मोबाइल की दुनिया अब डर बन गई है,
हर दीवार में दरार सी लग गई है।
इंटरनेट ने छीनी घर की मर्यादा,
मर्यादा रोती है, बिखरा है परिवार।
चुपके-चुपके मोबाइल से रिश्ता बनता,
फिर वही रिश्ता घर को तोड़ देता।
वो चैट, वो कॉल, वो चोरी की बातें,
सच्चे रिश्तों पर पड़ती हैं घातें।
आँखों में नशा, दिल में है धोखा,
अश्लीलता ने तोड़ दिया माँ का रोका।
संस्कार खो गए, संस्कृति हुई ग़मगीन,
घर की लक्ष्मी अब सवालों में हींन।
मोबाइल की दुनिया अब डर बन गई है,
हर दीवार में दरार सी लग गई है।
इंटरनेट ने छीनी घर की मर्यादा,
मर्यादा रोती है, बिखरा है परिवार।
ना भाई का प्यार, ना बहन की इज़्ज़त,
हर स्क्रीन से फैल रही है अशुद्धता।
रात की बातें, दिन में ज़हर बनती,
अवैध रिश्ते अब जान भी लेतीं।
हत्या, धोखा, ब्लैकमेल का खेल,
इंटरनेट ने बिगाड़ दिया हर मेल।
जहां था कभी प्रेम और संस्कार,
वहीं अब ज़हर है, छल और व्यवहार।
उठो, जागो, समय न बीत जाए,
मोबाइल की दुनिया में घर न जल जाए।
संस्कारों की दीवार फिर से खड़ी करो,
संस्कृति के दीप को फिर से जला दो।
मोबाइल की दुनिया अब डर बन गई है,
हर दीवार में दरार सी लग गई है।
इंटरनेट ने छीनी घर की मर्यादा,
मर्यादा रोती है, बिखरा है परिवार।
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