मेरे कान्हा

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मेरे कान्हा अगर तुम न हो,
न जादू,न खुशी ,न ख्वाब,न ज़िन्दगी,
न मोहब्बत,न कोई नज़्म.......
बस मैं हूँ और मेरे सवाल कि –
जब कुछ नहीं तो मेरा होना भी
कोई भरम तो नहीं.........मस्त आशु

मेरे कान्हा तुम से शुरू और
तुम पे ही आकर रुकी है
मेरी हर नज़्म......
तुमसे जुदा कोई बात
नज़्म सी लगती नहीं ,
क्या करूँ !!........मस्त आशु

मेरे कान्हा मैं नही कहती हु
मोहन के तुम जरूर आना
पर इतना ध्यान रखना
के हम तेरे दरस प्यासे
कबसे कर रहे तेरा इंतज़ार हैं
जन्मो जन्मो से लगी
हैं मोहन तेरे दरस की आस".
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