विचारों के अनुरूप ही मनुष्य की स्थिति और गति होती है। श्रेष्ठ विचार सौभाग्य का द्वार हैं, जबकि निकृष्ट विचार दुर्भाग्य का,आपको इस ब्लॉग पर प्रेरक कहानी,वीडियो, गीत,संगीत,शॉर्ट्स, गाना, भजन, प्रवचन, घरेलू उपचार इत्यादि मिलेगा । The state and movement of man depends on his thoughts. Good thoughts are the door to good fortune, while bad thoughts are the door to misfortune, you will find moral story, videos, songs, music, shorts, songs, bhajans, sermons, home remedies etc. in this blog.
*****अयोध्या*******
बाबर ने मुस्लिम धर्म के प्रसार के लिए मंदिर को मस्जिद बनाने का आदेश दे दिया ! मंदिर तोड़ दिया गया ! उसी के अवशेषों से तथा हिन्दुओं के रक्त से सने हुए गारे से मस्जिद का निर्माण प्रारंभ हुआ !
जब मस्जिद की दीवार १ फुट उचाई तक पहुचते पहुचते *दैवीय शक्ति * के कारण अनेको बार गिरी, तब कज़ल अब्बास कलंदर ने पुजारी श्यामानंद को प्रताड़ित कर, तरह तरह की यातनायें देकर दीवार बनाए जाने की पद्दति मालूम की ! तब पुजारी श्यामानंद जी ने जो जानकारियां दी थी वो इस प्रकार है -
1 . मस्जिद के मुख्य प्रवेश द्वार के ऊपर चन्दन की सिल्ली पर लिखवाए.. *'सीता पाक है'* ! यह चन्दन की सिल्ली वर्तमान में भी है !
उपर्युक्त राज़ जानने के बाद कज़ल अब्बास कलंदर ने पुजारी श्यामानंद महाराज की गर्दन कलम करवा दी और अनेको परिवर्तन कराने के पश्चात् मस्जिद बनवाने में सफल हो सकां !
जब मस्जिद की दीवार १ फुट उचाई तक पहुचते पहुचते *दैवीय शक्ति * के कारण अनेको बार गिरी, तब कज़ल अब्बास कलंदर ने पुजारी श्यामानंद को प्रताड़ित कर, तरह तरह की यातनायें देकर दीवार बनाए जाने की पद्दति मालूम की ! तब पुजारी श्यामानंद जी ने जो जानकारियां दी थी वो इस प्रकार है -
1 . मस्जिद के मुख्य प्रवेश द्वार के ऊपर चन्दन की सिल्ली पर लिखवाए.. *'सीता पाक है'* ! यह चन्दन की सिल्ली वर्तमान में भी है !
2 . मस्जिद के बगल में बजू करने के लिए *कुआं* न बनाया जाए ! (दुनिया की सभी प्रमुख मस्जिदों के बगल में हों..जरुरी है )
3 . मंदिर की *परिक्रमा* प्रणाली मस्जिद में भी जारी की जाए !
4 . मस्जिद का गुम्बद मंदिरों की तरह बनाया जाए !
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क्या है .....धर्म , योग और ज्ञान ?
मानव-जीवन में सफलता की पहली-सीढी है.."धर्म-तत्व" का यथार्थ-ज्ञान..!
जिस "धर्म" को आज इस भौतिक-जगत में जान-समुदाय ने अपना रखा है..वह सांसारिक-धर्म है..इसलिए इससे जीवन का यथार्थ-लक्ष्य प्रतिबिंबित नहीं होता.!!
जिस "धर्म-तत्व" को महान-पुरुषो ने स्वयं जाना और जान कर उसको अपने जीवन में अपनाया और उसका प्रचार-प्रसार जन-समुदाय को भी अपनाने के लिए प्रेरित किया..वही धर्म-तत्व का ज्ञान आज हर मानव को जानना ...और प्राप्त करना चाहिए..!
"धर्म" वह है..जो बांधता नहीं..अपितु मुक्त करता है..!
"योग" वह है..जो "धर्म" को जीवन से जोड़ता है..!
"ज्ञान" वह है..जो जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कर देता है..!
यही वेदों का सार-तत्व है..!
***धर्म ते विरति..योग ते ज्ञाना..ज्ञान मोक्ष पद वेद बखाना..!!
जिस "धर्म" को आज इस भौतिक-जगत में जान-समुदाय ने अपना रखा है..वह सांसारिक-धर्म है..इसलिए इससे जीवन का यथार्थ-लक्ष्य प्रतिबिंबित नहीं होता.!!
जिस "धर्म-तत्व" को महान-पुरुषो ने स्वयं जाना और जान कर उसको अपने जीवन में अपनाया और उसका प्रचार-प्रसार जन-समुदाय को भी अपनाने के लिए प्रेरित किया..वही धर्म-तत्व का ज्ञान आज हर मानव को जानना ...और प्राप्त करना चाहिए..!
"धर्म" वह है..जो बांधता नहीं..अपितु मुक्त करता है..!
"योग" वह है..जो "धर्म" को जीवन से जोड़ता है..!
"ज्ञान" वह है..जो जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कर देता है..!
यही वेदों का सार-तत्व है..!
***धर्म ते विरति..योग ते ज्ञाना..ज्ञान मोक्ष पद वेद बखाना..!!
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जीव का चरम लक्ष्य...!
विश्व का प्रत्येक जीव बिना किसी प्रयोजन के कोई कार्य नहीं करता, यह एक अनुभवशिद्ध सिद्धांत है ! दर्शनशास्त्र कहता है, 'प्रयोजनमनुद्दीश्य मंदोंपि न प्रवर्तते' अर्थात घोर से घोर मुर्ख भी बिना प्रयोजन के कोई कार्य नहीं करता ! अतएव प्रत्येकक कार्य का अलग अलग प्रयोजन भी स्वाभाविक होना चाहिए, किन्तु ऐसा नहीं है ! कार्य अनंत होते हुए भी प्रयोजन एक ही है ! सुनने में ये बात विचित्र सी है किन्तु विचार करने पर साधारण एवं स्वाभाविक है !
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इश्वर दर्शन कैसे हो ....
जैसे अत्यंत पिपासा से व्याकुल होकर मनुष्य जल की बूंद के लिए छटपटाता है और एक छण की देर भी सहन नहीं कर सकता वैसी दस जब भगवान् के दर्शन के लिए भक्त की हो जाती है तब भगवान् को भी एक छण का विलम्ब असत्य हो जाता है और वे अपने सारे ऐश्वर्य वैभव को भुलाकर उस नगण्य मानव के सामने प्रगट हो कर उसे कृतार्थ करते है ......!
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श्रीमद भागवद कथा रूपी जड़ी बूटी
हम लोग दत्तचित्त होकर जब भगवत कथा में बैठते है, श्रवण करते है तो कलि यहाँ प्रवेश नहीं कर सकता ! जैसे राजा परिक्छित ने कलि का निग्रह किया है, यह कथा कलि का निग्रह करती है १ लेकिन जब तक भगवान् की अनुग्रह न हो तब तक कथा में प्रवेश नहीं होता !
जीवन है सर्प और नेवले के बीच का युद्ध : सुना है की जब सर्प और नेवले के बीच युद्ध होता है और जब सर्प नेवले को काट लेता है, जहर फैलने लगता है तब वह भागता है, और एक जड़ी बूटी होती है, उसको सूंघ लेता है, तो उसका ज़हर उतर जाता है ! उस जड़ी बूटी में ऐसा गुण है ! फिर आ जाता है वह सर्प के साथ युद्ध करने, उसे मोका मिलता है तो सर्प को नोचता है, इस प्रकार युद्ध करता हुआ नेवला अंततः सर्प पर विजय प्राप्त कर लेता है, ठीक उसी प्रकार संसार यह है वह सर्प है और हमारा युद्ध चल रहा है संसार सर्प के साथ ! संशय, संसार, काम और काल को सर्प कहा है -
" काम भुजंग डसत जब जाहीं !
विषय नीम कटु लागत नाहीं !!"
जब शुकदेव जी महाराज की वंदना करते है सूत जी भागवत के अंत में तो कहते है -
"योगिन्द्राय नमतस्मऐ शुके ब्रम्हरुपिणऐ !
संसारसर्पदस्तंग यो विष्णुरातममुमूचते !!"
तो जब जब यह काम, काल सर्प, संशय सर्प, संसार सर्प, हमें डसता है हममें और जीवन में ज़हर फ़ैल जाता है तब तब उस बुद्धिमान नेवले की भांति हमें भी चाहिए की हम जड़ी बूटी को सूंघ लें ताकि ज़हर उतर जाए, और उस जड़ी बूटी का नाम है "श्रीमद भागवत " !
जीवन है सर्प और नेवले के बीच का युद्ध : सुना है की जब सर्प और नेवले के बीच युद्ध होता है और जब सर्प नेवले को काट लेता है, जहर फैलने लगता है तब वह भागता है, और एक जड़ी बूटी होती है, उसको सूंघ लेता है, तो उसका ज़हर उतर जाता है ! उस जड़ी बूटी में ऐसा गुण है ! फिर आ जाता है वह सर्प के साथ युद्ध करने, उसे मोका मिलता है तो सर्प को नोचता है, इस प्रकार युद्ध करता हुआ नेवला अंततः सर्प पर विजय प्राप्त कर लेता है, ठीक उसी प्रकार संसार यह है वह सर्प है और हमारा युद्ध चल रहा है संसार सर्प के साथ ! संशय, संसार, काम और काल को सर्प कहा है -
" काम भुजंग डसत जब जाहीं !
विषय नीम कटु लागत नाहीं !!"
जब शुकदेव जी महाराज की वंदना करते है सूत जी भागवत के अंत में तो कहते है -
"योगिन्द्राय नमतस्मऐ शुके ब्रम्हरुपिणऐ !
संसारसर्पदस्तंग यो विष्णुरातममुमूचते !!"
तो जब जब यह काम, काल सर्प, संशय सर्प, संसार सर्प, हमें डसता है हममें और जीवन में ज़हर फ़ैल जाता है तब तब उस बुद्धिमान नेवले की भांति हमें भी चाहिए की हम जड़ी बूटी को सूंघ लें ताकि ज़हर उतर जाए, और उस जड़ी बूटी का नाम है "श्रीमद भागवत " !
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दुःख कैसे दूर करें .......!
भोगो की प्राप्ति से दुखो का नाश नहीं होता, न भोगो के नाश में ही वस्तुत्व दुःख है ! दुःख के कारण तो हमारे मन के मनोरथ है एक भी भोग न रहे अति अवश्यक चीजो का भी अभाव हो परन्तु मन यदि अभाव का अनुभव न करके सदा संतुष्ट रहे, उसमे मनोरथ न उठे तो कोई भी दुःख नहीं रहेगा! इसी प्रकार भोगो की प्रचुर प्राप्ति होने पर भी जब तक किसी वस्तु के अभाव का अनुभव होता है और उसको प्राप्त करने की कामना रहती है, तब तक दुःख नहीं मिट सकते! हमारी आशाए हमें सदैव दुःख दिलाती है यदि व्यक्ति को ऐसा लगता है की हमारे दुःख के कारण इनमे से कुछ भी नहीं है तो उसे ये मानना चाहिए की ये हमारे पूर्व जन्म के प्राब्ध है! दुःख सहने की छमता यदि कम हो जाए या फिर जीवन दुखो से घबरा जाए तो उसे भगवान् श्री राम और भगवान् श्री कृष्ण के चरित्र का अनुकरण करना चाहिए!
क्योंकि..... इस पृथ्वी पर भगवान राम और कृष्ण ने जो दुःख सहे है वो अकल्पनीय है और जो प्राचीन काल से ही जो लोग दुखो को सह गए आज भी पूजा उन्ही की होती है! बिना दुःख सहे कोई पूजनीय और बड़ा नहीं हो सकता, बिना दुःख सहे किसी के दुःख को नहीं समझ सकता! और श्रीमद भागवत में तो कुन्तीं ने बांके बिहारी से यहाँ तक कह दिया की प्रभु मुझे मेरे वरदान में मुझे दुःख ही दे दो, क्योकि जब-जब हम पे विपदा आई तब-तब आपके दर्शन हुए, सो हमारे लिए तो विपत्ति ही सच्ची संपत्ति है, जिस विपत्ति में सदैव आपके स्मरण हो उस विपत्ति से बड़ी और कोई संपत्ति हो ही नहीं सकती!
क्योंकि..... इस पृथ्वी पर भगवान राम और कृष्ण ने जो दुःख सहे है वो अकल्पनीय है और जो प्राचीन काल से ही जो लोग दुखो को सह गए आज भी पूजा उन्ही की होती है! बिना दुःख सहे कोई पूजनीय और बड़ा नहीं हो सकता, बिना दुःख सहे किसी के दुःख को नहीं समझ सकता! और श्रीमद भागवत में तो कुन्तीं ने बांके बिहारी से यहाँ तक कह दिया की प्रभु मुझे मेरे वरदान में मुझे दुःख ही दे दो, क्योकि जब-जब हम पे विपदा आई तब-तब आपके दर्शन हुए, सो हमारे लिए तो विपत्ति ही सच्ची संपत्ति है, जिस विपत्ति में सदैव आपके स्मरण हो उस विपत्ति से बड़ी और कोई संपत्ति हो ही नहीं सकती!
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...तो मृत्यु भी मधुर हो जाए ! How to Live & How to Die ?
कैसे जियें और कैसे मरें ?
कुछ लोग कहते है की ज़िन्दगी परछाई के सिवा कुछ नहीं है ! इन लोगो को अपने जीवन में निराशा, अंधकार और केवल मृत्यु के स्वप्न आते है ! दुनियादारी के बोझ तले दबे लोगो की यह प्रतिक्रिया है ! कुछ लोग कहते है की जीवन एक कला है ! ऐसे लोग प्रत्येक स्थिति में खुश रहना चाहते है ! ज़िन्दगी पतझड़ नहीं बसंत है ! ग़र जीने का सही ढंग जान गए तो अंत तक जीवन में बसंत ही रहेगी ! उसके लिए जीवन खिलते पुष्प सा होगा, पंछी की चहक सा होगा, झरने की तरह प्रसन्न होगा, संतो का जीवन ऐसा ही होता है १ देखिये सुखदेव जी भी कहते है-
कृष्ण ही कला है और कला ही कृष्ण है ! कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन कलकल बहता झरना है ! कृष्ण के स्मरण मात्र से ह्रदय मधुरता से भर जाता है !
कुछ लोग कहते है की ज़िन्दगी परछाई के सिवा कुछ नहीं है ! इन लोगो को अपने जीवन में निराशा, अंधकार और केवल मृत्यु के स्वप्न आते है ! दुनियादारी के बोझ तले दबे लोगो की यह प्रतिक्रिया है ! कुछ लोग कहते है की जीवन एक कला है ! ऐसे लोग प्रत्येक स्थिति में खुश रहना चाहते है ! ज़िन्दगी पतझड़ नहीं बसंत है ! ग़र जीने का सही ढंग जान गए तो अंत तक जीवन में बसंत ही रहेगी ! उसके लिए जीवन खिलते पुष्प सा होगा, पंछी की चहक सा होगा, झरने की तरह प्रसन्न होगा, संतो का जीवन ऐसा ही होता है १ देखिये सुखदेव जी भी कहते है-
कृष्ण ही कला है और कला ही कृष्ण है ! कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन कलकल बहता झरना है ! कृष्ण के स्मरण मात्र से ह्रदय मधुरता से भर जाता है !
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कामना एवं प्रेम :
कामना 'प्रेम' का विरोधी तत्व है ! लेने-देने का नाम व्यापार है! जिसमे सब कुछ देने पर भी तृप्ति न हो, वही प्रेम है ! संसार में कोई व्यक्ति किसी से इसलिए प्रेम नहीं कर सकता क्योकि प्रत्येक जीव स्वार्थी है ! वह आनंद चाहता है, अस्तु लेने की भावना रखता है! जब दोनों पछ लेने-देने की घात में है तो मैत्री कितने छण चलेगी ? तभी तो स्त्री-पति, बाप-बेटे में दिन में दस बार टक्कर हो जाती है ! जहाँ दोनों लेने-देने के चक्कर में है, वहा टक्कर होना स्वाभाविक ही है और जहाँ टक्कर हुई, वहीं वह नाटकीय स्वार्थजन्य प्रेम समाप्त हो जाता है! वास्तव में कामयुक्त प्रेम प्रतिछण घटमान होता है ! कामना अन्धकार स्वरुप है, प्रेम प्रकाश स्वरुप है!
एक घातक को देखिये, वह कितना निष्काम प्रेम करता है ! वह बारह मास अपने प्रियतम से प्यार करता है, जब की हम लोग कोई सांसारिक आपत्ति आई तब मंदिरों या महात्माओ के पास दौड़ते है ! एवं जैसे ही सांसारिक कामना पूर्ति हो गई फिर कभी जाने का नाम भी नहीं लेते! यदि कोई पूछता की तुम आजकल मंदिरों या सत्संग में नहीं जाते तो कह देता की मुझे तो अपने अन्दर ही सब कुछ मिल जाता, दिखावा करने से क्या लाभ, इत्यादि ! सच तो यह है की वह सांसारिक कामनाओ का उपासक है, उसने इश्वर-तत्व को समझा ही नहीं है ! अतएव, चातक से हमें शिछा लेनी चाहिए ! जैसे वह बारह मास उपासना करता हुआ भी स्वाति में ही जल पीता है, उसी प्रकार हम भी प्रेमास्पद कि इच्छा रखें एवं निरंतर प्रेम करें-
जाचे बारह मास पिए पपीहा स्वाति जल !
एक बात और है कि हम लोग संसार में जो प्रेम करते है, चूँकि उसमे स्वार्थ निहित रहता है अतएव स्वार्थ-हानि होते ही प्रेम तो समाप्त हो ही जाता है, साथ ही शत्रुता भी उत्पन्न हो जाती है, किन्तु चातक ऐसा प्रेम नहीं करता !
पवि पाहन दामिनि गरजि, झरि झकोर खरी खिझी !
रोष न प्रियतम दोष लखि, तुलसी रागही रीझी !!
अर्थात चातक का प्रेमास्पद यह परीछा लेने के लिए (कि यह मुझसे कुछ स्वार्थ रखता है या नहीं ) गरजता है यानि डांटता है, अपमानित करता है, चमकता है यानि चिढाता है, ओले गिराता है, बिजली गिराता है परन्तु पपीहा इन दुर्व्यवहारों को नहीं देखता, इन व्यवहारों से उसे क्रोध नहीं आता, अपितु और अधिक प्रसन्नता होती है ! इससे हमें शिछा लेनी चाहिए कि यदि सांसारि आपत्ति आवे तो हम प्रसन्न हो, अशांत या क्रुद्ध न हो ! इतना ही नहीं एक पपीहा भूखा-प्यासा, हारा-थका उड़ते-उड़ते एक पेड़ पर बैठ गया ज्योही उसे होश आया कि उस वृछ के निचे बाण साधे बैठे ब्याध ने बाण मार दिया ! वह वृछ गंगा जी के तट पर था अतएव वह चातक बाण से बिंधा हुआ गंगा जी ही में जा गिरा ! गिरते समय उसने सोचा, 'चलो यह भी अच्छा हुआ ; पुरे जीवन प्रेम निभाया एवं मरते समय गंगा जी का जल मुख में जाएगा जिससे मुक्ति हो जाएगी', ऐसा सोच ही रहा था कि पुनः उसकी अंतरात्मा ने उसे धिक्कारा कि यदि तू गंगाजल पी लेगा एवं मुक्त हो जाएगा तो प्रेम के उज्जवल वस्त्र पर कलंक लग जाएगा ! बस, फिर क्या था, उस चातक ने अपनी चोंच ऊपर उठा ली और उसी झटके में उसके प्राण-पखेरू उड़ गए उसने मरते-मरते भी प्रेम को निष्कलंक ही रखा ! इसी आशय से तुलसीदास जी ने लिखा कि-
बध्यो बधिक पर्यो पुन्य जल , उलटी उठाई चोंच !
तुलसी चातक प्रेम-पट , मरतहूँ लगी न खोंच !!
इसी से आप समझ गए होंगे और इसी से आपको भी शिछा लेनी है ! अस्तु, मुक्ति के चक्कर में पड़कर प्रेम-रस को नहीं खोना है, क्योंकि-
भक्ति करत सोई मुक्ति गुसाई ! अनइच्छित आवत वारी आई !!
भक्ति करने पर मुक्ति तो स्वमेव हो ही जाएगी ! जब भक्ति करने पर मुक्ति स्वंय ही हो जाएगी तो भक्ति-रस से क्यों वंचित रह जाय ? क्योंकि मुक्ति होने पर भक्ति-रस पाना असंभव है किन्तु भक्ति पाने पर मुक्ति सहज सिद्ध है !
वास्तव में प्रेम में अपने प्रियतम के गुण भी देखना चाहिए ! वह भी कामना है ! यही कारण है कि संसार में हम जिस भी गुण के कारण प्रेम करते है उस गुण के समाप्त होते ही प्रेम भी नष्ट हो जाता है ! यथा, किसी ने सौन्दर्य से प्रेम किया तो सुन्दरता नष्ट होने पर प्रेम समाप्त हो जाएगा; किसी ने धन से प्रेम किया तो धन समाप्त होते ही प्रेम समाप्त हो जाएगा!
अर्थात अपने सुख कि इच्छा ही कामना है, वह अन्धकार स्वरुप है एवं प्रेमास्पद के सुख कि कामना होना ही प्रेम है, वह प्रकास स्वरुप है!!!
एक घातक को देखिये, वह कितना निष्काम प्रेम करता है ! वह बारह मास अपने प्रियतम से प्यार करता है, जब की हम लोग कोई सांसारिक आपत्ति आई तब मंदिरों या महात्माओ के पास दौड़ते है ! एवं जैसे ही सांसारिक कामना पूर्ति हो गई फिर कभी जाने का नाम भी नहीं लेते! यदि कोई पूछता की तुम आजकल मंदिरों या सत्संग में नहीं जाते तो कह देता की मुझे तो अपने अन्दर ही सब कुछ मिल जाता, दिखावा करने से क्या लाभ, इत्यादि ! सच तो यह है की वह सांसारिक कामनाओ का उपासक है, उसने इश्वर-तत्व को समझा ही नहीं है ! अतएव, चातक से हमें शिछा लेनी चाहिए ! जैसे वह बारह मास उपासना करता हुआ भी स्वाति में ही जल पीता है, उसी प्रकार हम भी प्रेमास्पद कि इच्छा रखें एवं निरंतर प्रेम करें-
जाचे बारह मास पिए पपीहा स्वाति जल !
एक बात और है कि हम लोग संसार में जो प्रेम करते है, चूँकि उसमे स्वार्थ निहित रहता है अतएव स्वार्थ-हानि होते ही प्रेम तो समाप्त हो ही जाता है, साथ ही शत्रुता भी उत्पन्न हो जाती है, किन्तु चातक ऐसा प्रेम नहीं करता !
पवि पाहन दामिनि गरजि, झरि झकोर खरी खिझी !
रोष न प्रियतम दोष लखि, तुलसी रागही रीझी !!
अर्थात चातक का प्रेमास्पद यह परीछा लेने के लिए (कि यह मुझसे कुछ स्वार्थ रखता है या नहीं ) गरजता है यानि डांटता है, अपमानित करता है, चमकता है यानि चिढाता है, ओले गिराता है, बिजली गिराता है परन्तु पपीहा इन दुर्व्यवहारों को नहीं देखता, इन व्यवहारों से उसे क्रोध नहीं आता, अपितु और अधिक प्रसन्नता होती है ! इससे हमें शिछा लेनी चाहिए कि यदि सांसारि आपत्ति आवे तो हम प्रसन्न हो, अशांत या क्रुद्ध न हो ! इतना ही नहीं एक पपीहा भूखा-प्यासा, हारा-थका उड़ते-उड़ते एक पेड़ पर बैठ गया ज्योही उसे होश आया कि उस वृछ के निचे बाण साधे बैठे ब्याध ने बाण मार दिया ! वह वृछ गंगा जी के तट पर था अतएव वह चातक बाण से बिंधा हुआ गंगा जी ही में जा गिरा ! गिरते समय उसने सोचा, 'चलो यह भी अच्छा हुआ ; पुरे जीवन प्रेम निभाया एवं मरते समय गंगा जी का जल मुख में जाएगा जिससे मुक्ति हो जाएगी', ऐसा सोच ही रहा था कि पुनः उसकी अंतरात्मा ने उसे धिक्कारा कि यदि तू गंगाजल पी लेगा एवं मुक्त हो जाएगा तो प्रेम के उज्जवल वस्त्र पर कलंक लग जाएगा ! बस, फिर क्या था, उस चातक ने अपनी चोंच ऊपर उठा ली और उसी झटके में उसके प्राण-पखेरू उड़ गए उसने मरते-मरते भी प्रेम को निष्कलंक ही रखा ! इसी आशय से तुलसीदास जी ने लिखा कि-
बध्यो बधिक पर्यो पुन्य जल , उलटी उठाई चोंच !
तुलसी चातक प्रेम-पट , मरतहूँ लगी न खोंच !!
इसी से आप समझ गए होंगे और इसी से आपको भी शिछा लेनी है ! अस्तु, मुक्ति के चक्कर में पड़कर प्रेम-रस को नहीं खोना है, क्योंकि-
भक्ति करत सोई मुक्ति गुसाई ! अनइच्छित आवत वारी आई !!
भक्ति करने पर मुक्ति तो स्वमेव हो ही जाएगी ! जब भक्ति करने पर मुक्ति स्वंय ही हो जाएगी तो भक्ति-रस से क्यों वंचित रह जाय ? क्योंकि मुक्ति होने पर भक्ति-रस पाना असंभव है किन्तु भक्ति पाने पर मुक्ति सहज सिद्ध है !
वास्तव में प्रेम में अपने प्रियतम के गुण भी देखना चाहिए ! वह भी कामना है ! यही कारण है कि संसार में हम जिस भी गुण के कारण प्रेम करते है उस गुण के समाप्त होते ही प्रेम भी नष्ट हो जाता है ! यथा, किसी ने सौन्दर्य से प्रेम किया तो सुन्दरता नष्ट होने पर प्रेम समाप्त हो जाएगा; किसी ने धन से प्रेम किया तो धन समाप्त होते ही प्रेम समाप्त हो जाएगा!
अर्थात अपने सुख कि इच्छा ही कामना है, वह अन्धकार स्वरुप है एवं प्रेमास्पद के सुख कि कामना होना ही प्रेम है, वह प्रकास स्वरुप है!!!
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व्यक्ति जन्म से ही ढूंढता है ............. आनंद !
व्यक्ति जन्म से ही ढूंढता है ............. आनंद !
मनुष्य जन्म से ही अपने वास्तविक आनंद की खोज करने लगता है
1. बाल्यावस्था में उसे लगता है की माँ के दुध में और पिता के प्रेम में ही सच्चा आनंद है!
2. किशोरावस्था में उसे लगता है की मित्रों और खिलौने में ही सच्चा आनंद है!
3. युवावस्था में उसे लगता है की पत्नी,.बच्चे और अर्थ की प्राप्ति में ही सच्चा आनंद है !
4 . प्रौढ़ावस्था में उसे लगता है की मान-सम्मान, यश-कीर्ति में ही सच्चा आनंद है !
5 . वृद्धावस्था में उसे लगता है की पुत्र-पौत्र में ही सच्चा आनंद है!
मृत्यु के समय उसे जब अपने किये हुए पापो की याद करके भयंकर वेदना होती है तब उसे महसूस होता है की सच्चा आनंद इश्वर में है .... लेकिन तब तक वो इश्वर का दिया हुआ अनमोल मानव जीवन व्यर्थ कर चूका होता है
वास्तविकता यही है की जीव का परम लक्ष्य आनंद की प्राप्ति है और सच्चा आनंद, आनंद स्वरुप परमात्मा में है अर्थात..... मानव देह पाकर यदि इश्वर को नहीं जाना तो पुनः चौरासी लाख योनियों में चक्कर लगाना होगा....अतएव मानव देह का महत्त्व समझ कर इश्वर को समझना है .......जिससे है अपने परम चरम लक्ष्य आनंदघनस्वरुप अविनाशी परमानन्द परब्रम्ह को प्राप्त कर सकें
1. बाल्यावस्था में उसे लगता है की माँ के दुध में और पिता के प्रेम में ही सच्चा आनंद है!
2. किशोरावस्था में उसे लगता है की मित्रों और खिलौने में ही सच्चा आनंद है!
3. युवावस्था में उसे लगता है की पत्नी,.बच्चे और अर्थ की प्राप्ति में ही सच्चा आनंद है !
4 . प्रौढ़ावस्था में उसे लगता है की मान-सम्मान, यश-कीर्ति में ही सच्चा आनंद है !
5 . वृद्धावस्था में उसे लगता है की पुत्र-पौत्र में ही सच्चा आनंद है!
मृत्यु के समय उसे जब अपने किये हुए पापो की याद करके भयंकर वेदना होती है तब उसे महसूस होता है की सच्चा आनंद इश्वर में है .... लेकिन तब तक वो इश्वर का दिया हुआ अनमोल मानव जीवन व्यर्थ कर चूका होता है
वास्तविकता यही है की जीव का परम लक्ष्य आनंद की प्राप्ति है और सच्चा आनंद, आनंद स्वरुप परमात्मा में है अर्थात..... मानव देह पाकर यदि इश्वर को नहीं जाना तो पुनः चौरासी लाख योनियों में चक्कर लगाना होगा....अतएव मानव देह का महत्त्व समझ कर इश्वर को समझना है .......जिससे है अपने परम चरम लक्ष्य आनंदघनस्वरुप अविनाशी परमानन्द परब्रम्ह को प्राप्त कर सकें
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