चमकते योद्धाओं के, तलवार, त्रिशूल,
गूंजी रणभूमि में, जयकार, उसूल।
शिवा की छाया में, उठा स्वाभिमान,
हर क्रांतिकारी बना, माँ का सम्मान।
सीने में ज्वाला, हाथों में शक्ति,
रखवाले हैं हम, देश की भक्ति।
कफ़न बाँध निकले, ना कोई डर,
मातृभूमि के लिए, चढ़े वीर पथ।
राणा की हुंकार, हल्दीघाटी का शोर,
लहू से लिखा गया, गौरवमयी भोर।
बंदा बैरागी की, ज्वाला सी पुकार,
फाँसी पे हँसकर बोले, वंदे मातरम्।
त्रिशूलों की चमक, अब भी बताती,
आज़ादी उपहार नहीं, थी वो बलिदानी।
जो आज खड़े हैं, वो देश के योद्धा,
हर साँस में गूंजे, मातृभूमि के सुर।
हम युवा हैं, पर विरासत से गहरे,
भूलेंगे ना वीरों की यादें स्वर्ण रेखाएं।
हर पग पर खून, वतन के लिए,
तलवार, त्रिशूल, सुरक्षा के लिए।
सीने में ज्वाला, हाथों में शक्ति,
रखवाले हैं हम, देश की भक्ति।
चमकते योद्धाओं के, तलवार, त्रिशूल,
अब भी गूंजे, योद्धाओं के उसूल।
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