हर जीव में भगवान बसे हैं

 हर जीव में भगवान बसे हैं,

जो इसे समझे, वही सच्चे इंसान हैं...



जो न सिखाए प्रेम, न सिखाए दया,

जो न जगा पाए अंतर की आत्मा,

वो धर्म नहीं, बस एक नाम भर है,

जिसमें न ईश्वर, न प्रकाश का दर है।


निर्दोषों का रक्त बहाना,

जीवों को पीड़ा देना,

ये मनुष्यता नहीं —

ये हैवानियत का चेहरा है जीता-जागता।



स्वार्थ के नाम पर क्यों ढाते हो वज्रपात?

क्या हर चीख नहीं करती तुम्हारे दिल पर घात?

सोचो — अंत में क्या जाएगा साथ?

सिंहासन छूटे, नाम मिटे — न रही ताज, न रही बात।



हर जीव में भगवान बसे हैं,

मत देखो उसे केवल मांस ।

वो आत्मा है, उसी का अंश है,

वो भी परमात्मा का ही रूप है।



कब्रों ने सबके नाम मिटा दिए,

महलों ने न किसी को अमर बनाया।

राजा हो या रंक, सबका अंत है एक,

शरीर छूटता है, साथ जाता सिर्फ कर्म।


अजर अमर बस प्रभु नाम है,

जो हर कण में, हर प्राण में विराजमान है।

जो अनंत है, सत्य है, ब्रह्म है —

वही परमात्मा महान है।



चलो अब विवेक से जीवन को देखो,

हर जीव में उसी प्रभु को समझो।

मत काटो, मत मारो —

प्रभु को इस तरह नादानी में।



सच्चा धर्म वही, जो सिखाए करुणा,

जहाँ प्रेम हो, न हो कोई घृणा।

हर आत्मा में ईश्वर का निवास है,

यही सनातन का सच्चा प्रकाश है।



ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः,

सर्वे सन्तु निरामयाः।

हर आत्मा में जो विराजे,

वही है प्रभु — वही है सच्चा धर्म।



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