चल, उठ! शेर, खड़ा हो जा

 कब तक अपनों को कटते देखोगे?

कब तक चुप रहकर सहते जाओगे?

गली-गली में आग लगी है,

फिर भी तुम क्यों सोए हो भाई?




चल, उठ! शेर, खड़ा हो जा,

हक़ के लिए अब खड़ा हो जा।

जिस धरती माँ ने जन्म दिया,

उसके लिए तू ज़िंदा हो जा।



हर कतल पर खामोशी क्यों है?

हर अन्याय पर चुप्पी क्यों है?

ज़मीर को बिकता देख रहे हो,

इंसाफ़ को झुकता देख रहे हो।



गरम है खून, तो उबाल में ला,

कायर नहीं, ज्वालामुखी बन जा।

बेटियों की चीखें सुन,

क्या अब भी ज़मीर नहीं हिला?



चल, उठ! शेर, खड़ा हो जा,

भीड़ में से अब अलग हो जा।

माँ का लाल कहला कर भी,

अब तक क्यों बेजान पड़ा ?



वो तिजोरी भरते, राजनीती करते है,

इंसान डर डर के मरता है।

जनता का यह हाल हुआ है,

क्या फिर देश गुलाम बनेगा?


अब तो उठ, खड़ा हो जा,

समय है अब, सीना ठोक ।

बदलाव तेरे दम से आएगा,

तेरा तुझसे ही उम्मीद  लगाएगा।


चल, उठ! शेर, खड़ा हो जा...

अब वक़्त है, आग का गोला हो जा!

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