Ekta ka Tasan, Yuva Dilon ki Awaaz

 जाति ना देख,

धर्म ना पूछ।

भारत है माँ,

सब उसकी संतान।




जाति छोड़,

मजहब छोड़,

देश से,

नाता जोड़!


हाथ में हाथ,

एक साथ बात।

प्यार ही धर्म,

भारत ही कर्म।



कौन क्या था?

पूछ मत आज।

दिल है साफ़,

देश है पास।


रंग मत देख,

दिल को चेक।

सबका खून,

लाल ही एक।



मंदिर हो या,

मस्जिद कहो बस।

गुरुद्वारा हो,

या चर्च खास।


ईश्वर एक,

नाम अनेक।

भारत माँ,

सबका टेक।



बांटो मत अब,

जोड़ो हर जन।

भारत बोले,

"हम सब एक।"



जाति छोड़,

मजहब छोड़,

देश से,

नाता जोड़!


रग-रग बोले,

"वन्दे मातरम्!"

एकता बोले,

"जय हिन्द वतन!"



नाम नहीं मायने,

कर्म ही पहचान।

देश पुकारे,

आओ अब जानो।


“भारत माता की जय” 

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जिसके दिल में दर्द न हो, वो तो बस बेरहम है

 जिसके दिल में दर्द न हो, वो तो बस बेरहम है,

जो किसी का ग़म समझे, बस वही इंसान है,

बाकी तो सब चेहरों पे नक़ाब पहने फिरते हैं,

मुस्कान की आड़ में, खंजर लिए चलते हैं,



सड़क पे कोई तड़पता है, तो हँसी आती है,

कोई मजबूर काम करने आता, इनको गाली आता है,

जिनके पास रहम नहीं है, वो सबसे ज़्यादा बेरहम हैं,

जो जीवों का भी दर्द समझे, वो ही तो आज इंसान है,


गोश्त के टुकड़ों में अब जानवर नहीं दिखते,

बस "डिश" के नाम पे, लाशों को बिकते देखते,

क्या पेट भरने को ज़रूरी है जान लेना,

या ज़िंदा रहना अब मतलब, बेरहम हैवान होना है,



जिसके दिल में दर्द न हो, वो तो बस बेरहम है,

जो किसी का ग़म समझे, बस वही इंसान है,

किसी की चीख़ पे भी जो चुप रह जाए,

वो चाहे ज़िंदा हो… मगर दिल से मरा इंसान है,



जंगल से आया शिकार कम था क्या,

अब तो आदमी ही आदमी को निगल रहा है,

खून की गंध में आदत बस गई है,

रहम, दया, मोहब्बत – ये बातें किताबों में सिमट गई हैं,


मासूम जानवर, जो बोले भी नहीं सकते,

उनकी हत्या पे जश्न? ये कैसा इंसान बन बैठे,

कितनी भूख है तुम्हें, जो मासूमों की जान भी कम पड़ती है,

सच कहो… क्या अब भी आत्मा तुम्हारी कभी तड़पती है,


(हुक दोहराव)

जिसके दिल में दर्द न हो, वो तो बस बेरहम है,

जो किसी का ग़म समझे, बस वही इंसान है,

जिसे देखकर दूसरों का दर्द जाग जाए,

ऐसा चेहरा अब इस भीड़ में कहाँ पाए,



भले ही मंदिर बनाओ, या मस्जिद सजाओ,

जब दिल पत्थर का हो, तो किस खुदा को पुकारो,

धर्म का मतलब है – दया सब पे बराबर,

ना की पूजा के नाम पे निर्दोष की क़ुर्बानी हर घर,


आदमी अब नंबर बन गया है, नाम नहीं,

हर रिश्ता अब सौदे का सामान बन गया है,

लेकिन आज भी कोई हो, जो आँसू देख के रुक जाए,

तो यक़ीन करो, वो अब भी इंसान कहलाए,



जिसके दिल में दर्द न हो, वो तो बस बेरहम है,

जो किसी का ग़म समझे, बस वही इंसान है,

जब तक ये दुनिया ऐसे दिलवालों से भरी रहे,

तब तक उम्मीद ज़िंदा है, तिनके से भी भारी रहे,

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ये बलिदान की धरती है, ये हिन्दुस्तान की धरती है

 मंगल पांडे ने पहला शंखनाद किया,  

फाँसी पे चढ़कर विद्रोह का बिगुल बजा दिया।  

तात्या टोपे ने रण में ज्वाला जलाई,  

धरती माँ के लिए हँसते-हँसते जान गँवाई।  


रानी लक्ष्मीबाई लड़ी दुश्मन की सेना से,  

शेरनी बन भिड़ी अंग्रेजी सदी के घेरे से।  

आज भी गूंजे झाँसी की तलवार,  

"मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी" का अमर उद्घोष अपार।


ये मिट्टी शहीदों की पहचान है,  

हर कण-कण में उनका बलिदान है।  

जिनका नाम नहीं, वो भी महान हैं,  

हम सबका शीश उनके चरणों में नत है।  

**ये बलिदान की धरती है,  

ये हिन्दुस्तान की धरती है।** 


भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु की जोड़ी,  

फाँसी पे हँसते गए, वीरता में ना कोई तोड़ी।  

"इंकलाब ज़िंदाबाद" गूंजा हर गली,  

उनके लहू से ही तो आज़ादी की मशाल जली।  


चंद्रशेखर आज़ाद ने खुद को गोली मारी,  

पर अंग्रेज़ों के हाथ कभी न आए हमारी।  

नेताजी सुभाषचंद्र कहाँ खो गए,  

"तुम मुझे खून दो…" कहकर अमर हो गए।  


ये मिट्टी शहीदों की पहचान है,  

हर कण-कण में उनका बलिदान है।  

जिनका नाम नहीं, वो भी महान हैं,  

हम सबका शीश उनके चरणों में नत है।  

**ये बलिदान की धरती है,  

ये हिन्दुस्तान की धरती है।** 


भगवती चरण वोहरा बम के संग खो गए,  

बिस्मिल, अशफ़ाक, रोशन सिंह भी फाँसी पे सो गए।  

हिंदू-मुस्लिम साथ लड़े जब-जब,  

देश रहा सर्वोपरि, बाकी सब रहा निष्प्रभ।  


लाला लाजपत राय ने लाठियाँ झेली,  

पर उनकी आत्मा कभी न डगमगायी, रही अकेली।  

वीर सावरकर ने कालापानी सहा,  

पर वंदेमातरम् से मन उनका सदा रहा गरमा।  


चाफेकर बंधु, तीनों की कथा निराली,  

पुणे की धरती आज भी गाता उनकी लाली।  

मास्टर सूर्यसेन का साहस अद्वितीय,  

उनका बलिदान भी अमर और पावन पवित्रतम था विशेष।  


कितने नाम दब गए इतिहास की धूल में,  

पर वो जिए हमारे रक्त के मूल में।  

हर गाँव, हर कोने में बसी है कहानी,  

जिसने दी जान, पर ना पाई पहचानी।  


तो सुनो, ऐ भारत के लालों,  

ये आज़ादी किसी की मेहरबानी नहीं।  

ये खून से लिखी अमर कहानी है,  

वीरों की गाथा, त्याग की निशानी है।  


जो भूले उनको, वो खुद को खो देगा,  

जो सीखे उनसे, वही भारत संजोएगा।  

**ये बलिदान की धरती है,  

ये हिन्दुस्तान की धरती है।** 


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ये झूठे यार हैं, ये झूठा प्यार है

 जहाँ मोहब्बत अब समझौता बन गई है,

और रिश्ते, हवस के सौदे…

वहाँ आवाज़ उठानी ज़रूरी है,

क्योंकि ये आग, अब हर घर तक पहुँच गई है।


ये झूठे यार हैं, ये झूठा प्यार है,

चौड़े में मरवा दे, ये झूंठे नर, नार हैं।

चेहरे पे मुस्कान, अंदर से ख़ंजर,

हर रिश्ते की लाश पे होता इनका मंज़र।


जिस थाली में खाएं, उसी में छेद करें,

दोस्त की बहन पे भी नज़र डाले, ऐसे फरेब करें।

मुँह पे मीठी बातें, पीठ पीछे वार,

यारी अब सिर्फ़ दिखावा, अंदर है हवसी यार।


जो साथ थे बचपन से, घर में आना-जाना रहा,

आज खून की होली में, उसी का हाथ रहा।

अब यारी नहीं रही, भरोसे वाली बात,

दोस्त ही मार गया दोस्त को, ये कैसा घात?


दिल में झाँक ज़रा, इंसानियत की कुछ शर्म तो बचा,

ये तेरी हवस की भूंख, सब कुछ देगी जला।


सावित्री जैसी नारी, अब दुर्लभ है,

कृष्ण-सुदामा सी दोस्ती, अब मिलती नहीं है।

हीर-राँझा का प्यार, अब कहानी बना,

अब, जिस्मानी और दौलत को तेरा यार बना।


पत्नी ने पति के, और अपने यार से लड़ाया लाड,

दोस्ती की हाँडी में, पकाया बेशर्मी का पाप।

सोलह आने सच कहूँ, अख़बारों में छपता है,

हर मोहल्ले में, अब यही तमाशा चलता है।


दिल में नाग हैं, फुफकारते फरेब,

हर मौके पे डसें, ना छूटा कोई ऐब।


अब रिश्तों में नहीं बचा कोई विश्वास,

पति या पत्नी – दोनों ही क़ातिल बनते जा रहे।

बेवफाई के नाम पर, उठती तलवार,

कभी पत्नी मरे, कभी पति का संहार।


मोबाइल की चैट में, इश्क़ का जाल,

रातों को भागती बीवियाँ, मुँह काला कर।

मर्डर, अफेयर, और धोखे की भरमार,

बच्चों को छोड़कर, चलती हवस की सरकार।


ये प्यार नहीं, ये पाप का खेल है,

हर खबर चीख रही — मोहब्बत अब जेल है।


"रिश्ते निभाने के लिए दिल चाहिए,

चालाक दिमाग नहीं।

मोहब्बत अगर सच्ची न हो,

तो वो सबसे बड़ा जुर्म है।

अब भी वक्त है —

रिश्तों को चरित्रवान बनकर संभाल लो,

वरना ये आग, सब कुछ राख कर देगी…"

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कुर्सीधारी नहीं, न्याय का प्रहरी चाहिए

 कुर्सीधारी नहीं, न्याय का प्रहरी चाहिए


👁️ जो खुद अंधकार में डूबा है, वो रौशनी क्या फैलाएगा?,

👊 जो चरित्रहीन है, वो नेतृत्व कैसे निभाएगा?,

🕯️ जिसके शब्दों में न हो मर्यादा की लौ,

उसे कुर्सी देना – समाज को अंधेरे में ढकेलना है।


💰 जो भ्रष्ट है, वो तंत्र को दीमक की तरह चाट जाएगा,

राष्ट्र का नहीं, बस अपने स्वार्थ का झंडा उठाएगा।

📉 जो रोज़ सामाजिक मूल्यों को कुचले,

उसके शासन में तो न्याय भी कांपे, सत्य भी उखड़े।


🔥 जिसके इरादों में भरा हो विष और विभाजन,

समझो लोकतंत्र बना दिया गया उसका निजी भवन।

🗣️ अहंकार जिसमें नीति बन जाए,

वो कुर्सीधारी ही – तो साज़िश का साया है।


✊ नारी का सम्मान – समाज की असली पहचान!,

⚖️ और कुर्सी धारी वही, जिसका हो सच्चा ईमान!,

📢 ना हो भ्रष्ट, ना हो राष्ट्र द्रोही विचारों का व्यापारी,

🛑 वो चाहिए जो बोले – "जनता ही सर्वोच्च अधिकारी!"


📛 जो इंसानियत को रोज़ करे कलंकित,

क्या वो संविधान के मूल्य करेगा प्रतिष्ठित?,

👎 जिसका अतीत हो अपराधों की छाया,

उसे कुर्सी देकर – क्यों बढ़ाया अपराध का साया?


🌍 अगर हर गली, हर बेटी अब भी डरी है,

तो सोचो कुर्सी धारी कितना गिरा हुआ है।

👨‍⚖️ हमें सुरक्षा चाहिए – भ्रष्ट कुर्सीधारी बिल्कुल नहीं,

कुर्सी धारी वो ही हो, जिसमें मानवता भी हो कहीं।


✊ नारी का सम्मान – है राष्ट्र की असली जान!,

⚖️ वही, जिसकी नीयत में हो राष्ट्र भक्ति!,

🎯 पद उसे दो – जो करे सुरक्षा, सेवा, और सच्चाई की बात,

🔥 ना कि वो, जो मिटा दे इंसानियत की बात।


🔍 क्या कुर्सी इतनी सस्ती हो गई?,

कि झूठ बोले, और कुर्सी से चिपका रहे वहीं?

🕊️ अब ज़रूरत है – एक नई चेतना की अलख समान,

जहां सेवा हो राजनीति, और नारी को मिले मान, सम्मान।


✊ ये देश तभी बदलेगा – जब कुर्सी होगी ईमान की मिसाल,

🎤 चाहिए ऐसा कुर्सी धारी – जो हो ईमान का रखवाल।

🌸 नारी की आंखों में न हो आँसू, बस आत्म विश्वास की बात,

🛡️ तभी कहलाएगा भारत महान – जब हर बहन हो सुरक्षित, दिन और रात।


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कण-कण में भगवान, हर जीव में भगवान

 


Lyrics of Bhajan-



कण-कण में भगवान, हर जीव में भगवान

हर जीव के प्राण में क्या है, ओ भोले इंसान

मन की आँख से देख ज़रा, कण-कण में भगवान।

कण-कण में भगवान, हर जीव में भगवान,

सच्चे मन से देखे जो कोई, पाए हर ओर भगवान।


बूँद-बूँद में, लहर-लहर में, पत्ते-पत्ते में वो समाया

सूरज की किरणों में चमके, चंद्रमा में शीतल छाया।

रूप-रंग में, जल-तरंग में, हर स्पंदन में वो समाया,

जहाँ-जहाँ नजर दौड़ाओ, वहीं प्रभु का नाम है आया।

नज़र उठा के देख ज़रा, हर श्वास में भगवान,

कण-कण में भगवान, हर जीव में भगवान।


चाँदी का तो छत्र चढ़ाया, सोने का सिंहासन है

रेशम और मखमल से उसका, खूब सजाया आसन है।

लड्डू और पकवान खिलाते, हरदम उस जागराता को,

तुमने क्या अपने जैसा, भूखा समझा उस दाता को?

जो कुबेर का भरे खजाना, फिर क्यों मांगो दान?

कण-कण में भगवान, हर जीव में भगवान।


उड़े धन जब भरे खेत में, दर्शन करे किसान

एक-एक दाने में चमके, उसकी ज्योति महान।

अन्न ही है उसका प्रसाद, यही सच्चा वरदान,

मंदिर नहीं, ये खेत-खलिहान भी, हैं साक्षात भगवान।

कण-कण में भगवान, हर जीव में भगवान।


मंदिर-मस्जिद में कैद किया, इंसान ने अज्ञान में

तेरा वास कण-कण में, तेरा वास है प्राण में।

जात-पात की बेड़ियों में, क्यों उलझे तेरा नाम?

जो सच्चे मन से तुझे पुकारे, वही तेरा इंसान।

हर धड़कन में तेरा वास है, हर जीवन में तेरा गान,

कण-कण में भगवान, हर जीव में भगवान।


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💥 खुले विचार या खुली छूट? माता-पिता की लापरवाही का खौफनाक सच! 💥

 🚩 क्या माता-पिता अपनी बेटियों और बेटों को अनजाने में बर्बादी के रास्ते पर धकेल रहे हैं? 🚩




आजकल माता-पिता अपनी बेटियों को स्कूल-कॉलेज भेजने के नाम पर पूरी आज़ादी दे रहे हैं – सज-संवरकर, क्रीम-पाउडर, लिपस्टिक लगाकर और छोटे, तंग व शरीर दिखाने वाले फैशनेबल कपड़े पहनकर बाहर जाने की खुली छूट दी जा रही है। लेकिन क्या माता-पिता ने कभी यह सोचा कि बेटी की यह ‘मॉडर्न’ सोच उसे प्रेमजाल, लव जिहाद और अपराध के अंधेरे में धकेल रही है?


इसी के साथ लड़कों की भी बुरी आदतें बढ़ती जा रही हैं। माता-पिता यह सोचकर निश्चिंत हो जाते हैं कि "लड़का तो लड़का है, उसे कौन फंसा सकता है?" लेकिन क्या वे यह देख रहे हैं कि लड़के मोबाइल, शराब, सिगरेट, नशा, पॉर्न, आवारागर्दी और चरित्रहीनता की ओर बढ़ रहे हैं?


❗ माता-पिता ज़रा सोचिए ❗

🔴 क्या बेटी सच में स्कूल-कॉलेज जा रही है या किसी और बहाने से बाहर निकल रही है?

🔴 वह किसके साथ बाहर जा रही है और किसके साथ लौट रही है?

🔴 घर से बाहर या अकेले में मोबाइल पर किससे घंटों बात कर रही है?

🔴 क्या वह स्कूल-कॉलेज के नाम पर किसी और दिशा में तो नहीं जा रही?

🔴 जिसे आप गाड़ी चलाना सिखा रहे हैं, क्या वह इसका सही इस्तेमाल कर रही है या कोई और उसे प्रेमजाल में फंसा कर ‘ड्राइविंग सिखाने’ के बहाने कहीं और तो नहीं ले जा रहा?

🔴 क्या आपके सिखाए गए ‘आज़ादी’ और ‘विश्वास’ का कोई गलत फायदा उठा रहा है?

🔴 क्या बेटी संस्कारी और सादगीपूर्ण पहनावा अपना रही है, या छोटे, तंग और अंग प्रदर्शन करने वाले कपड़े पहनकर अनजान खतरों को बुलावा दे रही है?

🔴 क्या माता-पिता अपने कामों में इतने व्यस्त हैं कि बच्चों की परवरिश पर ध्यान ही नहीं दे पा रहे, या फिर लापरवाही में उन्हें ऐसी खुली छूट दे रहे हैं कि वे खुद को प्रेमजाल में फंसाने के लिए पूरी तरह तैयार कर रही हैं?


🚨 लड़कों की बुरी आदतें भी बना रही हैं उन्हें अपराधी!

⚠️ क्या आपका बेटा मोबाइल में गलत संगत में फंस रहा है?

⚠️ क्या वह सोशल मीडिया पर अश्लील कंटेंट देख रहा है और ग़लत संगत में पड़ रहा है?

⚠️ क्या वह दोस्तों के नाम पर बिगड़ रहा है और नशे का शिकार हो रहा है?

⚠️ क्या वह आवारागर्दी कर रहा है और घर पर झूठ बोलकर बाहर घूम रहा है?

⚠️ क्या वह लड़कियों को गलत नजर से देख रहा है और चरित्रहीन बनता जा रहा है?

⚠️ क्या माता-पिता उसे संस्कार नहीं दे रहे, बस उसकी गलतियों पर पर्दा डाल रहे हैं?


🚨 अगर अभी ध्यान नहीं दिया, तो इतिहास गवाह है कि:

✔️ घर के अंदर घुसकर बाबर लूटेगा।

✔️ देश में अपराध और महिला शोषण बढ़ेगा।

✔️ लव जिहाद के मामले बढ़ेंगे और बेटियों के 35 टुकड़े होने की खबरें आती रहेंगी।

✔️ लड़के नशे, पॉर्न, अपराध और गलत आदतों में फंसकर अपना भविष्य बर्बाद कर लेंगे।

✔️ हर दिन नई घटनाएं सामने आएंगी, और माता-पिता रोते रह जाएंगे।


⚠️ आज जो माता-पिता सोचते हैं कि "हमारा बच्चा समझदार है, उसे सब पता है," वे असल में सबसे ज्यादा खतरे में हैं!


🚩 समाधान क्या है? 🚩

✔️ बेटियों और बेटों दोनों को संस्कारों की शिक्षा दें, सादगी और मर्यादा का महत्व समझाएं।

✔️ उनकी गतिविधियों पर नजर रखें – वे किससे मिलते हैं, किससे बातें करते हैं, यह माता-पिता की जिम्मेदारी है।

✔️ आने-जाने के समय का अनुशासन तय करें, देर रात तक बाहर रहने की अनुमति न दें।

✔️ सोशल मीडिया पर उनकी गतिविधियों पर नजर रखें, गलत संगत से बचने के लिए उन्हें मार्गदर्शन दें।

✔️ बेटियों को आत्मरक्षा, शस्त्र-विद्या और सनातन संस्कृति की शिक्षा दें, ताकि वे किसी भी तरह के छल-कपट का सामना कर सकें।

✔️ बेटियों को अंग प्रदर्शन करने वाले, छोटे और तंग कपड़े पहनने से रोकें, ताकि वे अनचाहे खतरों से बच सकें।

✔️ लड़कों को नशा, मोबाइल की लत और गलत संगत से बचाएं, ताकि वे चरित्रवान बन सकें।

✔️ बच्चों को यह समझाएं कि सादगी और मर्यादा ही नारी और पुरुष दोनों का सबसे बड़ा आभूषण है।


🚩 अब भी समय है, अपनी बेटियों और बेटों को जागरूक करें, उन पर ध्यान दें, उनके संस्कार और दिनचर्या को नियंत्रित करें, वरना पछताने के अलावा कुछ नहीं बचेगा। 🚩


🔥 🚩 जय श्री राम! जय सनातन धर्म! 🚩🔥

धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो! 🚀🔥

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होली की मंगलकामनाएँ

 **होली: वास्तविक महत्व, वर्तमान स्थिति और समाज पर नकारात्मक प्रभाव**  

होली केवल रंगों और उमंग का पर्व नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिकता, प्रेम, सामाजिक समरसता और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक भी है। यह त्योहार हमें भारतीय संस्कृति की गहराई से जोड़ता है और हमें जीवन में आनंद, त्याग और प्रेम के महत्व को समझने का अवसर प्रदान करता है। लेकिन वर्तमान समय में, होली का स्वरूप बदल रहा है और इसके कारण समाज में कई नकारात्मक प्रवृत्तियाँ जन्म ले रही हैं।  

 **होली का वास्तविक महत्व**  

**1. आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व**  

- **प्रह्लाद और होलिका की कथा** – बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश।  

- **राधा-कृष्ण की होली** – प्रेम और माधुर्य का प्रतीक।  

- **कामदेव की कथा** – त्याग और पुनर्जन्म की सीख।  

 **2. सामाजिक महत्व**  

- जात-पात, ऊँच-नीच भेदभाव मिटाकर समानता का भाव उत्पन्न करना।  

- परिवार, रिश्तेदार और दोस्तों के बीच प्रेम और एकता बढ़ाना।  


 **वर्तमान स्थिति में होली का स्वरूप और नकारात्मक प्रभाव**  


आज के समय में होली का पारंपरिक और सांस्कृतिक महत्व कहीं पीछे छूटता जा रहा है। यह त्योहार अब भोगवाद, असंयमित व्यवहार और समाज में बढ़ती अनैतिक प्रवृत्तियों का माध्यम बनता जा रहा है।  

 **1. सामाजिक मूल्यों का पतन**  

**(क) युवाओं का असामाजिक और संवेदनहीन होना**  

- पहले लोग आपसी मेल-मिलाप और रिश्तों को मजबूत करने के लिए होली खेलते थे, लेकिन अब यह सिर्फ एक दिखावा बनकर रह गया है।  

- सोशल मीडिया और वर्चुअल दुनिया में डूबे युवा असली होली की भावना से दूर होते जा रहे हैं।  

- मोहल्लों और परिवारों में त्योहारों का जोश कम हो रहा है क्योंकि लोग अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त रहते हैं।  


 **(ख) रिश्तों में दूरियाँ और संवेदनहीनता**  

- पहले परिवार और समाज के लोग एक-दूसरे के घर जाकर होली की बधाई देते थे, लेकिन अब एक मैसेज भेजकर औपचारिकता पूरी कर ली जाती है।  

- होली जैसे त्योहारों में भी लोग जातिवाद और सांप्रदायिक भेदभाव के कारण बंटने लगे हैं।  


**2. नशे और असंयम का बढ़ता प्रभाव**  

- होली के अवसर पर शराब, भांग और अन्य नशीले पदार्थों का अत्यधिक सेवन किया जाता है।  

- युवा वर्ग नशे में धुत होकर बेकाबू हो जाता है, जिससे दुर्घटनाएँ और अपराध बढ़ते हैं।  

- सड़क पर हुड़दंग और असामाजिक गतिविधियाँ सामान्य बात हो गई हैं।  


 **3. महिलाओं के प्रति अपराध और यौन विकृति**  

**(क) छेड़छाड़ और दुर्व्यवहार**  

- "बुरा न मानो होली है" का गलत अर्थ निकालकर लड़कियों और महिलाओं के साथ बदतमीजी की जाती है।  

- कई बार महिलाएँ इस त्योहार में शामिल होने से डरती हैं क्योंकि कुछ लोग जबरदस्ती रंग लगाने, छूने और अश्लील हरकतें करने लगते हैं।  

- भीड़ का फायदा उठाकर अपराधी महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करते हैं।  


 **(ख) अश्लीलता और अनैतिक गतिविधियाँ**  

- कुछ स्थानों पर होली के नाम पर अश्लील डांस, गंदे गाने और बेशर्मी भरे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।  

- होली की रात कई जगहों पर लड़कियों और महिलाओं के साथ यौन शोषण और दुष्कर्म जैसी घटनाएँ होती हैं।  

- नशे में धुत लोग अनैतिक और गैर-कानूनी हरकतें करते हैं।  


**4. पर्यावरण और स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव**  

 **(क) जल संकट और बर्बादी**  

- होली के दिन हजारों लीटर पानी व्यर्थ बहाया जाता है, जबकि देश के कई हिस्सों में लोग पानी के लिए तरसते हैं।  

- वाटर बैलून और वाटर गन के अंधाधुंध इस्तेमाल से जल की बर्बादी होती है।  


 **(ख) रासायनिक रंगों से स्वास्थ्य पर खतरा**  

- बाजार में बिकने वाले अधिकतर रंगों में हानिकारक केमिकल होते हैं, जो त्वचा, आँखों और बालों को नुकसान पहुँचाते हैं।  

- कुछ रंगों में कैंसरकारी तत्व होते हैं, जो लंबे समय तक शरीर पर दुष्प्रभाव डालते हैं।  


**(ग) प्रदूषण और होलिका दहन का नकारात्मक प्रभाव**  

- होलिका दहन के लिए हजारों पेड़ काटे जाते हैं, जिससे पर्यावरण को नुकसान होता है।  

- वायु प्रदूषण बढ़ता है और सांस की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।  


 **5. अपराधों में वृद्धि**  

- होली के दिन सड़क दुर्घटनाएँ, लड़ाई-झगड़े और हिंसक घटनाएँ बढ़ जाती हैं।  

- चोरी, लूटपाट और दंगे जैसी घटनाएँ भी होली के मौके पर बढ़ जाती हैं।  

- कुछ असामाजिक तत्व इस मौके का फायदा उठाकर सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने की कोशिश करते हैं।  


 **सच्चे अर्थों में होली कैसे मनाएँ?**  


1. **संस्कृति और परंपरा को जीवित रखें** – परिवार और समाज के साथ मिलकर भजन, कीर्तन और सत्संग करें।  

2. **नैतिक मूल्यों को बढ़ावा दें** – होली को प्रेम, सम्मान और सद्भावना से मनाएँ, न कि अनुशासनहीनता से।  

3. **युवाओं को जागरूक करें** – उन्हें समझाएँ कि त्योहारों का मतलब भक्ति, आनंद और सामाजिक मेलजोल होता है, न कि अश्लीलता और अनैतिकता।  

4. **महिलाओं और कमजोर वर्गों का सम्मान करें** – जबरदस्ती रंग लगाने या दुर्व्यवहार करने की बजाय एक स्वस्थ और सुरक्षित माहौल बनाएँ।  

5. **प्राकृतिक रंगों और जल संरक्षण का ध्यान रखें** – केमिकल रंगों और पानी की बर्बादी से बचें।  

6. **नशे और अपराध से दूर रहें** – होली को एक पवित्र त्योहार की तरह मनाएँ और किसी भी नशे या अनैतिक कार्यों से बचें।  

7. **पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनें** – होलिका दहन में अधिक लकड़ी जलाने से बचें और वायु प्रदूषण न बढ़ाएँ।  


 **निष्कर्ष**  

होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और परंपराओं का प्रतीक है। इसे सही तरीके से मनाने की ज़रूरत है ताकि समाज में नैतिकता बनी रहे और युवा भोगवाद के बजाय आध्यात्मिकता की ओर प्रेरित हों। अगर हम सही दिशा में प्रयास करें, तो होली पुनः अपने वास्तविक स्वरूप में लौट सकती है – जहाँ प्रेम, भक्ति और सामाजिक समरसता का संदेश होगा, न कि असंयम, अश्लीलता और नैतिक पतन।  

**आपको और आपके परिवार को पावन होली की मंगलकामनाएँ!** 🎨🔥🙏

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मैं तो ब्रह्म हूं, मैं तो शिव हूं, अनादि, अनंत शिव हूं। जय गौरी शंकर।। जय महाकाल।।

 


मैं न तो मन हूं, न बुद्धि, न अहंकार, न ही चित्त हूं, मैं न तो कान हूं, न जीभ, न नासिका, न ही नेत्र हूं, मैं न तो आकाश हूं, न धरती, न अग्नि, न ही वायु हूं, मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं। जय गौरी शंकर।। जय महाकाल।। न मैं शरीर हूं, न मैं प्राण हूं, न मैं संकल्प, न मैं शब्द हूं, न मैं रूप हूं, न मैं कोई विकार, न मैं सुख हूं, न मैं दुख हूं, न मैं मोह हूं, न मैं बंधन हूं, न मैं मुक्ति हूं, मैं तो निराकार, अनादि, अनंत शिव हूं। जय गौरी शंकर।। जय महाकाल।। न मैं स्त्री हूं, न मैं पुरुष हूं, न कोई रूप धरूं, न मैं लोभ हूं, न मैं क्रोध हूं, न अहंकार को अपनाऊं, न मैं ध्यान हूं, न मैं भक्ति हूं, न मैं पूजा हूं, न मैं कोई फल चाहता, न कोई इच्छा संजोऊं, मैं तो आत्मा हूं, परम शुद्ध ब्रह्म हूं, अनादि, अनंत शिव हूं। जय गौरी शंकर।। जय महाकाल।। न मैं जीवन हूं, न मैं मृत्यु हूं, न कोई बीच की स्थिति, न मैं भ्रम हूं, न मैं सत्य हूं, न किसी में कोई असंयम, न मैं किसी काल हूं, न मैं समय हूं, न कोई स्थान हूं, न मैं मोह-माया का जाल हूं, न ही मैं जन्म-मृत्यु का खेल हूं, मैं तो ब्रह्म हूं, मैं तो शिव हूं, अनादि, अनंत शिव हूं। जय गौरी शंकर।। जय महाकाल।।
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दवा से ज्यादा अपनेपन से भरे मीठे बोल की जरूरत होती है

 नवविवाहित जोड़ा किराए पर मकान देखने के लिए वर्मा जी के घर पहुँचा।

दोनों पति-पत्नी को देखकर वर्मा दंपत्ति खुश हो गए, सोचा—चलो, कुछ रौनक होगी, कितना सुंदर जोड़ा है, इन्हें मकान जरूर देंगे।

"आंटी, अंकल! हमें दो कमरे और एक किचन वाला मकान चाहिए, क्या हम देख सकते हैं?"

घुटनों के दर्द से जूझ रहीं सुनीता जी उठते हुए बोलीं, "हाँ बेटा, क्यों नहीं, देख लो!"

बाजू में एक छोटा पोर्शन किराए के लिए बनवाया था, जिससे आर्थिक सहायता भी हो जाएगी और सूने घर में रौनक भी आ जाएगी।

मकान सुमन और अजय को बहुत पसंद आया। "अंकल, हम कल ही शिफ्ट हो जाएंगे!"

अरुण जी मुस्कुराए, "बिल्कुल बेटा, स्वागत है!"

दूसरे दिन से घर में नई रौनक आ गई।

सारा दिन सामान जमाने के बाद जैसे ही सुमन और अजय थोड़ा आराम करने बैठे, दरवाजे की घंटी बज उठी।

दरवाजा खोला तो सामने अरुण जी खड़े थे। "बेटा, आंटी ने तुम्हें खाने के लिए बुलाया है।"

अजय झिझकते हुए बोला, "अरे, क्यों तकलीफ की आंटी ने? हम तो बाहर से ऑर्डर करने ही वाले थे!"

पोपले मुँह से हँसते हुए अरुण जी बोले, "आज तो थके हुए हो, खा लो, कल से अपने हिसाब से इंतज़ाम कर लेना!"

धीरे-धीरे सुमन और अजय का वर्मा दंपत्ति से एक अनजाना सा लगाव हो गया। जब उन्हें पता चला कि उनके दोनों बेटे विदेश में स्थायी रूप से बस चुके हैं, तो दोनों का मन भर आया।

रात में सुमन ने कहा, "अजय, सारी रात अंकल की खाँसी और कराहने की आवाज़ आ रही थी, देख आओ, कहीं तबियत ज्यादा खराब न हो!"

अजय बोला, "हाँ, मैं देखता हूँ, तुम नाश्ता बना लो, साथ ही अंकल-आंटी के साथ खा लेंगे!"

अजय ऊपर पहुँचा तो सुनीता जी बोलीं, "क्यों तकलीफ की बेटा? बुढ़ापे में तो ये सब लगा ही रहता है... कहीं हमारी वजह से तुम्हारी नींद तो नहीं खराब हुई?"

अजय मुस्कुराकर बोला, "अरे नहीं आंटी! मैं अभी अंकल को डॉक्टर के पास ले चलता हूँ, दवा से तबियत संभल जाएगी!"

सुनीता जी ने बेबसी से उसकी ओर देखा और हल्की आवाज़ में बोलीं, "बेटा, दवा से ज्यादा अपनेपन से भरे मीठे बोल की जरूरत होती है, बस यही कमी थी, जो तुम दोनों ने पूरी कर दी!"

यह कहते हुए उन्होंने अपने आँसू पोंछे, और अरुण जी की आँखें भी छलक पड़ीं...!

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