विचारों के अनुरूप ही मनुष्य की स्थिति और गति होती है। श्रेष्ठ विचार सौभाग्य का द्वार हैं, जबकि निकृष्ट विचार दुर्भाग्य का,आपको इस ब्लॉग पर प्रेरक कहानी,वीडियो, गीत,संगीत,शॉर्ट्स, गाना, भजन, प्रवचन, घरेलू उपचार इत्यादि मिलेगा । The state and movement of man depends on his thoughts. Good thoughts are the door to good fortune, while bad thoughts are the door to misfortune, you will find moral story, videos, songs, music, shorts, songs, bhajans, sermons, home remedies etc. in this blog.
मैं तो ब्रह्म हूं, मैं तो शिव हूं, अनादि, अनंत शिव हूं। जय गौरी शंकर।। जय महाकाल।।
दवा से ज्यादा अपनेपन से भरे मीठे बोल की जरूरत होती है
नवविवाहित जोड़ा किराए पर मकान देखने के लिए वर्मा जी के घर पहुँचा।
दोनों पति-पत्नी को देखकर वर्मा दंपत्ति खुश हो गए, सोचा—चलो, कुछ रौनक होगी, कितना सुंदर जोड़ा है, इन्हें मकान जरूर देंगे।
"आंटी, अंकल! हमें दो कमरे और एक किचन वाला मकान चाहिए, क्या हम देख सकते हैं?"
घुटनों के दर्द से जूझ रहीं सुनीता जी उठते हुए बोलीं, "हाँ बेटा, क्यों नहीं, देख लो!"
बाजू में एक छोटा पोर्शन किराए के लिए बनवाया था, जिससे आर्थिक सहायता भी हो जाएगी और सूने घर में रौनक भी आ जाएगी।
मकान सुमन और अजय को बहुत पसंद आया। "अंकल, हम कल ही शिफ्ट हो जाएंगे!"
अरुण जी मुस्कुराए, "बिल्कुल बेटा, स्वागत है!"
दूसरे दिन से घर में नई रौनक आ गई।
सारा दिन सामान जमाने के बाद जैसे ही सुमन और अजय थोड़ा आराम करने बैठे, दरवाजे की घंटी बज उठी।
दरवाजा खोला तो सामने अरुण जी खड़े थे। "बेटा, आंटी ने तुम्हें खाने के लिए बुलाया है।"
अजय झिझकते हुए बोला, "अरे, क्यों तकलीफ की आंटी ने? हम तो बाहर से ऑर्डर करने ही वाले थे!"
पोपले मुँह से हँसते हुए अरुण जी बोले, "आज तो थके हुए हो, खा लो, कल से अपने हिसाब से इंतज़ाम कर लेना!"
धीरे-धीरे सुमन और अजय का वर्मा दंपत्ति से एक अनजाना सा लगाव हो गया। जब उन्हें पता चला कि उनके दोनों बेटे विदेश में स्थायी रूप से बस चुके हैं, तो दोनों का मन भर आया।
रात में सुमन ने कहा, "अजय, सारी रात अंकल की खाँसी और कराहने की आवाज़ आ रही थी, देख आओ, कहीं तबियत ज्यादा खराब न हो!"
अजय बोला, "हाँ, मैं देखता हूँ, तुम नाश्ता बना लो, साथ ही अंकल-आंटी के साथ खा लेंगे!"
अजय ऊपर पहुँचा तो सुनीता जी बोलीं, "क्यों तकलीफ की बेटा? बुढ़ापे में तो ये सब लगा ही रहता है... कहीं हमारी वजह से तुम्हारी नींद तो नहीं खराब हुई?"
अजय मुस्कुराकर बोला, "अरे नहीं आंटी! मैं अभी अंकल को डॉक्टर के पास ले चलता हूँ, दवा से तबियत संभल जाएगी!"
सुनीता जी ने बेबसी से उसकी ओर देखा और हल्की आवाज़ में बोलीं, "बेटा, दवा से ज्यादा अपनेपन से भरे मीठे बोल की जरूरत होती है, बस यही कमी थी, जो तुम दोनों ने पूरी कर दी!"
यह कहते हुए उन्होंने अपने आँसू पोंछे, और अरुण जी की आँखें भी छलक पड़ीं...!
समय रहते शादी कर लेनी चाहिये
पति की ज़रूरत सिर्फ़ संभोग सुख प्राप्त करने के लिए ही है, लेकिन आज के समय में उसके लिए भी उपाय बाज़ार में उपलब्ध है "मैं शादी नहीं करना चाहती। मैं पढ़ी-लिखी हूँ, आत्मनिर्भर हूँ, और मुझे किसी पति की ज़रूरत नहीं है। लेकिन मेरे माता-पिता बार-बार कहते हैं कि मुझे शादी करनी चाहिए। मुझे क्या करना चाहिए?" मैंने मनोचिकत्स्क से ये सवाल पूछा

मनोचिकित्सक ने कहा, "तुम जीवन में बहुत कुछ करोगी। लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होगा कि चीजें तुम्हारी सोच के मुताबिक़ नहीं होंगी, या कुछ गलत हो जाएगा। कभी तुम असफल हो जाओगी, या तुम्हारी इच्छाएँ पूरी नहीं होंगी। ऐसे समय में तुम किसे दोष दोगी? क्या तुम खुद को दोषी ठहराओगी?"
महिला ने कहा, "नहीं, कभी नहीं!"
मनोचिकित्सक ने हंसते हुए कहा, "इसीलिए तुम्हें एक पति की ज़रूरत है, ताकि जब भी तुम्हारा मन खराब हो, तुम उस पर सारा दोष डाल सको और खुद को अच्छा महसूस कर सको।"
इस मज़ेदार बातचीत में एक गंभीर बात छिपी है कि पति का जीवन में क्या महत्व होता है। पति और परिवार से जीवन पूरा होता है। शादी के बाद मातृत्व का आनंद मिलता है और परिवार बढ़ता है। बच्चों के साथ अगली पीढ़ी का निर्माण होता है, जो एक पारिवारिक और सामाजिक प्रक्रिया है।
जवानी में तुम्हारे शरीर की चाहत में बहुत से लोग तुम्हारे नख़रे उठा लेंगे, सेवा भी करेंगे लेकिन तब क्या जब तुम 50 साल की हो जाओगी और तुम्हारे आस पास कोई नहीं होगा, ऐसे समय में पति की ज़रूरत पड़ती है,
समय के साथ, सुंदरता और जवानी कम हो जाती है। उस समय तुम्हारा साथ देने वाला तुम्हारा पति और परिवार ही होता है। पति तुम्हारी रक्षा करता है और तुम्हें जीवन में हर सुविधा देता है। माता-पिता के बाद, पति और बच्चे ही वे रिश्ते होते हैं जिन पर तुम पूरी तरह से भरोसा कर सकती हो, इस उम्मीद के साथ की बुढ़ापे में तुम्हारा अपना कोई होगा,
असल में, पति सिर्फ दोष देने के लिए नहीं होता, बल्कि जीवनभर का साथी होता है, जो हमेशा तुम्हारा साथ देता है और तुम्हारी सुरक्षा और देखभाल करता है।
मुझे गहराई से बात समझ में आयी और कुछ समय बाद शादी की,
आप को किसी से प्यार हो या ना हो, लेकिन जब एक ही कमरे में किसी विपरीत लिंग के साथ आप एक बिस्तर पर सोते हैं, एक साथ खाना खाते है और एक घर में रहते हैं, तो आप को उससे प्रेम भी हो जाटा है
और ऐसे पुरुष के साथ संभोग का आनंद दसगुना हो जाता है,क्यों की आप को पता है कि ये वही इंसान है जिसके ऊपर आप कोई भी दोष डाल सकती है, और वो आप को छोड़ के कही नहीं जाएगा, पति पत्नी का रिश्ता ऐसा ही होता है
मेरी मित्रमंडली में कई ऐसी लड़किया थी, जिन्हें मेरी तरह शादी नहीं करनी थी, ऊपर से तो वो खुश और स्वतंत्र लगती है, लेकिन अंदर से उतनी ही दुखी
इस लिये समय रहते शादी कर लेनी चाहिये
मानवता और राष्ट्र रक्षा: प्रेरणादायक कहानी II BEST MOTIVATIONAL STORY IN HINDI
तेरा देश धर्म और मानवता है पस्त-पस्त
तू खुद को समझ रहा है बहुत मस्त-मस्त,
तेरा देश धर्म और मानवता है पस्त-पस्त।
गौ हत्या के दंश से धरा रो रही है,
संस्कारों की जड़ें अब बिखरती दिख रही हैं।
धर्म स्थलों पर अतिक्रमण की मार है,
आस्था के मंदिरों पर शैतानों का भार है।
तू खुद को समझ रहा है बहुत मस्त-मस्त,
तेरा देश धर्म और मानवता है पस्त-पस्त।
धर्म परिवर्तन के जाल में फंसाए लोग हैं,
लालच और छल से विरोधी छिनाए लोग हैं।
गुरुकुल और शिक्षा के अधिकार छीने गए,
संस्कृति के दीपक हर ओर बुझाए गए।
तू खुद को समझ रहा है बहुत मस्त-मस्त,
तेरा देश धर्म और मानवता है पस्त-पस्त।
जनसंख्या बढ़ी, पर संसाधन घट गए,
भविष्य के विरोधी कहीं खो से गए।
शासन और प्रशासन बस खुद में मग्न है,
जनता की पुकार से उन्हें कोई डर नहीं है।
तू खुद को समझ रहा है बहुत मस्त-मस्त,
तेरा देश धर्म और मानवता है पस्त-पस्त।
बॉलीवुड से आई फुहड़ता की बाढ़ है,
संस्कारों के स्थान पर अपराधों का स्वाद है।
कानूनी अधिकारों का दुरुपयोग हर जगह,
नारी-पुरुष दोनों लड़ रहे अपने ही स्वार्थ पर।
तू खुद को समझ रहा है बहुत मस्त-मस्त,
तेरा देश धर्म और मानवता है पस्त-पस्त।
स्वयंभू और कुबेर बनने की है चाहत,
राजनीति के खेल में हो रही मानवता आहत।
आतंकी बनाने की शिक्षा का जोर है,
संस्कृति की जड़ों पर वार हर ओर है।
तू खुद को समझ रहा है बहुत मस्त-मस्त,
तेरा देश धर्म और मानवता है पस्त-पस्त।
आरक्षण ने योग्य लोगों को दबाया है,
अयोग्यता ने देश का विकास को रुकवाया है,
आओ उठाएं, फिर से मशाल जलाएं,
धर्म और संस्कृति को वापस अपनाएं।
तू खुद को समझ मत बहुत मस्त-मस्त,
देश धर्म और मानवता को चाहिए कट्टर भक्त।
धर्म और मानवता के प्रहरी - Dharm aur maanavata ke praharee
गीत: धर्म और मानवता के प्रहरी
(शानदार धुन पर भक्तिमय और प्रेरणादायक सुर)
अंतरा 1:
जो देश, धर्म की राह चलें,
त्याग की मूरत बन जाएं।
मानवता की रक्षा को,
अपना जीवन अर्पण कर जाएं।
गांधी, भगत, आजाद जैसे,
जिनका नाम अमर हो जाता।
इतिहास में गूंजे गाथाएं,
जग हर युग में नमन कर जाता।
सुर:
जो जियें धर्म की खातिर,
वो जीवन सफल कहलाता।
मानवता के दीप जलाएं,
वो हर दिल में बस जाता।
कोरस:
जय जयकार करो, उन रक्षकों की,
जो सत्य, धर्म की शान हैं।
देश, धर्म और मानवता के,
वो अमर गाथा महान हैं।
अंतरा 2:
पुष्पेंद्र की हुंकार सुनो,
जो धर्म का सिंहनाद करें।
बागेश्वर बाबा की वाणी में,
जो सत्य की मशाल भरें।
देवकीनंदन का ज्ञान देखो,
जो जग को राह दिखाते।
अश्विनी, मोदी, योगी जैसे,
न्याय की ज्योति जलाते।
सुर:
हर युग में रक्षक आते हैं,
जो सत्य का संदेश देते।
उनके पदचिन्हों पर चलके,
हम सब भी प्रेरणा लेते।
कोरस:
जय जयकार करो, उन रक्षकों की,
जो सत्य, धर्म की शान हैं।
देश, धर्म और मानवता के,
वो अमर गाथा महान हैं।
अंतरा 3:
अशोक सिंघल, जिनकी वाणी,
राम के नाम का जयगान करे।
लालकृष्ण की सच्ची आभा,
धर्म को नई पहचान करे।
कल्याण सिंह की दृढ़ता देखो,
जिनसे राम का मार्ग बने।
बाला साहेब की हुंकार सुनो,
जिनसे हर भक्त का हृदय तने।
सुर:
धर्म की रक्षा, सत्य का संग,
हर युग में गूंजे इनका राग।
मानवता के सच्चे प्रहरी,
जग को दें शाश्वत संदेश।
अंतरा 4:
अमिताभ अग्निहोत्री का प्रण,
सत्य की मशाल जलाए।
जो मानवता के हर दुश्मन को,
धर्म के पथ पर झुकाए।
हरिशंकर और विष्णु शंकर,
जिनकी कलम का बल भारी।
न्याय और धर्म की राह पर,
उनकी वाणी सच्ची, प्यारी।
सुर:
ऐसे नायक, ऐसे वीर,
जिनका हर युग जयगान करे।
हम सब उनकी राह चलें,
मानवता का दीप जलाएं।
कोरस:
जय जयकार करो, उन वीरों की,
जिनसे धर्म का मान बढ़े।
देश, धर्म और मानवता के,
वो अमर गाथा अमिट लिखे।
(भव्य संगीत के साथ समापन)
जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा, और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट आएगा
एक औरत अपने परिवार के लिए रोज़ खाना बनाती थी और एक रोटी किसी भूखे के लिए अलग से पकाती थी। वह रोटी खिड़की पर रख देती थी, ताकि कोई भी ज़रूरतमंद उसे ले सके।
हर दिन एक कुबड़ा व्यक्ति आता, रोटी उठाता और बिना धन्यवाद कहे, जाते-जाते एक ही बात दोहराता, "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा, और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट आएगा।"
वह औरत उसकी आदत से तंग आ गई। उसने सोचा, "यह व्यक्ति धन्यवाद तक नहीं देता, ऊपर से यही बात बार-बार बड़बड़ाता है।" धीरे-धीरे गुस्सा बढ़ने लगा और उसने निर्णय लिया कि अब इस व्यक्ति से पीछा छुड़ाना होगा।
एक दिन उसने रोटी में ज़हर मिला दिया और उसे खिड़की पर रखने के लिए बढ़ी। लेकिन जैसे ही वह रोटी रखने वाली थी, उसके हाथ कांपने लगे। अचानक उसने खुद से कहा, "मैं यह क्या कर रही हूं? अगर किसी निर्दोष को कुछ हो गया तो?" उसने तुरंत रोटी को चूल्हे में जला दिया और एक नई रोटी बनाकर खिड़की पर रख दी।
हर रोज़ की तरह कुबड़ा आया, रोटी ली और फिर वही बात दोहराता हुआ चला गया, "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा, और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट आएगा।"
उस औरत की रोज़ भगवान से प्रार्थना होती थी कि उसका बेटा, जो अपने भविष्य के लिए दूर गया हुआ था, सलामत रहे और जल्दी घर लौटे। महीनों से उसका कोई संदेश नहीं आया था।
उसी शाम, दरवाजे पर दस्तक हुई। दरवाजा खोलते ही वह स्तब्ध रह गई। उसका बेटा, पतला-दुबला, फटे हुए कपड़ों में, सामने खड़ा था। उसकी आंखों में भूख और थकान साफ झलक रही थी।
बेटे ने कहा, "माँ, यह चमत्कार है कि मैं यहां तक पहुंचा। आज मैं इतना भूखा था कि गिर पड़ा। मुझे लगा कि अब मेरा अंत आ गया। तभी एक कुबड़ा वहां से गुज़रा। उसने मुझे देखा और मुझ पर दया आई। उसने अपनी रोटी मुझे दे दी। उसने कहा, 'मैं यह रोज़ खाता हूं, लेकिन आज इसकी तुम्हें ज़्यादा ज़रूरत है।'"
यह सुनकर माँ का चेहरा पीला पड़ गया। उसने दरवाजे का सहारा लिया। उसके ज़हन में सुबह की घटना घूम गई, जब उसने रोटी में ज़हर मिला दिया था। अगर वह रोटी आग में नष्ट नहीं की होती, तो उसका बेटा उस रोटी को खाकर मर गया होता।
उसे अब कुबड़े के शब्दों का असली मतलब समझ आ गया था, "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा, और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट आएगा।"
शिक्षा:
हमेशा अच्छा करो और दूसरों की भलाई करने से कभी पीछे मत हटो। आपकी अच्छाई किसी को बचा सकती है, भले ही उसकी प्रशंसा उस समय न मिले।
सच्चे रिश्तों का सम्मान
सफल गृहस्थ जिंदगी जी रही प्रिया की जिंदगी में पति आकाश के अलावा करण क्या आया, उसकी पूरी जिंदगी में तूफान आ गया। इसकी कीमत प्रिया ने क्या खोकर चुकाई।
"मम्मा, आज मैं अपनी नई वाली बोतल में पानी ले जाऊंगी," नन्ही अनिका चहकते हुए बोली।
"ओके," कहते हुए प्रिया ने उसे स्कूल के लिए तैयार किया।
"प्रिया, पार्लर की लिस्ट मैं विकास को दे आया हूं। 11-12 बजे तक सामान पहुंचा देगा। तुम चेक कर लेना," आकाश ने नाश्ता करते हुए कहा।
"ठीक है, आप चिंता न करें," प्रिया ने कहा।
आकाश और अनिका के चले जाने के बाद प्रिया आरामकुर्सी पर निढाल हो गई। तभी अचानक किसी ने ज़ोर से दरवाजा खटखटाया। दरवाजा खोलते ही सामने पड़ोसन सीमा हांफती हुई दिखाई दी।
"क्या हुआ? कहां से भागती-दौड़ती चली आ रही हो?" प्रिया ने पूछा।
"यार, बुरी खबर है। करण की पत्नी ने आत्महत्या कर ली," सीमा ने हांफते हुए कहा।
"क्या?" प्रिया स्तब्ध रह गई।
"हां, सुना है कि वह प्रेग्नेंट भी थी।"
सीमा के जाने के बाद प्रिया के मन में सवालों का सैलाब उमड़ पड़ा। करण की पत्नी पूजा, जिसे वह एक बार आयोजन में मिली थी, ने अपनी दुखभरी आंखों से उससे कहा था, "दीदी, काश हम भी आपकी तरह खुशहाल होते।"
प्रिया का मन अतीत की गलियों में भटकने लगा।
कुछ साल पहले, जब प्रिया ने आकाश के साथ नई कॉलोनी में घर लिया था, तो पड़ोस में रहने वाला करण अक्सर उससे टकरा जाता।
"भाभी, ये रंग आप पर बहुत जंच रहा है," सब्जी खरीदते समय करण ने पहली बार प्रिया से कहा।
करण धीरे-धीरे प्रिया की मदद करने के बहाने उसके करीब आने लगा। प्रिया भी उसके आकर्षण और मीठी बातों के जाल में फंसती चली गई।
एक दिन, जब आकाश किसी काम से शहर से बाहर थे, प्रिया और करण ने अपनी सीमाएं पार कर दीं।
लेकिन इसके बाद का हर पल प्रिया के लिए अपराधबोध और पछतावे का बन गया।
करण से दूरी बनाने की कोशिश के बावजूद, वह बार-बार प्रिया के जीवन में लौट आता। आखिरकार, एक दिन प्रिया ने आकाश और अपनी बेटी के लिए करण का साथ छोड़ने का निर्णय लिया।
आज, जब प्रिया को पता चला कि करण की पत्नी ने आत्महत्या कर ली है, तो वह सोचने लगी कि अगर उसने भी करण के साथ अपना जीवन चुना होता, तो शायद उसकी हालत भी पूजा जैसी ही होती।
पुनःस्थापना:
आकाश के साथ समय बिताने और उसकी अटूट समझ ने प्रिया को अपने गुनाहों से उबरने का हौसला दिया।
दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चे रिश्तों का सम्मान करना चाहिए। जीवन में मोह और क्षणिक आकर्षण से बचकर सही निर्णय लेना ही सच्चा समझदारी है।
वह फरिश्ता मेरी जिंदगी से दूर चला गया
बचपन से मुझे यही सिखाया गया था कि लड़के गंदे होते हैं और उनसे बस काम की बातें करनी चाहिए। इस बात ने मेरे दिमाग में गहरी छाप छोड़ी थी। इसी साल मेरा ग्रेजुएशन पूरा हुआ था, और मेरे घरवाले मेरी शादी के लिए लड़का ढूंढ रहे थे। उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जिले में रहते हुए, लड़कियों की शादी ग्रेजुएशन के बाद जल्दी कर दी जाती है। मेरे माता-पिता और भाई मेरे लिए रिश्ते देख रहे थे।
एक दिन मेरे भाई को फेसबुक पर अभिषेक नाम के लड़के का प्रोफाइल दिखा। अभिषेक पढ़े-लिखे और दिखने में बेहद अच्छे थे, उनका अपना व्यवसाय भी था। उनके घर से संदेश आया कि उन्हें दहेज नहीं चाहिए, बस लड़की अच्छी हो। यह बात हमारे परिवार को बेहद पसंद आई क्योंकि हमारी आर्थिक स्थिति साधारण थी।
अभिषेक ने शादी से पहले मुझसे बात करने की इच्छा जताई। मेरे भाई ने मेरा नंबर उन्हें दे दिया। अभिषेक का पहला फोन आया तो मैं घबरा गई। उनसे बात करना मेरे लिए एक अलग अनुभव था। पहले दिन बातचीत में मैं सहज नहीं थी, लेकिन धीरे-धीरे उनकी बातें मुझे अच्छी लगने लगीं।
अभिषेक मुझसे पूछते, "आगे क्या करना चाहती हो?" उनके सवाल मुझे सोचने पर मजबूर कर देते। उन्होंने जीवन के हर पहलू पर इतनी जानकारी और समझ दिखाई कि मैं प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी।
जल्द ही हमारे घरवाले अभिषेक के परिवार से मिलने गए। सब कुछ सही लग रहा था। मेरे पापा और भाई ने अभिषेक और उनके परिवार की खूब तारीफ की। लेकिन अचानक अभिषेक के घर से यह संदेश आया कि वे शादी के लिए कुछ समय लेना चाहते हैं। मेरे परिवार को यह सुनकर झटका लगा।
मैंने अभिषेक को फोन किया और पूछा, "आपके घरवालों ने मना क्यों किया?" अभिषेक ने कहा, "नेहा, तुमसे बात करके मुझे लगता है कि तुम्हें पहले अपने करियर और जीवन को समझने का समय देना चाहिए। शादी जरूरी है, लेकिन उससे पहले तुम्हें अपनी पढ़ाई और आत्मनिर्भरता पर ध्यान देना चाहिए।"
उनकी बातें मुझे गहराई तक छू गईं। उन्होंने अपनी बहन का उदाहरण दिया, जिसने शादी के बाद पढ़ाई में रुकावटें झेलीं। उन्होंने मुझसे कहा, "तुम्हारे जैसा टैलेंटेड इंसान अपनी जिंदगी के सपने पूरे कर सकता है, अगर सही दिशा में आगे बढ़े।"
मैंने उनके कहे शब्दों को गंभीरता से लिया और एमसीए में दाखिला लिया। कॉलेज में मुझे पहली बार सोशल स्किल्स, लोगों से मिलने-जुलने और उनकी बातों को समझने का मौका मिला। तीन साल की मेहनत के बाद मेरी प्लेसमेंट एक बड़ी कंपनी में हो गई।
आज, चार साल बाद, मैं अपने पैरों पर खड़ी हूं। अभिषेक अब कहां हैं, क्या कर रहे हैं, मुझे नहीं पता। लेकिन उनकी बातों ने मेरी जिंदगी बदल दी। उनकी सूझबूझ और समर्थन ने मुझे वह बना दिया जो आज मैं हूं।
कभी-कभी सोचती हूं कि भगवान ने उन्हें मेरी जिंदगी में एक मकसद के लिए भेजा था। वह मकसद पूरा हुआ और वह फरिश्ता मेरी जिंदगी से दूर चला गया।
अगर आज अभिषेक मुझसे मिलते, तो मैं उन्हें गले लगाकर शुक्रिया कहती। उनकी बातें मेरी जिंदगी के सबसे बड़े सबक के रूप में हमेशा मेरे साथ रहेंगी।
आपको यह कहानी कैसी लगी, जरूर बताएं।
प्रेम और मर्यादा
एक दिन मैंने अपनी पत्नी से पूछा - "क्या तुम्हें बुरा नहीं लगता कि मैं बार-बार तुम्हें कुछ भी कह देता हूँ, और डाँट भी देता हूँ, फिर भी तुम पति भक्ति में लगी रहती हो, जबकि मैं कभी पत्नी भक्ति का प्रयास नहीं करता?"
मैंने वेदों का अध्ययन किया है और भारतीय संस्कृति में गहरी रुचि रखता हूँ, जबकि मेरी पत्नी विज्ञान की विद्यार्थी रही है। फिर भी, उसकी आध्यात्मिक शक्ति मुझसे कई गुना अधिक है, क्योंकि मैं केवल पढ़ता हूँ और वह उसका पालन करती है।
मेरे प्रश्न पर उसने मुस्कुराते हुए पानी का गिलास पकड़ा और बोली - "एक पुत्र यदि माता की भक्ति करे तो उसे मातृ भक्त कहते हैं, परन्तु माता चाहे कितनी भी सेवा करे, उसे पुत्र भक्त नहीं कहा जा सकता।"
मैं सोच रहा था, आज भी यह मुझे निरुत्तर करेगी। मैंने पूछा, "जीवन के प्रारंभ में पुरुष और स्त्री समान थे, फिर पुरुष बड़ा कैसे हो गया, जबकि स्त्री शक्ति का प्रतीक है?"
वह हँसते हुए बोली - "आपको थोड़ा विज्ञान भी पढ़ना चाहिए। दुनिया दो चीज़ों से बनी है - ऊर्जा और पदार्थ। पुरुष ऊर्जा का प्रतीक है और स्त्री पदार्थ का। जब पदार्थ को विकसित होना होता है, तो वह ऊर्जा का आधान करता है। इसी प्रकार, जब स्त्री पुरुष का आधान करती है, तो शक्ति स्वरूप हो जाती है। यही कारण है कि स्त्री प्रथम पूज्या बनती है।"
मैंने चुपचाप पूछा, "तो तुम मेरी भी पूज्य हो गईं, क्योंकि तुम ऊर्जा और पदार्थ दोनों की स्वामिनी हो।"
उसने झेंपते हुए कहा, "आप भी पढ़े-लिखे मूर्ख जैसे बात करते हैं। आपकी ऊर्जा से मैंने शक्ति पाई, तो क्या उस शक्ति का उपयोग आप पर करूँ? यह कृतघ्नता होगी।"
मैंने कहा, "मैं तो तुम पर शक्ति का प्रयोग करता हूँ, फिर तुम क्यों नहीं?"
उसका उत्तर सुनकर मेरी आँखें भर आईं। उसने कहा, "जिसके साथ मात्र संसर्ग से मैं जीवन उत्पन्न करने की शक्ति पा गई, उसे मैं कैसे विद्रोह करूँ? यदि शक्ति प्रयोग करना होगा तो मुझे क्या आवश्यकता... मैं माता सीता की भाँति लव-कुश तैयार कर लूँगी, जो आपसे मेरा हिसाब कर लेंगे।"
सभी मातृ शक्तियों को सहस्त्रों नमन, जिन्होंने सृष्टि को प्रेम और मर्यादा में बाँध रखा है। 🙏
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