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Tuesday, 22 January 2013

मनुष्य के लिए 'रिश्ता' शब्द

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किसी भी समाज से सरोकार रखने वाले मनुष्य के लिए 'रिश्ता' शब्द बड़ी अहमियत रखता है। हम परिवार में विभिन्न रिश्तों की डोर से बँधे होते हैं। लेकिन इन पारिवारिक रिश्तों के अलावा एक और महत्वपूर्ण रिश्ता हमारे जीवन में काफी महत्व रखता है और वह है दोस्ती अथवामित्रता का रिश्ता, जो विश्वास व सहयोग के आधार पर टिका होता है। मित्र राजदार भी होते हैं और सुख-दुःख के साथी भी। 

जानिए मित्र/ मित्रता के बारे में चाणक्य, सुकरात, अरस्तु जैसे कुछ विचारकों के विचार-

* मूर्ख मित्र से बुद्धिमान शत्रु हर स्थिति में अच्छा है। 

* मित्र पाने की राह है, खुद किसी का मित्र बन जाना।

* मित्रता करने में धैर्य से काम लो। किंतु जब मित्रता कर ही लो तो उसे अचल और दृढ़ होकर निभाओ।

* अपने मित्र को एकांत में नसीहत दो, लेकिन प्रशंसा (सही) खुलेआम करो।

* तुम्हारा अपना व्यवहार ही शत्रु अथवा मित्र बनाने के लिए उत्तरदायी है।

* सच्चा मित्र वह है जो दर्पण की तरह तुम्हारे दोषों को तुम्हें दिखाए। जो तुम्हारे अवगुणों को गुण बताए वह तो खुशामदी है।

* विदेश में विद्या मित्र होती है, घर में पत्नी मित्र होती है, रोगी का मित्र औषधि व मृतक का मित्र धर्म होता है।

* मित्र वे दुर्लभ लोग होते हैं, जो हमारा हालचाल पूछते हैं और उत्तर सुनने को रुकते भी हैं।

* ज्ञानवान मित्र ही जीवन का सबसे बड़ा वरदान है।

* सच्चे मित्र हीरे की तरह कीमती और दुर्लभ होते हैं, झूठे दोस्त पतझड़ की पत्तियों की तरह हर कहीं मिल जाते हैं।