करके जो तीर्थ गमन करता है, वह अदृश्य साधु आत्माओं द्वारा शापित होता है। मासिक धर्म से ग्रसित युवती या अपवित्र कर्म करने वाला पुरुष तीर्थ स्नान न करें। ऐसा करने से और पाप लगता है। नदी में पेशाब करना महापाप माना गया है।

12. अच्छे कर्म के पास रहें : कुंभ तीर्थ कल्पवास, स्नान और सत्संग के लिए होता है। तीर्थ यात्रा, पर्यटन या मनोरंजन के लिए नहीं इसलिए तीर्थ में जप, तप और ध्यान का महत्व है। इसके अलावा अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति हेतु भी यह अवसर महत्वपूर्ण होता है इसलिए मुंडन कराने के बाद पिंडदान करें।

मन और तन को पवित्र करने के लिए प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में जागने के बाद स्नान करने के बाद सुबह और शाम को संध्यावंदन करें और अन्य समय में वैष्णव, शैव और उदासीन साधुओं के प्रवचन सुनें।

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इलाहाबाद कुंभ मेला, हिंदी बोलते रशियन साधु

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पायलट बाबा के शिष्य रशियन साधुओं से उनका असली नाम पूछो तो बताते नहीं है, लेकिन मुस्कुराकर कहते हैं कि नाम में क्या रखा है। इनके गुरू महायोगी पायलट बाबा ने इन्हें हिंदी नाम दे रखे हैं। कोई लक्ष्मण है तो कोई मीसा और कोई सत्यम या आत्मानंद। इनकी खड़ी हिंदी सुनकर कोई भी आश्चर्यचकित रह जाता है।

पायलट बाबा के रूस दौरे में ये उनके सम्पर्क में आए तो मन में वैराग्य जागा। अब तो इन्हें योग-ध्यान और समाधि के अलावा कुछ समझ में नहीं आता।

मूल रूप से रूस के रहने वाले रशियन साधु लक्ष्मण 2010 में अखाड़े से जुड़े थे। उनका कहना है कि कुंभ दुनिया में सबसे बड़ा आध्यात्मिक आयोजन है जिसमें बड़ी संख्या में साधु-संत आते हैं। उनसे सीखने को बहुत कुछ मिल सकता है।

एक दूसरे रूसी साधु आत्मानंद हरिद्वार में 2010 में हुए कुंभ में भी आए थे। उन्होंने कहा कि पायलट बाबा के दस हजार से ज्यादा विदेशी शिष्य हैं जिन्होंने उनसे योग-ध्यान और समाधि की शिक्षा ली है।

बाबा की लोकप्रियता विदेशों में काफी ज्यादा है। योग और ध्यान पर उनका गजब का नियंत्रण है। आत्मानंद ने ठान लिया है कि अब वह हमेशा बाबा के ही साथ रहेंगे। 
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