गुरु-शिष्य की कथा

श्रीगुरु चरित्र में एक गुरु-शिष्य की कथा है | एक शिष्य को काशी विशेश्वर के मंदिर के बाहर बैठे एक कुष्ट रोगी में शिव के दर्शन हुए और वह उनकी सेवा करने लगा | उनकी घाव में प्रेमसे लेप लगाता , पट्टी करता तब गुरु उन्हें लातसे मारते और कहते तुम्हें मेरे घाव से घृणा होती है, जब उनके लिए भिक्षा मांगकर लाता और सड़े गले भोजन मार्ग में ही ग्रहण कर गुरुके लिए अच्छा भोजन लाता तो गुरु लांछन लगाते कि भिक्षा में जो अच्छा -अच्छा चीज मिलता है वह मार्ग में चोरी चोरी खा लेते हो और मेरे लिए सडी गली चीज लाकर देते हो ! इस प्रकार शिष्य गुरु की सेवा सारे लांछन सहकर आनंदपूर्वक करता रहा और एक दिवस उन्हें वह सब कुछ मिल गया जो उस शिष्य को चाहिए था क्योंकि उनके कुष्ट रोगी गुरु और कोई नहीं साक्षात शिव ही थे |
सीख : जब शिष्य प्रेम से सेवा करे सद्गुरु उन्हें डांटे और लांछन लगाए और तब भी शिष्य सेवा करता रहता है तो उसे ही खरी गुरुसेवा कहते हैं और यह सब सद्गुरु शिष्य के मनोलय और अहं नष्ट करने के लिए करते हैं , जब कोई जीव पर मान-अपमान दोनों का प्रभाव नहीं पड़ता और उसकी सेवा में सातत्य बना रहता है तब शिष्य को सद्गुरु स्थितप्रज्ञता का वरदान दे देते हैं जिसे साध्य करने में योगियों को लाखों वर्ष लग जाते हैं वह सद्गुरुकी कुछ वर्षों की सेवा से प्राप्य हो जाता है तभी तो सद्गुरु को परब्रह्म की उपमा दी गयी है !
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